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संवत प्रवर्तक विक्रमादित्य के चरित्र का उपक्रम
March 1, 2019 • Sushri. Aditi Goud

तीन हजार वर्ष पूर्ण होने पर जब कलियुग का आगमन हुआ तब शकों के विनाश और आर्य धर्म की अभिवृद्धि के लिए कैलाश से भगवान शंकर की आज्ञा पाकर पृथ्वी पर विक्रमादित्य नाम से प्रसिद्ध राजा हुए। तपस्यारत रहकर कई वरदान प्राप्त करने पर इन्होंने अम्बावती नामक दिव्य नगरी में आकर बत्तीस मूर्तियों से परिपूर्ण, भगवान शिव द्वारा अभिरक्षित रमणीय और दिव्य सिंहासन को सुशोभित किया। भगवती पार्वती द्वारा प्रेषित एक वैताल उनकी रक्षा में सदा तत्पर रहता था। उस वीर राजा ने महाकालेश्वर का पूजन कर अनेक धर्म सभाओं का निर्वाह किया।

भारत वर्ष में विक्रमादित्य अत्यन्त प्रसिद्ध, दानी, परोपकारी और सदाचारी राजा हुए। 'स्कन्द पुराण', 'भविष्य पुराण', 'सिंहासन बत्तीसी', 'पुरुष परीक्षा'....आदि ग्रन्थों में इनका चरित्र वर्णित है। इतिहास में वर्णित है कि स्मिथ और रिफिन्सटन एवं कई इतिहासकारों ने अनेक विक्रमादित्यों की चर्चा की है किन्तु ये महाराज विक्रमादित्य उज्जयिनी के राजा थे जिनकी कोई उपमा नहीं है।

भविष्य पुराण में उल्लेख मिलता है कि तीन हजार वर्ष पूर्ण होने पर जब कलियुग का आगमन हुआ तब शकों के विनाश और आर्य धर्म की अभिवृद्धि के लिए कैलाश से भगवान शंकर की आज्ञा पाकर पृथ्वी पर विक्रमादित्य नाम से प्रसिद्ध राजा हुए। तपस्यारत रहकर कई वरदान प्राप्त करने पर इन्होंने अम्बावती नामक दिव्य नगरी में आकर बत्तीस मूर्तियों से परिपूर्ण, भगवान शिव द्वारा अभिरक्षित रमणीय और दिव्य सिंहासन को सुशोभित किया। भगवती पार्वती द्वारा प्रेषित एक वैताल उनकी रक्षा में सदा तत्पर रहता था। उस वीर राजा ने महाकालेश्वर का पूजन कर अनेक धर्म सभाओं का निर्वाह किया। वैताल ने विभिन्न कथाओं के तथा अनेक प्रकार के प्रश्नोत्तर द्वारा महाराजा विक्रमादित्य की परीक्षा ली और राजा विक्रमादित्य ने प्रत्येक का बुद्धिमतापूर्ण उत्तर दिया।

भविष्य पुराण में वर्णित वैताल द्वारा राजा विक्रमांक को कहीं कथा-यथा- पूर्वकाल में रूपसेन नामक एक धर्मात्मा राजा रहते थे। राज दरबार में एक दिन वीरवर नाम का एक क्षत्रिय अपने परिवार के साथ वृत्ति के लिए विनयपूर्वक उपस्थित हुआ। राजा ने उसे महल के सिंहद्वार पर रक्षक के रूप में नियुक्ति दे दी। कुछ दिनों पश्चात् राजा को ज्ञात हुआ कि वीरवर अपना अधिकांश वेतन यज्ञ, तीर्थ, भगवानोपासना एवं परोपकार में वितरित कर देता है और अत्यल्प से परिवार का भरण पोषण करता है। राजा ने प्रसन्न होकर उसे स्थायी नियुक्ति प्रदान कर दी। एक दिन झंझावत पूर्ण विभीषिका की रात्रि वीरवर को शमशान की ओर से रूदन सुनाई दिया और वह उस दिशा में चल पड़ा। रक्षार्थ के लिए राजा रूपसेन भी गुप्तरूप से उसके पीछे लग गये। शमशान पहुँच वीरवर ने स्त्री से पूछा कि वह दुःखी क्यों है? स्त्री ने कहा मैं इस राज्य की लक्ष्मी-राजलक्ष्मी हूँ। इस मास के अन्त में राजा रूपसेन की मृत्यु हो जायेगी, इसीलिए दुःखी हूँ। स्वामी भक्त वीरवर ने राजा रूपसेन की दीघार्यु का उपाय पूछा। देवी बोली- यदि तुम अपने पुत्रों की बलि देवी चण्डिका के समक्ष दोगे तो राजा की रक्षा हो सकती है।

स्वामी भक्त वीरवर ने देवी के बताये मार्ग का अनुसरण किया। उसने अपने पुत्र की बलि दे दी और उसके वियोग में वीरवर की पुत्री एवं पत्नी ने भी अपने प्राण त्याग दिये। राजा यह सम्पूर्ण घटना गुप्तरूप से देख रहे थे और उनका हृदय ग्लानि से भर उठा कि उनकी रक्षार्थ एक परिवार आहूत हो गया। उन्होंने देवी से प्रार्थना की मेरा जीवन व्यर्थ है। मेरी रक्षार्थ वीरवर का परिवार उजड़ गया। राजा रूपसेन ने ज्योंही कटार खींची। देवी ने प्रकट होकर राजा का हाथ पकड़ लिया और कहा राजन! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। तुम्हारी आयु सुरक्षित है। इच्छानुसार वर मांगो। राजा ने देवी से वीरवर के परिवार को पुनः जीवित करने की प्रार्थना की। तथास्तु कर कर देवी अन्तर्धान हो गयी। राजा रूपसेन प्रसन्न होकर महल आकर सो गयेवीरवर भी देवी कृपा मानते हुए खुश होकर पुनः सिंहद्वार पर आकर खड़ा हो गया। कथा कहकर वैताल शान्त हो गया। उसने विक्रमादित्य से पुनः प्रश्न पूछा, इस कथा में किस का त्याग महान है? बोलो राजन्? विक्रमादित्य ने कहा, वीरवर ने स्वामीभक्त के कारण त्याग किया। पुत्र एवं भाई के वियोग में (स्नेह के कारण) वीरवर की पत्नी और पुत्री के प्राण चले गये लेकिन राजा रूपसेन ने महान आदर्श स्थापित किया। राजा एक सामान्य सेवक के लिए अपना प्राणोत्सर्ग करने को उद्यत हो गया, इसलिए राजा का त्याग बड़ा है।

प्रसन्न हो वैताल ने राजा विक्रमादित्य से कहा, तुम्हारी भुजाओं में मेरा निवास रहेगा, जिससे तुम पृथ्वी के समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त करोगे। इन्हीं पराक्रमी विक्रमादित्य ने विक्रम संवत का प्रवर्तन किया, जो भारत का मुख्य संवत् है।

पुरातत्व में आदित्य स्वरूप सम्राट विक्रमादित्य''

हमारे विक्रम संवत लोकोत्तर भगवान महाकालेश्वर के परम सेवक विक्रमादित्य ने प्रचलित किया था। छठी शताब्दी ई.पू. में आर्थिक परिवर्तनों के कारण ऋग्वैदिक कबीलायी जनजीवन में परिवर्तन हो क्षत्रिय भावना के जागृत होने से नगरों का निर्माण होने लगा। बुद्ध के समय में (जन्म से पूर्व) 16 महाजनपदों का जन्म हो चुका था। इन 16 महाजनपदों में उत्तरी अवन्ति (उज्जैन) एवं दक्षिण अवन्ति (महिष्मती) का अस्तित्व था। भर्तृहरि सम्राट विक्रम के अग्रज कहे जाते हैं बड़े भाई के विरक्त होकर सिंहासन त्याग देने पर विक्रमादित्य ने अवन्ति का (उज्जैन) का सिंहासन स्वीकार किया।

साम्राज्यवादी नीति (भावना) के कारण भारत शकों के आक्रमण से आक्रान्त होता जा रहा था। राजा विक्रमादित्य ने उन शत्रुओं को अपने पराक्रम बल से पराजित कर उन्हें उत्तर सीमान्त के पार खदेड़ा। इसी शौर्य ने उन्हें “शकारि'' उपाधि से विभूषित किया। इतिहास में वर्णित मिलता है कि राजा, सम्राट एवं मुख्याधिकारी ने अपने विजय एवं उपलब्धियों पर अपने काल-समय में संवत् का प्रचलन प्रारम्भ किया।

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