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संगीत-चिकित्सा सभी जीवित प्राणियों के लिए एक पारलौकिक वरदान
June 1, 2016 • Nirmal Agastya

मनुष्य के जीवन में ऐसी अनेक घटनाएँ होती हैं जिनसे लाभान्वित होते रहने के बाद भी वह इन घटनाओं पर ध्यान नहीं दे पाता। एक व्यक्ति जब कोई ओषधि लेता है तब उसका मस्तिष्क पहले से सचेत रहता है कि शरीर में एक रसायन गया है और उससे होनेवाले लाभ या हानि का अवलोकन वह स्वतः ही करने लग जाता है। लेकिन ऐसी कई घटनाएँ और सामान्य जीवन के कार्यकलाप हैं जिनका हम पर लगातार प्रभाव पड़ते रहने के बाद भी हम उसे सचेत होकर शरीर में लिए गए रसायन से उत्पन्न प्रभाव की तरह अनुभूत नहीं कर पाते । हैं, जैसे- मन्दिर या पूजास्थल में बजती घन्टी से शान्ति की अनुभूति, तुरही के तान से शौर्य और वीररस की अनुभूति। बच्चे की किलकारी से वात्सल्य की अनुभूति। ऐसी कई घटनाएँ हैं जो हमें शारीरिक और मानसिक सुख देकर हमारे स्वास्थ्य में धनात्मक योगदान करती हैं और हमें पता भी नहीं होता।

 

संगीत ऐसी ही एक भौतिकीय घटना है जिसने मनुष्य को सदैव आनन्दित किया है परन्तु विशेष सजगता से संगीत पर विचार करने के उपरान्त हम पाते हैं कि संगीत न केवल मनोरंजक है बल्कि एक धीमी परन्तु कारगर सहयोगी ओषधि भी है। हिंदू-धर्म की एक पौराणिक कथा के अनुसार कालों के बीच अथवा संक्रमण काल में पृथिवी पर भयावह नीरवता छा गई। लोग दुःखी, चिन्तित, अकर्मण्य और अनजाने भय से ग्रसित हो गये। मनुष्य की जिजीविषा कम होने लगी। हर मनुष्य कुण्ठा और अवसाद की ओर बढ़ने लगा। तब ऋषि-मुनियों ने ब्रह्मा जी से प्रार्थना की कि वो कुछ ऐसी युक्ति सुझायें जिससे इन सभी घातक समस्याओं का समाधान हो सके। तब ब्रह्मा जी ने भगवान् शिव की प्रेरणा से प्रकृति के सबसे सक्षम प्राणी की समस्याओं को सुलझाने के लिए ध्वनि-पुंज, जिसे 'नाद' भी कहते हैं, से ध्वनि के शुद्धतम रूप “ॐ' को अलग किया जिसे प्रथम सुर भी माना जाता है। तदुपरान्त ब्रह्मा जी ध्वनिपुंज से कुछ विशेष आवृत्तिवाली ध्वनियों को चुनकर श्रुतियों का निर्माण किया जिनके बीच की उचित, कर्णप्रिय और प्रभावपूर्ण दूरी को निर्धारित कर सुरों का निर्माण कर अपने मानस पुत्र महामुनि नारद को इसके उपयोग करने की विधि समझाकर आदेश दिया कि वे इस पारलौकिक ज्ञान का माता सरस्वती की सहायता से पृथिवी पर प्रसार करें। महामुनि नारद ने संगीत का ज्ञान उच्च कोटि के साधकों को मंत्रोच्चार के रूप में दिया जो कालान्तर में नौ भावों अथवा रसों में व्यक्त होने लगा।

आइये, अब तनिक पौराणिक कथाओं से थोड़ा हटकर आधुनिक दृष्टिकोण से संगीत की उपयोगिता और औषधीय गुण- धर्म को समझने की कोशिश करें। मान लीजिए कि आप ऐसी जगह पर बैठे हैं जहाँ ठीक पास में भीषण गर्जना करता हुआ कोई यंत्र खोदने, छेदने, काटने या तोड़ने का काम कर रहा है तो आप उस कर्कश वातावरण में कितनी देर रह पायेंगे। यदि आपको बलपूर्वक वहाँ रोककर रखा जाए तो तो आप चिड़चिड़े और क्रोधग्रस्त हो जायेंगे। हो सकता है कि आपका सर दर्द करने लगे। यहाँ तक कि आपका रक्तचाप भी बढ़ सकता है और मन में हिंसा भी जाग सकती है। तो जब कर्कश और अप्रिय ध्वनि मनुष्य की मानसिक और शारीरिक अवस्था पर दुष्प्रभाव डाल सकती है तो कर्णप्रिय और मधुर ध्वनि मनुष्य की मानसिक और शारीरिक अवस्था पर अच्छा प्रभाव क्यूँ नहीं डाल सकती।

अब इसे सीधे-सीधे भौतिकी से समझते हैं। ध्वनि, ऊर्जा का एक रूप है। लेकिन मनुष्य इसकी अनुभूति तब कर पाता है जब इन ध्वनि-तरंगों की आवृत्ति 20 हर्ट्ज़ से 20000 हर्ट्ज़ के भीतर हो। इस सीमा से ऊपर या नीचे की ध्वनि-तरंगों को मनुष्य नहीं सुन सकता जिन्हें क्रमशः अपश्रव्य और पराश्रव्य ध्वनि कहते हैं। 20 हर्ट्ज़ से 20000 हर्ट्ज़ तक की इन्हीं श्रव्य आवृत्तिवाली ध्वनि से ईश्वर द्वारा दिए गए ज्ञान और सहस्रों वर्षों के शोधोपरान्त चुनी गई श्रुतियों का उपयोग संगीत में किया जाता है। इन चयनित श्रुतिओं में दूरी के हिसाब से सात शुद्ध और पाँच सहयोगी अथवा कोमल-तीव्र सुरों को गायन-वादन के क्रम में विश्व के हर कोने में उपयोग में लाया जाता है। जब गले या वाद्ययंत्र से सुर निकलते हैं तब वास्तव में गला या वाद्ययंत्र निश्चित आवृत्तिवाली ध्वनि ऊर्जा का उत्सर्जन कर रहा होता है। इस ऊर्जा का असर गले या वाद्ययंत्र से निकलनेवाले सुरों की संख्या, चलन, उतार-चढ़ाव, विशेष स्वर-संगति, लय, गति, वाद्ययंत्र और गायक के गले की गुणवत्ता और सुरों के क्रमचय और संचय पर निर्भर करता है।

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