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श्रीकृष्ण प्रणाली (निजानन्द) सम्प्रदाय
February 1, 2017 • Parmod Kumar Kaushik

श्रीकृष्ण प्रणामी अथवा निजानन्द सम्प्रदाय वैष्णवों का एक 400 वर्ष पुराना उप सम्प्रदाय है जिसमें सर्वेसर्वा ईश्वर ‘राज जी' (सदचित्तआनन्द) को माननेवाले अनुयायी शामिल हैं। इस सम्प्रदाय की स्थापना सिंध के निजानन्दाचार्य श्रीदेवचन्द्रजी (15811655) द्वारा हुई।

प्रणामी सम्प्रदाय के आगे के प्रसार का श्रेय उनके योग्य शिष्य और उत्तराधिकारी, महामति प्राणनाथ जी (मेहराज ठाकुर) (1618-1694) को जाता है, जो जामनगर राज्य के दीवान केशव ठाकुर के पुत्र थे। उन्होंने धर्म के प्रसार के लिए पूरे भारत की यात्रा की। उन्होंने कुलजम स्वरूप नामक कृति रची, जिसे छह भाषाओं में लिखा गया- गुजराती, सिंधी, अरबी, फारसी, उर्दू और हिंदी; साथ ही इसमें और कई अन्य प्रचलित भाषाओं के शब्द भी लिए गए। कुलजम स्वरूप उर्फ कुल्जम स्वरूप एवं मेहर सागर नामक उनकी कृति, अब इस सम्प्रदाय का मुख्य पाठ है। अपने जीवनकाल के दौरान उन्होंने हरिद्वार में कुंभ मेले में भी भाग लिया तथा कई संतों और अपने समय के धार्मिक नेताओं से मुलाकात की, जो उनके ज्ञान और शक्ति से प्रभावित थे।

बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल (1649-1731), महामति प्राणनाथजी के प्रबल शिष्य और प्रणामी धर्म के अनुयायी थे। उनकी भेंट 1683 में पन्ना के निकट मऊ में संपन्न हुई। उनके भतीजे देवकरण जी, जो पूर्व में स्वामी प्राणनाथ जी से रामनगर में मिल चुके थे, ने इस भेंट के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। छत्रसाल प्राणनाथ जी से अत्यधिक प्रभावित हुए और उनके शिष्य बन गए। महाराजा छत्रसाल जब उनसे मिलने आए, तब वह मुगलों के खिलाफ युद्ध के लिए जा रहे थे। स्वामी प्राणनाथ जी ने उन्हें अपनी तलवार दी, एक दुपट्टे से उनके सिर को ढका और कहा कि आप सदा विजयी होंगे। आपकी भूमि में हीरे की खानों की खोज होगी और आप एक महान् राजा बनेंगे। उनकी भविष्यवाणी सच साबित हुई, आज भी पन्ना, हीरे की खानों के लिए प्रसिद्ध है। स्वामी प्राणनाथ जी छत्रसाल के केवल धार्मिक गुरु नहीं थे वरन् वह उन्हें राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मामलों में भी निर्देशित करते थे।

यह संप्रदाय अन्य सम्प्रदायों की तरह बहुदेववाद में विश्वास नही रखता। इसके अनुसार परब्रह्म परमात्मा श्रीराजजी एवं उनकी सहसंगिनी श्रीश्यामा महारानी जी इस ब्रह्माण्ड के पालनहार एवं रचयिता हैं। इस संप्रदाय में जो ‘तारतमसागर' ग्रन्थ है, उसे स्वयं परमात्मा की स्वरूप सखी इंद्रावती ने प्राणनाथ के मनुष्य रूप में जन्म लेकर लिखा। इस सम्प्रदाय में 11 साल और 52 दिन की आयुवाले बालकृष्ण को पूजा जाता है, क्योंकि इस आयु तक कृष्ण रासलीला किया करते थे। प्रणामी सम्प्रदाय के अनुयायी वैष्णव हैं और गुजरात, राजस्थान, बुंदेलखण्ड में अधिक पाए जाते हैं। महात्मा प्राणनाथ की शिष्य-परम्परा का भी एक अच्छा साहित्य है।

तारतमसागर

तारतमसागर महामति प्राणनाथ जी द्वारा धर्म प्रचार-प्रसार के लिए देश-विदेश में भक्तिवाद की व्याख्या की गई है और वैष्णव-साधना की आलोचना भी है। फिर भी जीव गोस्वामी के ग्रंथ में अचिन्त्यभेदाभेदवाद की स्थापना की भी चेष्टा की गई है। बलदेव विद्याभूषण के गोविन्दभाष्य में चैतन्य का मत स्पष्ट रूप से पाया जाता है।

श्रीचैतन्य सम्प्रदाय के अनुसार श्रीमद्भागवत ही ब्रह्मसूत्र का भाष्य है। ऐसे भाष्य के रहते हुए चैतन्य महाप्रभु ने किसी अन्य भाष्य की आवश्यकता नहीं समझी। फिर भी, श्रीमध्वभाष्य को श्रीमद्भागवत के अनुरूप देखकर वह आदर की दृष्टि से देखते थे और उसे अपने सम्प्रदाय के भाष्य के रूप में स्वीकार करते थे। जिन स्थानों पर श्रीमध्वभाष्य भागवत के विरुद्ध पड़ता था, उन-उन स्थानों पर वास्तविक अर्थ की खोज करके वह समन्वय करने की चेष्टा करते थे। परन्तु वे सब बातें ग्रंथरूप में नहीं लिखी गयीं। इसी बात को ध्यान में रखकर आचार्य बलदेव विद्याभूषण ने गोविन्दभाष्य की रचना की। 

राधारमण मन्दिर, वृंदावन में श्रीराधारमण जी का मन्दिर श्रीगौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के सुप्रसिद्ध मन्दिरों में से एक है। श्री गोपाल भट्ट जी शालिग्राम शिला की पूजा करते थे। एक बार उनकी यह अभिलाषा हुई कि शालिग्राम जी के हस्त-पद होते तो मैं इनको विविध प्रकार से सजाता एवं विभिन्न प्रकार की पोशाक धारण कराता। भक्तवत्सल श्रीकृष्ण जी ने उनकी इस मनोकामना को पूर्ण किया एवं शालिग्राम से श्रीराधारमण जी प्रकट हुए। श्रीराधारमण जी के वामांग में गोमती चक्र सेवित है। इनकी पीठ पर शालिग्राम जी विद्यमान हैं।

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