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शिक्षा मनुष्य-निर्माण और व्यक्तित्व विकास की साधना
May 1, 2016 • Dinanath Batra

वेदों में शिक्षा को ज्ञान का काजल कहा गया है, इससे दृष्टि और दृष्टिकोण निर्मल तथा स्वस्थ होते हैं।
स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में शिक्षा के माध्यम से हम अन्तर्निहित शक्तियों को प्रकट कर सकते है। उनका यह भी कहना है, 'Education is an emancipation of perfection that is already in man.'

गाँधी जी ने शिक्षा को हाथ, सिर और हृदय को विकसित करने के अभ्यास के रूप में पारिभाषित किया है। श्रीअरविन्द ने कहा है कि ‘शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो शरीर, मन, भावनाओं को समृद्ध करे।' स्वामी दयानन्द ने कहा, 'शिक्षा का अर्थ है जिसके द्वारा व्यक्ति धर्मात्मा, सौम्य, जितेन्द्रिय एवं चरित्रवान् बने।' डेलवर रिपार्ट-1966 में कहा गया है कि शिक्षा निरन्तर उथल-पुथलभरे जटिल
संसार में मानचित्र और रास्ता खोजनिकालने के लिए दिक्सूचक (कम्पास) उपलब्ध कराती है। शिक्षा एक ज्ञान दीप है जो अज्ञानता को काटती और ध्वंस कर देती है जो हमें मृत्यु से अमरता और अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाती है। ‘असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय। 1972 में यूनेस्को ने शिक्षा को सम्पूर्ण मनुष्य विकसित करने की प्रक्रिया कहा था। कार्ल रोजर्स ने शिक्षा के द्वारा सम्पूर्ण मनुष्य का पूर्ण पुष्पित-व्यक्तित्व का विकास कहा है। यूनेस्को ने अपने प्रतिवेदन का नाम दिया है : 'The treasure from within.' ख़ज़ाना अन्दर है।।

शिक्षा हमें इस ख़जाने तक क्यों नहीं पहुँचाती है? गीता इसका उत्तर देती है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘अज्ञानेनावृतम् ज्ञानम्' (भगवद्गीता, 5.15)। अज्ञानता के आवरण को हटाए बिना हम ज्ञानकोश के दर्शन नहीं कर सकते।

शिक्षा अनिवार्य रूप से मनुष्य-निर्माण तथा व्यक्तित्व-विकास की प्रक्रिया है। What is the heart of Education, It is the education of the heart. शरीर की सबलता, प्राणों का सन्तुलन, हृदय की पवित्रता, मस्तिष्क की विवेकशीलता और आत्मा के परिष्कार से आनन्द की अनुभूति ही सम्पूर्ण मानव के लिए शिक्षा है। यह बाह्य तथा अंतर्यात्रा से सम्भव है। महर्षि कणाद ने कहा है, 'यतो अभ्युदय निःश्रेयस सिद्धि सः धर्मः । श्रेयस यात्रा है। निःश्रेयस तीर्थयात्रा है। स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में, ‘जीवन लक्ष्य तक पहुँचने के लिए दोनो यात्राएँ करना अनिवार्य है। इसी में सम्पूर्ण व्यक्तित्व की सफलता है। श्रीमाँ ने कहा है, 'शिक्षा समग्र जीवन की शिक्षा है।'

डॉ. सम्पूर्णानन्द का कथन है कि शिक्षा का लक्ष्य और जीवन के लक्ष्य में कोई अन्तर नहीं।' मनुष्य अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँचने के लिए चार पुरुषार्थ करता है : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। जीवन का अन्तिम लक्ष्य है, बन्धनमुक्ति- मोक्ष को पाना। शिक्षा का भी यही उद्देश्य है- ‘सा विद्या या विमुक्तये' । दोनों का लक्ष्य मोक्ष है। ज्ञान, भक्ति तथा कर्मयोग से दैवी सम्पदा प्राप्तकर हम अपनी आध्यात्मिक यात्रा सम्पन्न करते हैं। जीवन और शिक्षा- दोनों के लक्ष्य की प्राप्ति का प्रमुख साधन धर्म है वह ज्ञान के बिना अन्धा, भावना । के बिना निष्प्राण तथा क्रिया के बिना लूलालंगड़ा है। ज्ञान, भावना तथा क्रिया के संगम से यह यात्रा प्रारम्भ होती है।

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