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शिक्षा का मौलिक अधिकार अधिकार मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा
May 1, 2016 • Adv (Dr) Balram Singh

संविधान के अनुच्छेद 21-क के अनुसार राज्य 6 वर्ष से 14 वर्ष तक की आयु के सभी बालकों को कानून द्वारा निर्धारित ढंग से मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगी। अतः अब सरकार का यह मूलभूत दायित्व है कि वह 6 से 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करे।

मूल भारतीय संविधान में मूलतः शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित नहीं किया गया था। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय की विभिन्न न्यायिक उद्घोषणाओं के अंतर्गत शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार माना गया था। संविधान (86वाँ संशोधन) अधिनियम, 2002, जो 12 दिसम्बर, 2002 को लागू हुआ, के द्वारा संविधान में अनुच्छेद 21-क जोड़कर शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया गया। अतः अब इस अधिकार का हनन होने की अवस्था में इसे न्यायालय आदेश द्वारा लागू करवाया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 21-क के अनुसार राज्य 6 वर्ष से 14 वर्ष तक की आयु के सभी बालकों को कानून द्वारा निर्धारित ढंग से मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगी।

अतः अब सरकार का यह मूलभूत दायित्व है कि वह 6 से 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करे। परन्तु ऐसी व्यवस्था केवल नाममात्र के लिए नहीं होनी चाहिये। उच्चस्तरीय शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 45 में राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्वों में भी राज्य को छः वर्ष तक की आयु के बच्चों की देखभाल करने और शिक्षा की व्यवस्था करने का निर्देश दिया गया है। परन्तु वांछित परिणाम न मिलने पर सन् 2002 में संविधान में संशोधन करके शिक्षा को मौलिक अधिकार का स्तर प्रदान किया गया।

रोहित सिंघल बनाम जवाहर नवोदय विद्यालय (2003 एससीसी.) 68 वी के वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि बच्चे केवल भावी नागरिक नहीं हैं अपितु पृथ्वी का भविष्य हैं। उनके माता-पिता, अध्यापकों और बड़ों का दायित्व उनकी देखभाल करना है। शिक्षा के माध्यम से समाज में बच्चों का भविष्य निर्माण किया जा सकता है। उड़ीसा राज्य बनाम ममता मोहन्ती 2011 (एससीसी) 436 के वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने शिक्षा के महत्त्व पर टिप्पणी करते हुए कहा कि शिक्षा का अर्थ विद्यालय का वह पाठ्यक्रम एवं निर्देश है। जिसे मनुष्य विद्यालय में अध्ययन के समय में प्राप्त करता है। शिक्षा के द्वारा विद्यालय में औपचारिक रूप से प्रशिक्षण की प्रक्रिया और छात्रों में मस्तिष्क, ज्ञान, निपुणता और चारित्रिक विकास होता है।

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