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शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्
June 1, 2016 • Pramod Kaushik

प्राचीन समय में भारत में ऋग्वेद के उपवेद के अंतर्गत आयुर्वेद का विकास हुआ था। इसके साथ ही योग और शल्यक्रिया भी पराकाष्ठा पर थी। समय के साथ बहुत-सी चिकित्सा-पद्धतियाँ भारत में प्रवेश कर गईं जिनमें एलोपैथी और होमियोपैथी प्रमुख हैं। भारत सरकार ने आयुर्वेद, योग, सिद्ध, यूनानी और होमियोपैथी के विकास के लिए आयुष मंत्रालय का गठन किया है। जिस प्रकार चीन ने अपनी राष्ट्रीय चिकित्सा-पद्धति को सम्मान देकर उसके लिए करोड़ों युआन का निवेश करके उसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है; काफी हद तक उसकी पद्धति की विश्व में अलग पहचान बन चुकी है, उसी प्रकार भारत में आयुष को बढ़ावा देने के लिए अलग मंत्रालय का गठन हुआ है और निश्चित ही इसके दूरगामी परिणाम होंगे। एलोपैथी का दुर्ग तोड़ने और स्वदेशी चिकित्सा-पद्धतियों को स्थापित करने की दिशा में आयुष मंत्रालय को अभी बहुत कार्य करने की आवश्यकता है। आयुष मंत्रालय को प्रयास करना होगा कि देश-विदेश से इलाज करवाने भारत में मरीज आयें। इसी के साथ जिस प्रकार आज अनेक पाश्चात्य चिकित्सा की दवाओं ने अपने विशिष्ट साल्ट्स के दम पर अपनी धाक जमाई हुई है, उसी प्रकार आयुर्वेद के कुछ ग्लोबल ब्राण्ड भी स्थापित होने चाहिए।

योग का अर्थ जीवात्मा का परमात्मा से मिलन है। योग चित्तवृत्तियों का निरोध है, जिसके बिना परमात्मा से जुड़ना संभव नहीं है। इधर कुछ दशकों से योग की लोकप्रियता और स्वीकार्यता तेजी से बढ़ी है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के प्रयत्नों से योग पूरे विश्व में महिमामण्डित हो रहा है। योगगुरुओं के प्रयत्नों से आज देश में योग की सैकड़ों पद्धतियाँ प्रचलित हो गई हैं।

पर्यावरण-असंतुलन के इस दौर में शरीर को निरोग और क्रियाशील रखना एक बड़ी चुनौती बन गई है। तकनीकी युग में नयी-नयी बीमारियाँ पनप रही हैं। इसी के साथ स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी तेजी से बढ़ रही है। महानगरों में बड़ी संख्या में लोग ज़िम और योग-क्लासेस की ओर आकृष्ट हो रहे हैं। लोगों की औसत आयु में भी इजाफा हुआ है। विश्व में आधुनिक तकनीकी प्रगति करने के बाद ऐसी दवाएँ बन चुकी हैं जो किसी भी बीमारी में तात्कालिक आराम दे देती हैं। लेकिन यह एक कटु सत्य है कि तत्काल आराम पहुँचानेवाले इलाज से लाभ कम और हानि अधिक हो रही है। इस कारण अब ऐसी ओषधियों पर शोध हो रहा है जो लंबे समय तक और बिना शरीर को नुक्सान करते हुए बीमारी को जड़ से ही मिटा दे। उनकी यही खोज पारम्परिक चिकित्सा-पद्धतियों पर आकर रुक जाती है जिसमें भारत की आयुर्वेद चिकित्सा मुख्य रूप से कारगार पाई जा रही है। ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात, स्वीडन, इण्डोनेशिया और संयुक्त राज्य अमेरिका पहले से ही आयुर्वेद को चिकित्सा सेवा प्रणाली के रूप में मान्यता दे चके हैं और तीस से अधिक देश आयुर्वेद को अपने अपने देश में चिकित्सा-पद्धति के रूप में मान्यता देने जा रहे हैं। लेकिन विदेशों में विगत कई वर्षों से आयुष-चिकित्सा में हजारों वर्षों से उपयोग में आनेवाली औषधियों को पेटेंट कराकर भारत के मौलिक ज्ञान को चुराया जा रहा है। इस पर एक दीर्घकालिक योजना बनाकर कार्य करने की जरूरत है ताकि हम अपने ही ज्ञान को न गॅवा दें।

देश में प्रचलित अलग-अलग चिकित्सा-पद्धतियों और साधना-पद्धतियों की जानकारी से समन्वित ‘दी कोर' का ‘आरोग्य विशेषांक' आप सभी के लिए प्रस्तुत है। हमारी टीम के अथक प्रयत्नों से इस अंक को आरोग्य की अनमोल सामग्रियों से सजाया गया है। नियमित स्तम्भ भी आरोग्य पर केन्द्रित हैं।

‘दी कोर' के शिक्षा विशेषांक' की तरह यह ‘आरोग्य विशेषांक' भी आपको पसन्द आयेगा। अंत में आपको अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुभकामनाएँ देते हुए भारतीय संस्कृति का मूलमंत्र दुहराता हूँ

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत् ।।