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व्यक्ति-स्वातंत्र्य की अवधारणा
July 1, 2017 • Ganga Chaturvedi

जब हम व्यक्ति-स्वातंत्र्य की बात करते हैं, तब प्रश्न उठता है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व की अवधारणा (कॉन्सेप्ट) क्या " है? इस अवधारणा के दो रूप सामने आते हैं : एक तो भारतीय मनीषा की अवधारणा, और दूसरी पाश्चात्य मनीषा की अवधारणा।

पाश्चात्य मनीषा की व्यक्तित्व की अवधारणा, नितांत जड़ पदार्थीय विज्ञान से बनी है। उनकी यह अवधारणा, चेतना (प्राण) रहित मृत शरीर के चीरफाड़ (पोस्टमार्टम) के अध्ययन पर बनी है। इस प्रकार के अध्ययन का परिणाम क्या होता है, एक मस्तिष्कीय विशेष वैज्ञानिक की आत्मस्वीकृति से पता चलता है। वैज्ञानिक कथन है कि उसे मस्तिष्क के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अवयवों का पूरा ज्ञान तो है, परन्तु उनके कार्यकलाप का रत्तीभर ज्ञान नहीं है।' योगशास्त्र के अनुसार मानव-शरीर में सक्रिय छः सूक्ष्म शक्तियों के केन्द्र चक्रों का आकार, सर्प-कुंडली का आकार, वर्गाकार आकार, वतृल आकार मृत शरीर में सब बिगड़े, उल्टेपुल्टे आकार में मिलते हैं, जिसके कारण उनका कार्यकलाप नहीं समझा जा सकता। 

चेतना (जीवन) और गुण आदि तत्त्वरूप (क्वालिटेरिव) का पक्ष है, उसे आप जड़विज्ञान की प्रायोगिक नाप-तौल की मात्रात्मक (क्वांटिटेरिव) प्रणाली से कतई जाँच नहीं कर सकते। वैज्ञानिकों को दावा है कि वैज्ञानिक जाँच प्रणाली (मैथोडोलॉजी) ही उनकी तर्क-सीमाएँ निर्धारित करती है। जाँच प्रणाली की पहुँच स्कल पदार्थीय वस्तुओं तक ही सीमित रहती है, प्रकृति के सूक्ष्म फेमिना (घटनाओं) में जड़ पदार्थीय जाँच-प्रणाली सर्वथा असफल हो जाती है। इस कमी या सीमा की भरपाई वैज्ञानिक काल्पनिक सिद्धान्तों को बनाकर करते हैं। अतः पाश्चात्य मनीषा ने व्यक्ति के व्यक्तित्व की अवधारणा मात्र इन्द्रिय-ज्ञान (इम्पीरियल ज्ञान) के आधार पर व्याख्यायित की है, जो स्थूल पदार्थीय जगत् से मतलब रखता है।

दिक्कत यह है कि आदमी के व्यक्तित्व का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष मन (माइण्ड) का होता है। हृदय, मस्तिष्क, अंतड़ियाँ, किडनी, लिवर मानवीय शरीर में एक स्वतंत्र स्थूल अस्तित्व रखते हैं। मगर शरीर में मन का इस प्रकार कोई स्वतंत्र स्थूल अवयव नहीं होतामन एक होलोग्राफिक व्यवस्था है अर्थात् सम्पूर्ण (होल) शरीर में सूक्ष्म रूप में व्याप्त रहता है, इसलिए उसका कोई स्वतंत्र अंग नहीं हो सकता। इसलिए ये साइंसी प्रणाली के बाहर की बात हो जाती है।

वैज्ञानिक शोध-प्रणाली के कायल आधुनिक मनौवैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक अध्ययन में मन के अस्तित्व को नकारते, गैर-जरूरी मानते हैं। व्यावहारिक मनोविज्ञान (विहेवियरल सायकालॉजी) के मूर्धन्य मनोवैज्ञानिक जे.पी. वाटसन के अनुसार अशरीरी माइंडमन को मनोवैज्ञानिक अध्ययन या चर्चा में शमिल नहीं करना चाहिए। इसे वे अप्रासंगिक मानते हैं। इसी तरह आधुनिक मनोविज्ञान स्मृति (याद्दाश्त) को भी इमेजिनेशन (कल्पना) की प्रतिक्रया मानते हैं।

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