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विश्व हिंदू परिषद् सेवा-कार्यों में बढ़ते कदम
August 1, 2016 • Vinayak Deshpandye

एक हजार वर्ष के निरन्तर संघर्ष से प्राप्त स्वाधीनता के पश्चात् यह इच्छा स्वाभाविक थी कि भारत अपनी वैश्विक भूमिका निर्धारित करे। हिन्दू धर्माचार्य यह अनुभव कर रहे थे कि हिंदू राष्ट्र के रूप में भारत विश्व के समस्त हिंदुओं के आस्था केन्द्र के रूप में स्थापित हो और विश्व-कल्याण के अपने प्रति प्रदत्त दायित्व का निर्वाह करे। इस उदात्त लक्ष्य की पूर्ति के लिए श्रीकृष्णजन्माष्टमी, वि.सं. 2021, तदनुसार 29 अगस्त, 1964 को पूज्य स्वामी चिन्मयानन्द जी (चिन्मय मिशन के संस्थापक) की अध्यक्षता में उन्हीं के मुम्बई-स्थित आश्रम ‘सांदीपनी साधनालय' में आयोजित बैठक में सर्वश्री मास्टर तारा सिंह, ज्ञानी भूपेन्द्र सिंह (अध्यक्ष, शिरोमणि अकाली दल), कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, माधवराव सदाशिवराव गोळवळकर (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक), शिवराम शंकर आपटे, स्वामी शंकरानंद सरस्वती, राष्ट्रसन्त तुकड़ो जी महाराज, वी.जी. देशपांडे (तत्कालीनमहामंत्री, हिंदू महासभा) आदि 40 से भी अधिक सनातनी, सिख, जैन, बौद्ध सन्तों एवं विचारकों की उपस्थिति में विश्व हिंदू परिषद् की स्थापना की गयी।

हिन्दू समाज हजार वर्ष के पारतन्त्र्य काल में अपना स्वत्व, स्वाभिमान, गौरव और महत्त्व भूल गया। उसने उन सब महान् विशेषताओं को अन्धकार में विलीन कर दिया, जिनके बल पर वह विश्वगुरु था। इसी बीच ईसाई पादरियों द्वारा विदेशी डॉलर के बल पर म0प्र0 में अशिक्षित, निर्धन और सामाजिक दृष्टि से कमजोर वर्गों के धर्मान्तरण के समाचार मिल रहे थे। इस समस्या की वास्तविकता जानने के लिए नियुक्त नियोगी कमीशन की रिपोर्ट 1957 में प्रकाशित होते ही देश में हड़कंप मच गया। विदेशों में बसे हिंदुओं की संस्कृति और संस्कारों के संरक्षण की चिंता भी अनेक श्रेष्ठजनों को सता रही थी। त्रिनिदाद से भारत आये एक सांसद डॉ. कपिलदेव ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गोळवळकर से भेंट करके उन्हें कैराबियाई द्वीप समूह में रह रहे हिंदुओं पर मंडराते खतरे की बात कही और विदेशस्थ हिंदुओं से संपर्क स्थापित करने की आवश्यकता परबल दिया।

इन्हीं परिस्थितियों में यह अनुभव किया जाने लगा था कि हिंदू समाज के बीच काम करनेवाला एक संगठन खड़ा किया जाए। स्वामी चिन्मयानंद जी के मन में भी हिंदुओं के एक विश्वव्यापी संगठन बनाने की इच्छा पनप रही थी। इसी मंथन का परिणाम है। विश्व हिन्दू परिषद।।

विश्व हिन्दू परिषद।। । संस्था का पंजीकरण एक्ट 1860' के अंतर्गत दिल्ली में 08 जुलाई, 1966 को हुआ (पंजीकरण संख्या एस 3106) और पंजीकृत संविधान में उद्देश्य लिखे गए (परिषद् के संविधान का पंजीकरण 13 अक्टूबर, 1966 को हुआ) :

1. भारत तथा विदेशस्थ हिंदुओं में भाषा, क्षेत्र, मत, सम्प्रदाय और वर्ग-संबंधी भेदभाव मिटाकर एकात्मता का अनुभव कराना।

2. हिंदुओं को सुदृढ़ और अखण्ड समाज के रूप में खड़ा कर उनमें धर्म और संस्कृति के प्रति भक्ति, गौरव और निष्ठा की भावना उत्पन्न करना।

3. हिंदुओं के नैतिक एवं आध्यात्मिक जीवन-मूल्यों को सुरक्षा प्रदान कर उनका विकास और विस्तार करना।

 4. छुआछूत की भावना समाप्त कर हिंदू समाज में समरसता पैदा करना।

5. हिंदू समाज के बहिष्कृत और धर्मांतरित, पर हिंदू जीवन पद्धति के प्रति लगाव रखनेवाले भाई-बहिनों को हिंदू-धर्म में वापस लाकर उनका पुनर्वास करना।

6. विश्व के भिन्न-भिन्न देशों में बसे हिंदुओं को धार्मिक एवं सांस्कृतिक आधार पर परस्पर स्नेह के सूत्र में बाँधकर उनकी सहायता करना और उन्हें मार्गदर्शन देना।

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