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विमुक्त तथा घुमन्तु जातियों को मिले सम्मान
August 1, 2018 • Anuradha Singh

विमुक्त (डीनोटीफाइड) और घुमन्तु (नौमेडिक) ट्राइब्स में 1 ऐसी जातियाँ, कबीले व समुदाय आते हैं, जिनका संघर्ष 13वीं शती (अलाउद्दीन खिलजी) से लेकर 16वीं शती (ब्रिटिश सरकार) तक निरंतर जारी रहा। इन्होंने मुगलों से डटकर मुकाबला किया; लेकिन रोटी और बेटी का रिश्ता नहीं जोड़ा। अपनी संस्कृति और धर्म के लिए जंगलों में खानाबदोश जीवन बिताया। इन्हें मुगल कभी नहीं हरा सके। ये बहादुर, लड़ाकू और राष्ट्रप्रेमी समूह ही आज विमुक्त कहलाते हैं। और जो अपनी आजीविका के लिए घूमते हैं; अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं या कुशल दस्तकार हैं, वे घुमन्तु या अर्धघुमन्तु (नौमेडिक) कहलाते हैं।

ब्रिटिश काल में खानाबदोश जीवन के कारण ये जंगल और पहाड़ी क्षेत्रों से परिचित थे। गुरिल्ला-युद्ध में माहिर होने के कारण इन्होंने अंग्रेजों को नाकों चने चबवाये। 1857 के युद्ध के बाद दिल्ली में 30 हजार लोगों को फाँसी दी गयी थी। उनमें 70 प्रतिशत यही लोग थे। तभी से वह तीस हजारी कोर्ट कहलाती है। इनके प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा, गौर समाज, धनगर कौम, जिनके नायक यशवन्त सिंह होल्कर थे, कंटया भील, कानपुर से मेरठ संग्राम के नायक खटीक समाज, जिनके गाँव के गाँव आग के हवाले कर दिये थे, संत सेवालाल महाराज आदि थे।

ब्रिटिश सरकार ने इनका खूब दमन किया और 1871 में 'क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट' नामक अमानवीय कानून बनाकर इन्हें अपराधी का दर्जा दे दिया। इस कानून के अनुसार इन्हें कहीं घूमने-फिरने की अनुमति नहीं थी। सुपरिटेंडेट ऑफ पुलिस यदि एक बार इन्हें सजा सुना देता था, तो वही अन्तिम निर्णय माना जाता था। इतना ही नहीं एक लोहे के सिक्के को खूब गर्म करके इनके माथे पर मोहर लगा देते थे,

ताकि इनकी पहचान बनी रहे कि ये अपराधी जाति वाले हैं। थाने में दिन में दो बार हाज़िरी लगानी पड़ती थी। इन्हें विशेष जेलों में कठोर यातनाएँ झेलनी पड़ती थीं। फाँसी, सम्पत्ति-कुर्क, देशनिकाला और जबान भी बन्द। 1924 में यह कानून और सख्त हुआ। इससे 12 साल का बच्चा भी इस कानून की गिरफ्त में आ गया।

सन् 1947 में देश आजाद हो गया; पर ये अभागे आज़ाद नहीं हुए। 194950 में 'क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट इन्क्वायरी कमेटी गठित हुई। उसकी रिपोर्ट के आधार पर प्रधानमंत्री नेहरू जी ने अगस्त, 1952 को इन्हें डीनोटीफाई (विमुक्त) कर दिया। पहले इन्हें सेटलमेंट (14 फुट ऊँची तारबाड़ के घेरे) में रखा जाता था। दिल्ली-जैसे कई शहरों में ये सैटलमेंट आज भी दिखाई पड़ते हैं। सरकार ने इनके उत्थान के लिए निम्न कमीशन गठित किये हैं

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