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विदेशों में उपेक्षित आयुर्वेद की संस्कृत-पाण्डुलिपियाँ
June 1, 2016 • Praveen Kumar Dervedi

संस्कृत-भाषा की प्राचीनता सर्वविदित है। यह अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में विश्वविख्यात रही है। इस भाषा की वैज्ञानिकता, स्पष्ट उच्चारण-क्षमता, सूक्ष्मता आदि विशेषताओं के कारण ही इसमें विपुल साहित्य-सम्पदा है। प्राचीन काल के मनीषियों ने सर्वविध ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए इस वैज्ञानिक भाषा का चयन करके इसमें असंख्य रचनाएँ कीं। भारतीय मनीषियों का सम्पूर्ण ज्ञान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में ही था। केवल मानव ही नहीं अपितु प्रकृति के प्रत्येक कण के प्रति व्यापक दृष्टि रखनेवाले उन ऋषियों ने सर्वस्व त्याग करके भी इस सार्वभौमिक ज्ञान का संरक्षण किया और उन विषम परिस्थितियों में भी ताल, ताम्र, शिला, भोजपत्र आदि कठिन सामग्रियों पर उत्कीर्ण करके उनका संवर्धन किया। पाण्डुलिपियों के अन्वेषण और उनके संरक्षण के उद्देश्य से स्थापित संस्था राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन के एक अनुमानित आँकड़े के अनुसार भारत में लगभग 50 लाख पाण्डुलिपियाँ हैं। भारत में पाण्डुलिपियों का संरक्षण प्रायः पुणे, भुवनेश्वर, तंजावुर, जोधपुर, तिरुवनन्तपुरम्, मैसूर, दिल्ली और इलाहाबाद आदि स्थानों में प्रचुर मात्रा में हुआ है । विश्व में सबसे बड़ी संख्या में संग्रहीत इन पाण्डुलिपियों में अधिकांशतः संस्कृतभाषा में उपनिबद्ध पाण्डुलिपियाँ हैं।

भारतवर्ष विदेशी आक्रमण का केन्द्र रहा है और यहाँ की मूल्यवान् सम्पदाओं में संस्कृत-भाषा में उपनिबद्ध पाण्डुलिपियों को भी अत्यधिक महत्त्व देते हुए अन्य सामग्रियों के साथ विदेशी शासक उनको भी अपने साथ ले गये जो आज भी विदेशों में सुरक्षित हैं। जर्मनी, इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस, पुर्तगाल, अमेरिका, इटली, हॉलैण्ड, तुर्किस्तान आदि राष्ट्रों में संस्कृत-भाषा में उपनिबद्ध अनेक पाण्डुलिपियाँ हैं। ये पाण्डुलिपियाँ वहाँ कैसे गयीं, इसका कोई ठोस प्रमाण उनके पास नहीं है। इन पाण्डुलिपियों में बहुविध ज्ञानभण्डार सुप्त है। इन विषयों का उद्घाटन आवश्यक है। इन पाण्डुलिपियों में आयुर्वेद, राजनीति, युद्धनीति, विज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र, साहित्यशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, कर्मकाण्ड, धर्मशास्त्र, वास्तुशास्त्र आदि अनेक विद्याएँ निहित हैं।

सन् 2005 में बेंगलुरू में आयुर्वेदिक पाण्डुलिपियों पर आयोजित एक संगोष्ठी में डोमिनिक व्युज्स्टाइक ने विदेशों में संरक्षित आयुर्वेद-सम्बन्धी पाण्डुलिपियों की एक संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत की है। तदनुसार म्यूनलबेड की हिस्ट्री ऑफ़ इण्डियन मेडिकल लिटरेचर और विश्वास की बिब्लियोग्राफिक सर्वे ऑफ़ इण्डियन मेनुस्क्रिप्ट कैटोलॉग्स ग्रन्थ इस विषय में महत्त्वपूर्ण है। विदेशों में द इण्ड्यिा ऑफिस लाइब्रेरी एण्ड रिकॉर्ड्स (लन्दन), द बोडलियन लाइब्रेरी (ऑक्सफोर्ड), द युनिवर्सिटी लाइब्रेरी (कैम्ब्रिज), द ब्रिटिश लाइब्रेरी (लन्दन), द वेलकम इन्स्टीट्यूट फॉर द हिस्ट्री ऑफ मेडिसिन (लन्दन) और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में आयुर्वेद-सम्बन्धी हजारों पाण्डुलिपियाँ आज भी विद्यमान हैं। इन संस्थानों में आयुर्वेद से सम्बन्धित 5,000 से अधिक पाण्डुलिपियाँ संग्रहीत हैं।

उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर ऑक्सफोर्ड लाइब्रेरी में आयुर्वेदिक पाण्डुलिपियों में अभ्रकविधि की 1, काशिराज विरचित अजीर्णमंजरी की 2, अग्निवेश-विरचित अज्ञाननिदान की 7, दामोदर कृत आरोग्यचिन्तामणि की 7, वाग्भट्ट विरचित अष्टांगहृदयसंहिता की 4, औषधिकल्प की 1, आयुर्वेदलक्षणाध्याय की 1, सुषेणकृत आयुर्वेदमहौषधि की 1, माधव उपाध्यायकृत आयुर्वेदप्रकाश की 3, दामोदरभट्ट चित्तपावन विरचित आयुर्वेदसंग्रह की 1, बालचिकित्सा की 1, बालरोगाधिकार की 1, भावमिश्रविरचित भावप्रकाश की 2, भोजनहिताहितविचार की 1, तीस्टा विरचित चिकित्साकालिका की 1, विद्यापति विरचित चिकित्साज्ञान की 1, वांग्सेन विरचित चिकित्सासंग्रह की 1, चक्रपाणिदत्त विरचित चिकित्सासारसंग्रह की 2, वांग्सेन विरचित चिकित्सासारसंग्रह की 2, धन्वन्तरि विरचित धन्वन्तरिनिघण्टु की 1, माधवकवि विरचित द्रव्यगुण की 1, मधु विरचित द्रव्यगुणरत्नमालिका की 1, त्रिमल भट्ट विरचित द्रव्यगुणषट्श्लोकी की 5, द्रव्यावलीनिघण्टु की 1, गोविन्द्रमिश्र कृत गोविन्द्रप्रकाश की 1, गुणनिघण्टु की 1, मणिराम मिश्र कृत गुणरत्नमाला की 1, हारीत विरचित हारीतसंहिता की 1, बोपदेव कृत हृदयदीपिका 2, ज्वराधिकारसंग्रह की 1, बलभद्र कृत ज्वरपद्धति की 1, चामुण्डा कायस्थ कृत ज्वरतिमिरभास्कर की 1, ज्योतिष्मतिकल्प की 1, शम्भु-विरचित कालज्ञान की 4, क्षेमश्रमण कृत क्षेमकुतुहल की 2, लोलिम्बराजटिप्पण की 1, मदनपाल कृत मदनविनोदनिघण्टु की 3, पदार्थबोध, पाकाधिकार, पाकावली, पालाश-कल्प, पथ्यापथ्यनिर्णय एवं पथ्यापथ्यविनिश्चय की 1, नरहरि कृत राजनिघण्टु की 1, रसदीपिका की 1, शालिनाथ कृत रसमंजरी की 2, रसमारणविधि की 1, श्रीबिन्दु कृत रसपद्धति की 1, रसप्रदीप की 1, रामकृष्ण कृत रसराजसंस्कार की 1, श्रीनाथ कृत रसरत्न की 1, राम कृत रसरत्नदीपिका की 1, नित्यनाथ सिद्धकृत रसरत्नाकर की 1, रामकृष्ण भट्ट कृत रसेन्द्रकल्पद्रुम की 1, माधव कृत रुग्विनिश्चय की 9, माधवकृत रुग्विनिश्चयसमास की 1, रुग्विनिश्चयटिप्पणी की 1, साध्यासाध्यपरीक्षा की 1, जनार्दन कृत सद्वैद्यकौस्तुभ की 1, सन्निपातचन्द्रिका की 1, सन्निपातकालिका की 3, कैदेवकृत सन्निपातकालिका की 1, सन्निपातार्णव की 1, कल्हणकृत सारसमुच्चय की 1, गणेशभिषक् कृत सारसंग्रह की 5, शाङ्गदेव कृत शाङ्गधरसंहिता की 7, शिरोरोगाध्याय की 1, स्त्रीगर्भशूलचिकित्सा की 1, सुश्रुतविरचित सुश्रुतसंहिता की 1, शाधर कृत त्रिशती की 1, धन्वन्तरि कृत वैद्यभास्करोदय की 2, श्रीकण्ठशम्भुकृत वैद्यहितोपदेश की 1, लोलिम्बराज कृत वैद्यजीवन की 11, वैद्यकसारसंग्रह की 1, मोरेश्वरभट्ट कृत वैद्यामृत की 4, वैद्यसारसंग्रह की 1, रामेश्वरकृत वैद्यसर्वस्वसंग्रह की 1, हस्तिरुचिकृत वैद्यवल्लभ की 4, गोपालदासकृत वैद्यविलास की 1, शङ्करभट्टकृत वैद्यविनोद की 1, प्रयागदत्तकृत विज्ञानानन्दकरी की 1, हर्षकीर्तिकृत योगचिन्तामणि की 9, योगकल्पद्रुम की 1, गुणाकरकृत योगरत्नमालाविवृत्ति की , अमितप्रभाकृत योगशत की 1, योगशतक की 1, योगशतक वृद्ध की 2, वन्दीमिश्रकृत योगसुधानिधि की 3, सुन्दरदेवकृत योगोक्तिलीलावती की 1 और सुन्दरदेवकृत योगोत्युपदेशामृत की 1 पाण्डुलिपियाँ विद्यमान हैं।

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में आयुर्वेदिक पाण्डुलिपियों में जयदत्तकृत अश्वायुर्वेद की 1, चरकविरचित चरकसंहिता की 1, गयदास कृत न्याय-चन्द्रिकापंजिका की 1, राजमार्तण्ड की 1, मतिराम विरचित रसराज की 1, सोमदेवकृत रसेन्द्रचूड़ामणि की 1, नकुल त शालिहोत्र की 1, शाङ्गधर विरचित शाङ्गधरसंहिता की 1, सुश्रुतविरचित सुश्रुतसंहिता की 1, शाङ्गधर कृत त्रिशती की 1, लोलिम्बराज कृत वैद्यजीवन की 1, वांग्सेन कृत वैद्यवल्लभसंग्रह की 1, नागार्जुन कृत योगशतक की 2 पाण्डुलिपियाँ संरक्षित हैं।

इसी प्रकार ब्रिटिश लाइब्रेरी में लगभग 70 और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में 30 आयुर्वेदिक पाण्डुलिपियाँ संग्रहीत हैं। इन पाण्डुलिपियों की लिपि देवनागरी और भाषा संस्कृत है । पाण्डुलिपियों के अन्तर्गत टीकाएँ और व्याख्याएँ भी संस्कृत में ही हैं। भारतीय शोध-छात्रों को अपने ही ज्ञान को जानने के लिये अधिक राशि का व्यय करना पड़ रहा है । जे.एन.यू. के विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्र के एक शोध-छात्र को जर्मनी से एक संस्त पाण्डुलिपि की 12 पृष्ठ की प्रतिलिपि ऑनलाइन मंगाने पर लगभग 80,000 रुपये व्यय करना पड़ा था। जबतक हम विदेशों में रखी हुई पाण्डुलिपियों को भारत में नहीं ला पायेंगे, तब तक हम अपने अतीत तथा उसमें संरक्षित अनमोल ज्ञान को पूर्णरूप से जानने में असमर्थ ही रहेंगे। विदेशों में संस्कृतज्ञान को बढ़ावा देकर इसको जानने का प्रयत्न किया जा रहा है जो भारत में सहजता से सम्भव है क्योंकि यहाँ की संस्कृति ही संस्कृत पर निर्भर रही है। निश्चित रूप से संस्कृतज्ञों के लिए सम्प्रति केन्द्र सरकार अधिक प्रयत्नशील है क्योंकि उनको यह ज्ञान है कि भारत को संस्कृत के बिना जाना और समझा नहीं जा सकता है। इसी परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी देश और विदेश के अपने वक्तव्य में संस्कृत के उद्धरणों को आदरपूर्वक स्थान देते हैं। उनके सत्प्रयास से 21 जून को अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस का प्रारम्भ हुआ। जब व्यक्ति उचित कार्य करता है तो अपेक्षाएँ और बढ़ जाती हैं। हमारी भी सरकार से अपेक्षा है कि जिस प्रकार योग को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसी प्रकार आयुर्वेद के लिए भी और अधिक परिश्रम होना चाहिये। योग और आयुर्वेद परस्पर सम्बद्ध हैं। विदेशों में संरक्षित पाण्डुलिपियों को भारत में लाकर आयुर्वेद और संस्कृत-विद्वानों द्वारा उस ज्ञान का भली-भाँति प्रकाशन होना चाहिये। न केवल आयुर्वेद अपितु अन्य विषयों की पाण्डुलिपियों को भी लाना भारतीय ज्ञान के लिये अत्यन्त आवश्यक है। अतः भारत सरकार को इस दिशा में शीघ्र और सफल प्रयास करना चाहिये, जिससे कि भारतीय जनमानस इस भारतीय ज्ञान के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित कर सके।