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विज्ञान एवं अध्यात्म में समन्वय
December 1, 2016 • L. Karnal Atam Vijay Gupta

 समन्वय एक प्रक्रिया है। केवल तज्ञ पुरुष (विशेषज्ञ) ही यह प्रक्रिया पूर्ण कर सकता है। अतः यह स्पष्ट है कि समन्वय, भले ही वह विज्ञान एवं अध्यात्म के क्षेत्र में हो, केवल एक तज्ञ पुरुष की अपेक्षा करता है। इस प्रक्रिया के क्रियान्वयन के लिए ज्ञान, कौशल एवं तन्मयता की आवश्यकता है। ये गुण प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं ताकि समन्वय पूर्ण रूप से हो तथा विभिन्न क्षेत्रों की प्रकृति के आवश्यकता के अनुसार ये गुण विभिन्न प्रमाणों (मात्रा) में पाए जा सकते हैं। उदाहरणार्थ : धातुओं के मिश्रण के लिए ओषधि क्षेत्र, धातुक्षेत्र अथवा रसायन क्षेत्र के विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है। संक्षेप में समन्वय (मिश्रण) के लिए विभिन्न प्रकार के ज्ञान तथा कौशल की आवश्यकता है। अतः विज्ञान तथा अध्यात्म के समन्वय के लिए एक दूरदर्शी सबल व्यक्ति (नेता) की आवश्यकता है। जो विज्ञान क्षेत्र का विशेषज्ञ हो। आज की भाषा में हम उस विशेषज्ञ को योगी या अध्यात्मवेत्ता कहते हैं।

 

वैज्ञानिक क्षेत्र (तकनीक) में नियमित व निरंतर अभ्यास के द्वारा प्रकृति की वास्तविकता एवं सत्य की खोज की जा सकती है। यहाँ वैज्ञानिक तकनीक का अर्थ (भाव) वास्तविकता तथा पूर्ण तन्मयता से तकनीक का क्रियान्वयन है। प्रकृति के गर्भ में हमारे लिए दैवीय योजना रहती है। मानव द्वारा बनाई गई योजना से प्रकृति की योजना अधिक सटीक होती है। दोनों योजनाओं में समानता है दोनों का परिणाम-आधारित होना। दैवीय योजना प्रकृति (प्रारब्ध) बनाती है तथा उसका क्रियान्वयन मनुष्य पर छोड़ देती है तथा मनुष्य अपनी योजनाएँ स्वयं ही बनाता है तथा क्रियान्वयन भी स्वयं ही करता है। सामान्य मनुष्य तथा दूरदर्शी कुशल (क्वांटम) मनुष्य में अन्तर यह है कि कुशल मनुष्य प्रकृति से मार्गदर्शन प्राप्त करके प्रकृति की योजना का कार्यान्वयन सफलतापूर्वक करता है। सामान्य मनुष्य अपने स्वभाव तथा इच्छानुसार योजना का क्रियान्वयन करता है। वह स्वेच्छा को परमात्मा की इच्छानुसार ढालता नहीं, अतः प्रकृति के मार्गदर्शन के लाभ से वञ्चित रहता है। दूरदर्शी सबल मनुष्य को प्रकृति परमात्मा द्वारा प्रदत्त छठी इन्द्रिय के प्रयोग की प्रेरणा देती है। एक बार 'टाटा संज' के योजना-निदेशक ने नीतिगत योजना से संबंधित विषय पर भाषण देते हुए कहा कि किसी निर्णय पर पहुँचने से पूर्व वे बहुत बड़े प्रमाण में सांख्य (आंकड़े) एकत्रित करते हैं। परंतु अन्तिम निर्णय वे छठी इंद्रिय की सहायता से लेते हैं। यह सिद्ध करता है कि दूरदर्शी कुशल नेता सदा अपनी आंतरिक छठी इंद्रिय की सलाह से काम करते हैं। वे ही ऐसे योग्य व्यक्ति हैं जो मार्गदर्शन करने की क्षमता रखते हैं। वे ही विज्ञान तथा अध्यात्म के समन्वय की योग्यता रखते हैं।

कुशल नेता की पहचान है उसमें समग्र रूप से संगठित व्यक्तित्व का होना। उसमें अपनी आंतरिक कमजोरियों (प्रवृत्तियों) पर विजय प्राप्त करने के लिए तथा बाह्य रूप से योजनाओं को सफलतापूर्वक कार्यान्वित करने की महान् ऊर्जा (क्षमता) होती है। ऐसे कुशल व्यक्तित्व इस ग्रह पर विरले ही होते हैं। सामान्य व्यक्ति का ऊर्जाक्षेत्र विश्व की ऊर्जा-क्षेत्र का ही अंश (भाग) है। उसमें स्वयं को कुशल नेता बनाने की पर्याप्त क्षमताएँ हैं यदि वह स्वयं में उपलब्ध ऊर्जा को अपने निश्चय, स्वानुशासन तथा कुशल तकनीकों के अभ्यास के साथ विश्व की ऊर्जा से जोड़ ले। अतः प्रत्येक व्यक्ति में कुशल नेता बनने की क्षमता निहित है।

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