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विज्ञान एवं अध्यात्म की दूटी को पाटने का कार्य
November 1, 2016 • Le. Karnal Atam Vijay Gupta

नाेबेल पुरस्कार विजेताओं द्वारा ] जाँच-पड़ताल करना तथा विज्ञान एवं अध्यात्म में सह- संबंध बनाने के लिए उनके द्वारा रुचि लेना, एक उत्साहवर्धक प्रक्रिया है। ऐसे बुद्धिजीवियों प्रकट किए गए उद्गारों से विज्ञान एवं अध्यात्म के परस्पर पूरक होने की आवश्यकता का महत्त्व प्रतीत होता है। मानव जीवन के किसी भी पहलू के आध्यात्मिक विश्लेषण को शीघ्रतापूर्वक समझने के लिए निश्चित विचारधारा तथा गहनतापूर्वक ग्रहण किए गए सिद्धान्त इस बात की ओर संकेत करते हैं कि मानव को प्रदत्त उच्चस्तरीय नाड़ीतंत्र सदा रचनात्मक खोज की ओर वृत्ति का है, चाहे यह रचना (सृजनता) स्वयं के सुधार की हो या नये विचार तकनीक या सिद्धान्त खोजने की हो, ताकि पृथिवी नामक ग्रह पर संपूर्ण जीवन में अच्छा परिवर्तन लाया जा सके।

मानव की इस वृत्ति का सुंदरतम पहलू यह है कि सुधार की यह प्यास उसे प्रसन्नता प्रदान करती है तथा वह अपनी इस खोज में सतत लगा रहता है ताकि उसे अनन्त प्रसन्नता प्राप्त हो सके। जब तक वह वाञ्छित परिवर्तन (सुधार) के साथ एक रूप नहीं हो जाता उसे वह प्रसन्नता प्राप्त नहीं होती। यह विशेष पहलू स्वयं मानव को भी आरंभ में आसानी से समझ नहीं आता, अतः वह इस प्रक्रिया में सतत लगा रहता है। धीर-गंभीर साधक प्रथम तो इसी जीवन में ही अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं अथवा आगामी जीवन में। ये धीर- गंभीर साधक वे लोग हैं जिन्होंने सकारात्मक मानसिकता प्राप्त कर ली है। हम उन्हें वैज्ञानिक वृत्तिवाले साधक भी कह सकते हैं। वे ऐसे लोग हैं जिनका दृष्टिकोण तर्कसंगत होता है। उनकी इस वृत्ति (दृष्टिकोण) को मनोवैज्ञानिक वृत्ति (दृष्टिकोण) भी कहा जा सकता है।

शरीरशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता एक साहसिक चिकित्सक चार्ज रोबर्ट रिचेट (1850-1935) ने इस प्रकार अपने विचार व्यक्त किया : ‘आध्यात्मिक ज्ञान को विज्ञान द्वारा अभी तक आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त नहीं हुई है। परंतु शीघ्र ही...'। एडिनबर्ग में मैं 100 शरीरशास्त्रियों की उपस्थिति में मैं उन्हें यह विश्वास दिला सकता कि केवल हमारी पाँच ज्ञानेंद्रियाँ ही ज्ञान का माध्यम (स्रोत) नहीं तथा वास्तविकता का अधूरा ज्ञान कभी- कभी बुद्धिमत्ता को भटका देता है...। क्योंकि वास्तविकता के प्रति ज्ञान की कमी वास्तविकता के अस्तित्व को नकार नहीं सकती। यदि कोई विषय जटिल (अत्यंत कठिन) हो तो क्या कठिनाई के कारण उसे समझने का प्रयत्न न करना समझदारी होगा? जो लोग अध्यात्म को सामान्य विज्ञान की मान्यता देने के लिए तैयार नहीं, भविष्य में उन्हें उसी प्रकार लज्जित होना पड़ेगा जिस प्रकार रसायनशास्त्र के विरुद्ध आवाज़ उठानेवाले यह कहकर लज्जित हुए थे कि दार्शनिकों के कथन भ्रामक थे। सिद्धांतों के विषय में यह कहा जा सकता है कि लेवोसियर (1743-1794), क्लॉड बर्नाल्ड (1813-1878), तथा पास्चर (1822-1895) के सिद्धान्तों को सब जगह परखा जा रहा है। अतः नवीन विज्ञान स्वागत योग्य है क्योंकि मानव के विचारों में इससे एक क्रांति ला दी है।

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