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विकास और विरासत-संरक्षण के बीच झूलता उदयपुर
August 1, 2017 • Nirmal Agasty, Dr. Hemant dhirvedi

किसी भी सभ्यता की पहचान वहाँ के सभ्य लोगों द्वारा होती है तथा उनके द्वारा सुव्यवस्थित नगर- नियोजन उनकी आमुख पहचान होती है और नियोजित नगर के निर्माण के साथ इनके कलात्मक सौन्दर्यांकरण से जनजीवन में रचनात्मक भाव की उत्पत्ति पैदा करता है। भारत दुनिया में एक सबसे पुरानी सभ्यता है।

लगभग 10 हजार साल का दर्ज़ इतिहास हमारे पास मौजूद है। जो नये प्रमाण मिले हैं, वे यही बताते हैं कि ऋग्वेद का समय 8000 ईसा पूर्व है। तबसे आज तक हमारी सभ्यता में एक निश्चित निरंतरता है और परिर्वतन भी देखने में आए हैं। हमारी सम्पूर्ण सभ्यता को सापेक्ष रखकर देखें, तो ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं जो इस बात की ओर संकेत करते हैं कि नीतिशास्त्र, भाषाशास्त्र, व्याकरणशास्त्र, वास्तुशास्त्र, धर्मशास्त्र के मामले में सारी दुनिया भारत की ऋणी है। कला, योग और आयुर्वेद तो ऐसे कुछ विषय हैं जिनके बारे में आज भारत की देन की चर्चा तो बहुत पहले से खुले रूप में हो रही है। इस बात के प्रमाण हैं कि उत्तरवैदिक काल से अर्थात् हड़प्पाकालीन सभ्यता से समुद्री यात्रा और व्यापार के माध्यम से भारत का पूरे एशिया से सम्पर्क स्थापित था और हड़प्पा-सभ्यता ही वह सभ्यता है जिसमें सारी दुनिया में सबसे पहले नागरिक-संस्कृति और नगरसभ्यता मिलती है। नगर की योजनाएँ, भवन निर्माण, सड़क, कुआँ, स्नानघर- ये सब इतने व्यवस्थित रूप से हमें सबसे पहले 3000 ईसा पूर्व यहीं देखने को मिलते है। (प्रो. रमेश सी. भारद्वाज, ‘हम रहे हैं। विश्वगुरु', राजस्थान पत्रिका, उदयपुर, 18 अप्रैल, 2015, पृ. 8)। वही सभ्यता आनेवाले समाज और व्यवस्था की आधारशिला बनी; क्योंकि एक सुव्यवस्थित नगर के सौन्दर्गीकरण को भव्य व कलात्मक इमारतों ने प्रभावशाली बनाया है।

कला और समाज का सम्बन्ध अत्यन्त निकट और घनिष्ठ है। यह सम्बंध युगों-युगों से विभिन्न माध्यमों, विचारों और प्रयोजनों के साथ विकसित होता रहा है। कला समाज का महत्त्वपूर्ण अंग है जो समाज को नवीन दिशाओं की ओर ले जाने का प्रयास करता है। कला का प्रयोजन मानसिक सुख, शान्ति, आनन्द व नवीन सौन्दर्य की उत्पत्ति करना है और सृजनात्मकता के माध्यम से समाज को नवीन चेतना प्रदान करते हुए उन्नति की और अग्रसर करना है। कलाकार ने अपनी अभिव्यक्ति को समाजरूपी दर्शक के सम्मुख रखा है और पूर्व में राजकीय संरक्षण में इसे धर्म, संस्कृति, सभ्यता, आनन्द, आवश्यकता और सुविधा आदि के निर्माण या विकास के साथ कला को आधार बनाया गया, चाहे वह चित्रकला, संगीत, मूर्तिकला या वास्तुकला हो, जिसे वर्तमान में कुछ क्षेत्रों में प्रशासनिक सहयोग है।

समाज और कला के क्षेत्र में हम यहाँ बात करेंगे नगरीय सौन्दर्गीकरण में हमारी ऐतिहासिक धरोहरों की महत्ता व शहरी सौन्दर्याकरण में विभिन्न कलाओं के योगदान के बारे में। हर शहर के इतिहास को वहाँ की संस्कृति, सभ्यता और ऐतिहासिक धरोहरों से जाना जा सकता है। उदाहरण के लिए हमारे पूर्वजों द्वारा विरासत में मिली ऐतिहासिक इमारतें हैं जो वर्तमान में एक मेट्रो शहर के बीच मिल ही जाती हैं। ये ऐतिहासिक इमारतें ही हैं जो हमें विरासत में मिली शहरी सौन्दर्गीकरण का आधार हैं, जिन्हें संजोए रखना समाज व प्रशासन का दायित्व है।

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