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वर्तमान राजनीति में गिरते मूल्य का कारण एवं समाधान-एक समीक्षा
November 1, 2018 • Dr. Varsha Nalme

इंदौर (म.प्र.) निवासी भारत के जाने माने इतिहासकार एवं कालमर्मज्ञ नर्मदाप्रसाद उपाध्यायजी का उस विषय पर कहना है कि विगत कई दशको से राजनीतिकी स्थिति में कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ है, वरन नई तकनीकियों के कारण विकृतियाँ औ जन्मी है। मेरी पीढ़ी के राजनीतिज्ञों ने निराश किया है। किन्तु कुछ समय से जो आशास्पद स्थिति बनी है कहीं वह भी दिया स्वप्न न बन जायें।

पतन का कारण हमारा स्वयं का मूल्यहीन होना है। हम अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए तदर्थ हल खोज लेते हैं मूल्य आधारित विकास की अवधारणा हमारे लिये हमारे चरित्र में नहीं रही एवं दूसरों पर दोषारोपण हमारी आदत बन चुकी है। हम आत्म विश्लेषण करना ही नहीं चाहते। सुझाव की बात पर उनका मानना है कि जबतक हममे गुणात्मक सुधार नहीं होगा तब तक हम समाज में उदाहरण नहीं बनेंगे। सुधार संभव नहीं है स्वच्छ राजनीतिज्ञों का चयन निःस्वार्थ योगदान स्वयं तथा समाज की जागरूकता आवश्यक है राजनीति में खुले विचार रखें हैं। यह हमारा क्षेत्र नहीं है यह न कहें वरन हमारी सेवा भावना सक्रियता ही राजनीति के अवमूल्यन में सकरात्मक बदलाव ला सकता हैं। 

मीरा स्मृति प्रतिष्ठान के निदेशक एवं चित्तौड़ (राजस्थान), वरिष्ठ संपादक मीरायन' के एस.एन. समदानी जी के राजनीति के अवमूल्यन पर वेहद स्पष्ट विचार है। पहले राजनीति में 'नीति' प्रमुख थी अब ‘राज' प्रमुख हो गया है। नीतियों को राजनीतिज्ञ भूल गये हैं। केवल राज ही रह गया जिसके लिये कितने ही मूल्यों की अवहेलना करना पड़े। आजादी के पश्चात् से ही ‘मूल्यप्रधान भारत' मूल्यविहीन होता गया। इसका प्रमुख कारण जो समदानी जी मानते हैं संविधान की गलत व्याख्या है जो कर्तव्य प्रधान लोकतंत्र होना चाहिये था वह अधिकार प्रमुख लोकतंत्र में परिवर्तित कर दिया गया है वहीं से अवमूल्यन आरंभ हुआ। आजादी के पहले एक ही लक्ष्य था स्वतंत्रता।

वह बाद के दशकों में स्वछंदता में बदल गया। इस अवमूल्यन से बचाव करना है तो छोटी उम्र से ही मूल्य प्रधान शिक्षा प्रदान की जाना चाहिये। परिवार समाज एवं देश का वातावरण मूल्य आधारित होना चाहिये हम नैनिकता का आचारण करें अधिकारों की चर्चा न करके कर्तव्यों पर बल दें बिना चिंतन एवं निर्णय किये मिलने वाले अधिकार देश में विकृति पैदा कर रहे हैं इसमें सुधार तभी संभव है जब संविधान एवं व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन किये जाये। नवीन पुनः विचार और पुनः निर्माण की आवश्यकता हैं। समाज हित देशहित में कठोर नियम सजा का प्रावधान एवं उन पर कठोरता से पालन अतिआवश्यक हैं। जिस देश की संस्कृति सभ्यता का अनुसरण विश्वकरता आ रहा है उसे देश के नेताओं का विजन ऐसा होना चाहिये कि हमारे रीति-रिवाज संस्कृति परंपराओं का पुनः मूल्य निर्माण हो सके और भारत पुनः सांस्कृतिक देश कहलाने लगे।

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