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वनवासी क्षेत्र में खेलों के
January 1, 2018 • Atul Jog

वनवासी कल्याण आश्रम 1952 से । देश के अनुसूचित जनजाति समाज के सर्वांगीण विकास हेतु कार्यरत है। आश्रम वनवासी क्षेत्र में शिक्षा, कौशलविकास, स्वास्थ्य, ग्राम-विकास, आर्थिक विकास, युवा एवं महिला-सशक्तीकरण हेतु विभिन्न सेवा प्रकल्प एवं उपक्रम चला रहा है। ‘एकलव्य-खेलकूद' कल्याण आश्रम के कार्य का एक प्रमुख अंग बन गया है।

असम के तेजपुर शहर में वनवासी युवाओं की राज्यस्तरीय क्रीड़ा- प्रतियोगिताओं का आयोजन वनवासी कल्याण आश्रम द्वारा किया गया था। तेजपुर एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नगरी है, जिसका पौराणिक नाम शोणितपुर है। असमिया-भाषा में चूँकि शोणित अर्थात खून को तेज कहते हैं, अतः इस नगर को कालान्तर में तेजपुर कहा जाने लगा। महाभारत काल में यहाँ बलिपुत्र बाणासुर का राज्य था। बाणासुर की पुत्री उषा ने अपने पिता को बिना बताए श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध से गन्धर्व-विवाह कर लिया। इस बात का पता चलने पर बाणासुर ने दोनों को अग्निगढ़ में बंदी बनाकर रख दिया। अपने पौत्र को मुक्त कराने श्रीकृष्ण द्वारका से यहाँ आये। बाणासुर से उनका युद्ध हुआ। बाणासुर ने अपने को कमजोर पड़ता जानकर अपने आराध्य महादेव शंकर का आह्वान किया। अपने भक्त का मान रखने के लिए महादेव शंकर ने श्रीकृष्ण से युद्ध किया। इसे हरि-हर युद्ध कहा गया। इस कथा का वर्णन श्रीमद्भागवतपुराण में है।

हाँ, हम बात कर रहे थे तेजपुर शहर में वनवासी युवाओं के राज्यस्तरीय क्रीड़ा प्रतियोगिता की। उस खेल-प्रतियोगिता में असम के विभिन्न जिलों से खिलाड़ी आए थे। ये खिलाड़ी ग्रामीण क्षेत्र से आये थे। प्रतियोगियों का कोई प्रशिक्षण नहीं हुआ था, फिर भी उनका उत्साह देखने लायक था। प्रतियोगिता में मैराथन का आयोजन भी किया था। बालिकाओं की मैराथन 14 कि.मी. दूरी की होती है। मैराथन दौड़ के एक दिन पहले खिलाड़ियों का स्वास्थ्य- जाँच एवं परीक्षण होता है। चिकित्सकों ने सभी खिलाड़ियों की जाँच की और प्रियंका नामक एक बोडो-बालिका को मैराथन दौड़ के लिए स्वास्थ्य के आधार पर अयोग्य घोषित कर दिया। प्रियंका रोने लगी, बार-बार आग्रह करने लगी कि मैं दौड़ सकती हूँ। चिकित्सक बार-बार उसे समझाने का प्रयास कर रहे थे, किंतु वह मान ही नहीं रही थी। उसकी एक ही रट थी कि मुझे एक मौका दीजिये। चिकित्सक ने नाराज होकर कह दिया दौड़ोगी तो मर जाओगी। प्रियंका भी तपाक से बोली, नहीं मरूंगी।

अंत में यह निर्णय किया गया कि प्रियंका को दौड़ने का मौका दिया जाएगालेकिन उसे चेस्ट-नम्बर' नहीं दिया जाएगा। यानी कि वह स्पर्धा में सहभागी नहीं रहेगी। उसे यह शर्त मंजूर हुई।

दूसरे दिन सबेरे छ बजे खिलाड़ी तैयार होकर मैदान में पहुँचे। सभी उत्साहित थे। लड़कियों की 14 कि.मी. की स्पर्धा आरंभ हुई। सभी के साथ प्रियंका भी दौड़ने लगी। पीछे-पीछे रुग्णवाहिका (एम्बुलेंस) भी चल रही थी। यदि किसी को कुछ तकलीफ़ हुई, तो उसे उठाकर वाहिका में रखने की व्यवस्था की गई थी। आयोजकों को लग रहा था कि प्रियंका को चिकित्सा की आवश्यकता पड़ सकती है। सभी उत्साह से दौड़ रहे थे। धीरे-धीरे पाँच कि.मी., दस कि.मी. पार हुए। रास्ते पर उत्साह बढ़ाने के लिए लोग खड़े थे। देखते-देखते बालिकाएँ 14 कि.मी. की दौड़ की पूर्णतावाली रेखा पास आने लगी। वहाँ पर टाइम कीपर और रेफरी खड़े थे। और एक लड़की तेजी से आगे बढ़ते हुए जीत गई। देखा कौन है तो वह प्रियंका थी। उसने वहाँ पहुँचकर आयोजकों को पूछा और भी दौड़ना हैक्या? ऐसा आत्मविश्वास देखकर सभी दर्शक अचम्भित रह गये।

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