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लोह पथ गामिनी
February 1, 2018 • Arvina Gahlot

छुट्टियाँ शुरू होने के पहले ही बच्चों ने रेल की जगह हवाई-यात्रा का प्लान बनाया, सासू माँ को इस बात की भनक लग गई। वे हवाई यात्रा को तैयार नहीं थीं, काफी मान-मनौव्वल करने पर आखिर में मान ही गयीं।

आज जब हम एयरपोर्ट पहुँचे, वेटिंग एरिया में बैठते ही “अरे बहू ये सभी को परेड क्यों करवा रहे थे।''

"माँ, वे इसी तरह चेकिंग करते है।''

“अच्छा चल वो तो माना, पर ये बता यहाँ किसी के पास टेम न है क्या बात करने का, हमारी तो प्लेटफार्म पर अब तक जाने कितनो से बात हो गई होती।''

“ये देखो यहाँ सब अपने-अपने मोबाईल में लगे हैं।''

“बहू ये हर समय का देखत रहत हैमोबाईल में, किसी के पास बतियाने का टेम ही न है?''

“माँ ! चलिए उड़ान का समय हो गया है।''

प्लेन में घुसते समय एअर होस्टेस सभी का मुस्कुराकर अभिवादन कर रही थी। माँ सीट पर बैठते ही कहने लगी “अरे बहू ये काय इतना नकली मुस्कुरा रही थी।''

“अरे माँ जी, मंदी का दोर है, कहाँ से असली मुस्कुराहट लाये बेचारी।'' जैसे ही एयर होस्टेस सुरक्षा-निर्देश देने लगी, माँ कहने लगी, “बहू बैठते ही लगता है, कोई नयी मुसीबत आ गई क्या? बहू हमने पहले ही मना किया था, अब भुगतो, राम राम न जाने अब क्या मुसीबत आनेवाली है।''

“नहीं माँ, वो केवल समझा रही है। जरूरत पड़ने पर सुरक्षा उपाय कर सकें, मुसीबत नहीं आई है, ऐसा कुछ नहीं है। आप आराम से बैठी रहिए।''

“अब हमारे विमान ने चलना शुरू किया तो माँ ने आँखों को बंद कर लिया। बिलकुल छोटे बच्चे की तरह वे मासूम लग रही थीं। कुछ पल बाद आँखों को खोला तो देखा अभी विमान रनवे परचल रहा है। “बहू देखो पैसा ले लिया ये तो सड़क पर ही घुमा रहा है।'' “अरे माँ देखिये अभी उड़ान भरेगा।'' विमान के उड़ान भरते ही माँ बस राम राम जपने लगीं। कुछ देर बाद ही एयर हास्टेस सेंडविच लेकर आई तो माँ ने नाक-मुँह सिकोड़कर कहा, “नहीं हम नहीं खायेंगे ये सेंडविच, न यहाँ हाथ पैर फैलाकर बैठ पा रहे हैं, ऊपर से ये पेट पर बेल्ट कसी है, हम नहीं खायेंगे। इससे तो अच्छा हमारी रेल का सफर । होता था, मजे से घर की बनी आलू-पूड़ी खाओ, इधर-उधर घूम लो, मांगकर अखबार पढ़ लो, अब यहाँ ये कमर बाँधकर बैठे रहो। रेल में यात्रियों की आवाजाही लगी रहती थी। कभी मूंगफली वाला आता। कम-से-कम टाईम पास करने के लिए खरीदकर खा लेते थे । कभी-कभी गाने बजानेवाले डब्बे में चढ़ आते, सच बड़ा ही सुरीला संगीत सुनने को मिलता। यहाँ तो ये सजी-धजी आधे कपड़े पहने न जाने थोड़ी-थोड़ी देर में क्या कहती रेवे हैं। हमरी तो कुछ समझ में नहीं आता है।''

बात करते-करते न जाने कब माँ को नींद आ गयी। मैंने चैन की साँस ली। कुछ ही समय बाद विमान उतरने लगा माँ को जगाया।

“माँ! उठिए।'' उतरकर माँ से जब पूछा ‘‘कैसी लगी यात्रा।'' “ये क्या बहू इतने पैसे ले लिए और तुरंत उतार दिया।'' “कुछ भी कहो बहू हमारी लोह पथ गामिनी की बात ही अलग है।''