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लोहागढ़ दुर्ग - भरतपुर
May 16, 2019 • प्रीति शर्मा

राजस्थान प्रांत अपनी गौरवशाली परम्परा के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के राजाओं ने अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु प्राण तक न्यौछावर कर दिए। राजस्थान की ऐसी ही एक रियासत है- भरतपुर।राजस्थान का पूर्वी सिंहद्वार कहलाने वाला भरतपुर जिसका लोहागढ़ दुर्ग अजेय दुर्ग के नाम से प्रसिद्ध है क्योंकि मुगल हों या अंग्रेज कोई भी इस दुर्ग पर विजय प्राप्त नहीं कर पाया। यद्यपि भरतपुर के इतिहास को निर्धारित करने में वहाँ की भौगोलिक स्थिति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, किन्तु फिर भी भरतपुर राज्य के सृजन में 18वीं सदी के दो असाधारण व्यक्तित्व - ठाकुर बदनसिंह एवं महाराजा सूरजमल का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

अठारहवीं सदी की पांचवी शताब्दी तक न तो संगठित रूप से जाट राज्य था न कोई जाट शासक था जिसे सर्वमान्य नेता कहा जा सके। यद्यपि चूड़ामन इस स्थिति तक पहुँच गया था किन्तु बदनसिंह को कैद करने के बाद उसने अपनी प्रतिष्ठा खो दी थी। अतः चूड़ामन को बिरादरी का मुखिया स्वीकार नहीं किया गया। बदनसिंह में बड़ी से बड़ी चुनौतियों एवं समस्याओं का सामना करने का असाधारण गुण विद्यमान था। उसे जयपुर के कच्छवाहा शासक जयसिंह का संरक्षण प्राप्त था। जयसिंह ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए बदनसिंह को चूड़ामन की गद्दी पर बिठा दिया तथा जाटों को अपना विरोधी बनाने के बजाय अपने पक्ष में रखने का समझदारीपूर्ण कार्य किया।

भरतपुर के पहाडी उत्तरी क्षेत्रों में बँखार मेव बसते थे, इस्लाम धर्म को मानने वाले इन लोगों की आजीविका का साधन लूटपाट था। जयसिंह ने बदनसिंह से मेवों की उच्छृखलता को रोकने एवं उनका दमन करने को कहा। बदनसिंह ने अपने युवा पुत्र सूरजमल एवं निकट संबंधी ठाकुर सुल्तानसिंह को मेवों के दमन हेतु भेजासूरजमल अपने इस कार्य में सफल रहा। इस अभियान की सफलता से प्रसन्न होकर जयसिंह ने सूरजमल को निशान, नगाडा और पंचरंगा झंडा दिया। साथ ही उन्हें * 'ब्रजराज'' की उपाधि भी प्रदान की। दो लाख चालीस हजार रुपए वार्षिक कर लेकर उसने मेवात को बदनसिंह के अधीन कर दिया। बदनसिंह ने धीरे-धीरे जयसिंह का पूर्ण विश्वास प्राप्त कर लिया तथा आगरा, दिल्ली और जयपुर जाने वाले राजमार्ग पर गश्त करने और इन राजमार्गों का उपयोग करने वालों से पथ कर उगाहने का कार्य प्राप्त कर लिया।

बदनसिंह का अगला कार्य था, अपनी नई राजधानी के लिए उपयुक्त स्थान की खोज। थून के साथ उसकी कुछ अप्रिय स्मृतियाँ जुड़ी थी, तथा सिनसिनी भी मात्र एक बड़ा गाँव था, जहाँ पर्याप्त पानी भी नहीं था। अतः महात्मा प्रीतम दास की सलाह पर डीग को राजधानी के लिए चुना गया। डीग के आसपास के इन इलाकों में सिनसिनवारों के अलावा एक अन्य प्रमुख जाट परिवार डीग के दक्षिण पश्चिम में स्थित सोगर गाँव के सोगरियों का था। यह चारों ओर से दलदल से घिरा था बरसात में इस गाँव तक पहुँचना दुश्कर कार्य था। रक्षा की दृष्टि से यह आदर्श जगह थी। युद्ध के समय बाणगंगा और रूपारेल नदियों का पानी आसपास के क्षेत्र को जलमग्न करने के लिए छोड़ा जा सकता था। जिससे शत्रु आगे ना बढ़ सके। खेमकरण सोगरिया ने सोगर तथा उसके आसपास के इलाकों पर 18वीं सदी के प्रारम्भ में अधिकार जमा लिया था। उसने सबसे ऊँची जगह पर एक किला बनबाया और उसका नाम फतहगढ़ रखा। इसी स्थान पर अनेक वर्षों तक उसका कुटुम्ब फलता-फूलता रहा। बदनसिंह की माँ अचलसिंह सोगरिया की बेटी थी। परन्तु दो अभिमानी कुटुम्बों का भरतपुर में एक साथ शांतिपूर्वक रहना असंभव था। बदनसिंह अपने पड़ौस में किसी प्रतिद्वन्दी शक्ति को बर्दाश्त नहीं कर सकता था। अतः उसने 1732 ईस्वी में अपने युवा पुत्र सूरजमल को सोगर पर अधिकार करने के लिए भेजा। सूरजमल ने सोगर को जीत लिया। सोगर पर अधिकार करने के पश्चात् एक दिन सूरजमल घोड़े पर सवार होकर आसपास के जंगलों में घूमने निकल गया। वहाँ आसपास का दृश्य उसे बहुत ही मोहक लगा तथा उसने उसी स्थान पर अपनी राजधानी बनाने का निश्चय किया। 19 फरवरी 1733 ईस्वीं में भरतपुर के नवीन दुर्ग एवं अपनी राजधानी के निर्माण का कार्य सूरजमल ने आरम्भ करवाया। डीग के स्थान पर अब भरतपुर जाट राज्य की राजधानी का नया केन्द्र बन गया। राज ज्योतिषियों ने निर्माण कार्य के लिए सही दिन एवं मूहूर्त चुना। एक बार निर्माण कार्य प्रारम्भ होने के पश्चात् 60 वर्षों तक चलता रहा। मुख्य किलेबंदियाँ 8 वर्षों में पूरी हुई। महाराजा सूरजमल ने इस नवनिर्मित दुर्ग का नाम भरतपुर रखा था, जो शीघ्र ही हिन्दुस्तान में जाट राजधानी के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

भरतपुर का यह दुर्ग मैदान में बना हुआ है। जो भूमि दुर्ग की श्रेणी में आता है। यह नगर के दक्षिणी हिस्से में बना हुआ पक्का दुर्ग है, किले की सुरक्षा के लिए 100 फीट चौडी खाई के बाहर मिट्टी की ऊँची दीवार बनाई गई है, जिसे भेद कर आज तक कोई शत्रु किले में प्रवेश नहीं कर सका। दुर्ग में प्रवेश के लिए चारों ओर की खाई पर दो पुल बनाये गये तथा खाई में मोतीझील से सुजान गंगा नहर द्वारा पानी लाया गया। यह झील रूपारेल और बाणगंगा नदियों के संगम पर उनके जल को बाँध के रूप में रोककर बनाई गई। इस किले की यह विशेषता है कि इसकी जल से भरी हुई विस्तृत खाई तथा बाहरी मिट्टी की विशाल प्राचीर इसकी रक्षा व्यवस्था में सहयोग करती थी। महाराजा सूरजमल ने अन्य दुर्गों के दोषों को ध्यान में रखते हुए समय की आवश्यकता के अनुरूप नया किला बनवाया। कहा जाता है कि मुख्य किलेबन्दियाँ आठ वर्ष में पूरी हो गई। जबकि इसके परिवर्तन रूपान्तर और विस्तार का कार्य महाराजा जसवन्तसिंह (1853 से 1893 ई.) के राज्यकाल तक चलता रहा। इस दुर्ग का फैलाव 6-5 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में है जो आयताकार है। दुर्ग में दो विशाल प्राचीरें हैं जिनमें भीतरी प्राचीर ईंट-पत्थरों से पक्की बनी हुई है। तथा बाहरी प्राचीर मिट्टी की है। दुर्ग की इस प्रकार की बनावट से लड़ाई के समय तोप के गोले मिट्टी की बाहरी प्राचीर में ही धंस जाते थे जिससे किले के आंतरिक भाग तथा महलों को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुँचता था। यह किला अपने आप में कई दृष्टिकोणों से अद्भुत रचना थी। किले में निर्मित दो खाईयों में से बाहरी खाई लगभग 250 फीट चौडी एवं 20 फीट गहरी थी। इस खाई की खुदाई से जो मलवा निकला वह उस 25 फीट ऊँची और 30 फीट चौड़ी दीवार को बनाने में लगा जिसने नगर को पूरी तरह से घेरा हुआ था। इनमें दस बड़े दरवाजे थे, जिनसे आवागमन पर नियंत्रण रहता थाजिनके नाम हैं- मथुरा दरवाजा, बीनारायण दरवाजा, अटलबंध दरवाजा, नीम दरबाजा, अनाह दरवाजा, कुम्हेर दरवाजा, चांदपोल दरवाजा, गोवर्धन दरवाजा, जघीना पोल, सूरजपोल, इनमें से किसी भी दरवाजे से प्रवेश करने पर रास्ता एक पक्की सड़क पर जा निकलता था जिसके परे एक भीतरी खाई थी जो 175 फीट चौड़ी एवं 40 फीट गहरी थी इस खाई में पत्थर और चूने का फर्श किया गया था। भरतपुर दुर्ग की सुदृढ़ प्राचीर में आठ विशाल बुर्ज हैं चालीस अर्द्धचंद्रकार बुर्ज हैं तथा दो विशाल दरवाजे हैं इनमें से उत्तरी द्वार अष्टधातु निर्मित है तथा दक्षिणी दरवाजा लोहिया दरवाजा कहलाता है। अष्टधातु दरवाजा भव्य, सुदृढ एवं कलात्मक है जिसे 1765 ई. में महाराजा जवाहर सिंह मुगलों के शाही खजाने की लूट के साथ ऐतिहासिक लाल किले से उतार कर लाये थे। जनश्रुति के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी अपने चित्तौड़ अभियान के समय यह अष्टधातु निर्मित दरवाजा चित्तौड़ से दिल्ली लेकर आया था। किले की आठ विशाल बुर्जा में सबसे प्रमुख बुर्ज जवाहर बुर्ज है यह बुर्ज महाराजा जवाहर सिंह की दिल्ली विजय के स्मारक के रूप में है। यह बुर्ज सबसे ऊँची है। आसमान साफ होने पर इस बुर्ज पर चढकर फतेहपुर सीकरी का बुलन्द दरवाजा देखा जा सकता है। भरतपुर राज्य के जाट राजवंश के राजाओं का राज्याभिषेक जवाहर बुर्ज में होता था। अंग्रेजों पर विजय के प्रतीक स्वरूप 1806 ई. में फतेह बुर्ज का निर्माण करवाया गया था। दक्षिणी- पश्चिमी भाग में सिनसिनी बुर्ज है उस बुर्ज को जेठमल बुर्ज भी कहते हैं इस बुर्ज पर 'सिनसिनवार' नाम की तोपें चढ़ाने से इसे सिनसिनी बुर्ज कहा जाता है। अन्य बुर्ज- बागर वाली बुर्ज, दक्षिण-पश्चिम में नवलसिंह वाली बुर्ज, भैंसा वाली बुर्ज, गोकुलाराम बर्जु तथा कालका बुर्ज हैकालका बुर्ज पर कालिका देवी की पूजा की जाती थी।

इस किले में सूरजमल की रानी किशोरी का महल तथा रानी लक्ष्मी महारानी का महल है। किले में रहने वाले महल कई शासकों द्वारा निर्मित कराये गये जिसका मुख्य भाग महाराजा बलवन्त सिंह द्वारा निर्मित करवाया गया था इस भवन में पत्थर की जालीदार खिड़कियाँ एवं महराव लतामण्डपों के अंलकरण से युक्त है। यह कक्ष पृथक-पृथक भागों में विभाजित है। महल खास और दरबार खास में वर्तमान में संग्रहालय बना दिया गया है। जिसमें शिलालेख, मुर्तियाँ, अस्त्र-शस्त्र, वस्त्र एवं अन्य पुरातत्व महत्व की सामग्रियाँ दर्शनीय हैं। जिसके गुम्बदीय छत्तों के मध्य गोलाकार अलंकरण एवं खिड़कियाँ हैं। कक्ष में स्थित स्तंभ भी कलात्मक एवं अलकरण युक्त है। इसका एक प्रमुख भाग 'हमाम' है जिसकी कारीगरी अत्यंत कलात्मक एवं दर्शनीय है। इसमें निर्मित फब्बारे एवं पच्चीकारी का काम उत्कृष्ट है। दुर्ग में निर्मित 'कमरा खास महल में विशाल दरबार आयोजित होते थे। राजा का राजतिलक भी इसी महल में होता था। 17 मार्च 1948 ई. को 'मत्स्य संघ का उद्घाटन इसी महल में आयोजित हुआ था।

किले के अन्दर भरतपुर के आराध्य 'बिहारी जी का मंदिर स्थित है जिसके गर्भाशय में भगवान श्री कृष्ण एवं राधा जी की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर की वास्तुकला उत्कृष्ट एवं दर्शनीय है।

यह भारत के उन गिने चुने दुर्गों में से है जो किसी भी शत्रु से पराजित नहीं हुआ है। मराठे, मुगल एवं अंग्रेज इस किले पर विजय प्राप्त करने में असफल रहे। अंग्रेजों ने इस किले को अपने साम्राज्य में मिलाने के लिए तेरह बार आक्रमण किये किन्तु उन्हें असफलता का मुँह देखना पड़ा। अंग्रेजी सेना से लड़ते हुए होल्कर नरेश जसवंतराव भागकर भरतपुर आ गये महाराजा रंजीत सिंह ने उन्हें रक्षा का वचन दिया। लार्डलेक ने रंजीतसिंह को जसवंतराव को अपने हवाले करने का फरमान सुनाया। जिसे रणजीत सिंह ने ठुकरा दिया। इससे नाराज होकर 1805 ई. में लार्डलेक ने भरतपुर पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेजी तोपों के गोलों के हमलों के बाद भी भरतपुर दुर्ग अजय रहा। इस युद्ध के विषय में कहा है-

हुई असल मशहूर विश्व में, आठ फिरंगी नौ गोरे। लडे किले की दीवारों पर खडे जाट के दो छोरे।

सर जदुनाथ सरकार लिखते हैं- ''सूरजमल का मुख्य लक्ष्य यह था कि भरतपुर की ऐसी मजबूत किलेबंदी कर दी जाये कि वह बिल्कुल अजेय हो और उसके राज्य की उपयुक्त राजधानी बन सके।'' महाराजा सूरजमल अपने इस उद्देश्य में पूर्णतः सफल हुए।

यह दुर्ग मैदानी दुर्गों की श्रेणी में विश्व का प्रथम दुर्ग है जिसका निर्माण भारतीय दुर्ग निर्माण पद्धति पर किया गया है। यह दुर्ग अजेय होने के कारण ही लोहागढ़' कहलाता है। इस दुर्ग के विषय में एक कवि ने लिखा है :-

दुर्ग भरतपुर अडग जिमि, हिमगिरी की चट्टान।

सूरजमल के तेज को, अब लौ करत बखान ।।