रोमानियत, रोमांस और प्यार की परिभाषाओं की अभिव्यक्ती...
June 23, 2019 • प्रेम भारद्वाज | "ज्ञानभिक्षु

प्रगति गुप्ता के काव्य संग्रह 'तुम कहते तो... की कविताएँ जीवन के कैनवास पर उकेरी गई ऐसी रचनाये हैं, जो सर्द हवाओं-सी छूती है। कन्या भ्रूण हत्या हो या विभिन्न वेदनाओं की अभिव्यक्तियाँ, मार्मिक है। प्रायः प्रथम संग्रह की रचनाएँपहली संतान की तरह ज्यादा ही देख रेख पा जाने से विशेष बन जाती है। गुणात्मक विचार इस संग्रह के सशक्त पहलू हैं। प्रगति गुप्ता जी मानवीय गुणों को काव्यात्मक रूप देने में प्रवीण है। इनकी कुछ रचनाये समाज की विभिन्न स्थितियों- परिस्थितियों में चेतना के बिम्ब प्रस्तुत करती हैं। आपका रचनात्मक कौशल जन-सामान्य के अन्तर्मन को झकझकोर देने में समर्थ हैं। माँ व बच्चों से जुड़ी रचनायें सकारात्मक सन्देश देती है। भाषा और विषय भी संतुलित व सटीक हैं। एक ही संग्रह में जीवन के काफी सारे विषयों का होना उसको विशष बना देता है। हालांकि काव्य शिल्प की अपनी सीमाए होती है पर प्रगति गुप्ता की अभिव्यक्तिओं मे अर्थों की कहीं कमी नहीं दिखाई देती है। भावों को उन्हें जीना आता है। उनके काव्य की एक खूबसूरती यह भी है कि वो कहीं तो प्रश्न खड़े करती नजर आती है और दूसरी ओर स्वयं ही उनके समाधान देती हुई नजर आती है। रोमानियत, रोमांस और प्यार की परिभाषाओं को अभिव्यक्त करती रचनायें बहुत सुन्दर बन पड़ी है। कदाचित यह उनका पहला संकलन नहीं लगा। उनके काव्य के कुछ शीर्षक-विवाह-विच्छेद, मोहब्बत झुका देती है, उड़ान बेहद पसंद आए। संग्रह का शीर्षक तुम कहते तो... बहुत लुभाता है। प्रगति गुप्ता जी ने अपने इस संग्रह के साथ काव्य जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। उनका साहित्यिक क्षेत्र में स्वागत है।

शब्दों से परे..

प्रगति गुप्ता का दूसरा काव्य संग्रह 'शब्दों से परे... प्रेम की अनुपम अनुभूतियों से जुड़ा संग्रह है। सोचा था पढने के बाद अन्त में लिखेंगा कि कथन और काव्य विन्यास जैसे कई पैमानों पर यह काव्य संग्रह वास्तव में शब्दों से परे है। पर इसका तो शीर्षक ही शब्दों से परे है। जब मैं समीक्षा के मानदण्डों को खोज रहा था तब इनके काव्य संग्रह में व्यावहारिकता और सरलता के प्रतिमान देखने को मिलते हैं। आधुनिक कविताओं के सशक्त बिम्ब प्रेम, प्यार, मोहब्बत और लौकिकता से अलौकिकता के अनुभव करवाती रचनाये मुझे पढने को मिली। प्रगति गुप्ता के अन्तर्मन से निकले कुछ काव्य शीर्षक जैसे 'मेरे जैसे तुम मिले, इतना आसान कहाँ था, तुम और मैं एक ही, जब समर्पण स्वीकृत हो, छूटा पर खोया नहीं, कुछ देर ही सही, दिल को प्रेम से जुड़े काव्योत्कर्ष के भाव दे जाते हैं। समीक्षक होने के नाते कुछ काव्य रचनाएँ ऐसी लगी जैसे वो अपने चरम से पहले ही खत्म हो गई हो परन्तु उत्सुकता भी रही शायद इसका जबाब कहीं और किसी कविता में मिलेगा। 'एक दूसरे को खोजने की चाहतें? जब तक जिन्दा रहती है? जीने के अहसास धड़कते है... इसका रस पाठक बन समझ आया पर प्यास अधूरी रही.. मैंने तुम्हारे कहे शब्दों के? अल्पविरामों में महसूस करके देखा है'... ख्याल जितना जीवन्त है उतना ही सार्थक भी... 'दोहरी जिन्दगी' शीर्षक काव्य संग्रह का उत्कर्ष है। प्रगति गुप्ता जी का काव्य प्रेम के रसातल से जिन्दगी को उभारना चाहता है। 'बहुत कुछ बदलता है' शीर्षक से जुडी कविता आधुनिक कविताओं का प्रतिनिधित्व करती नजर आती है। दूसरा काव्य संग्रह खत्म किया ही था कि मेरी नजर तीसरे काव्य संग्रह पर पड़ी जिनमे मुझे विचारों और भावनाओं का और भी विस्तार देखने को मिला।

सहेजे हुए अहसास

शिल्पकार की पहचान उसकी कृति से होती है। प्रगति गुप्ता जी का काव्य संग्रह 'सहेजे हुए अहसास' शिल्प की दृष्टि से उच्च आयाम लिए हुए है। प्रगति गुप्ता बहुत सहजता के साथ आम व्यक्ति के अनुभवों से उपजी विसंगतियों का बहुत स्वाभाविक-सा वर्णन करती है। उनकी रचनाधर्मिता मानवीय गुणों के आस-पास घूमती हुई उस घड़ी-सी प्रतीत होती है जो कि निराकार और शाश्वत हैउनकी कुछ रचनाएँ गूढ़ अर्थ लिए हुई समाज को आईना दिखाती हुई प्रतीत होती है। उनकी काव्यात्मक क्षणिकाएँ तीक्ष्ण व मार्मिक धार लिए हुए हैं जो सिहरन पैदा करती है। उनके कुछ प्रश्न निरुत्तर से लगे। परन्तु समाज और परिवार में होने वाली वेदनाओं का बखूबी से सृजन कर प्रस्तुत करने के लिए प्रगति गुप्ता बधाई की पात्र है। कुछ पसंद आने वाली रचनाओं के अंश उल्लेख्लनियाँ हैं...

'अपनी धडकनों को जिंदा रख निभाते है लोग।', यह माँ ही तो है जिसके पास मरने के बाद भी? अपने बच्चों के लिए? बहुत कुछ होता है?, माँ वाली कविता बहुत मार्मिक व उद्देश्यपूर्ण लगी। मैं सृजन करना नहीं छोडूंगी' कविता स्त्री जीवन के बहुत सशक्त पहलू को दशार्ती है। क्या यही आधुनिकता' कविता की यह पंक्तियाँ बहुत कुछ कहती है जिस्म की भूख को माध्यम बना? इन्होने सभी संस्कारों को झुठलाया है'... 'तुम कैसे समझ पाओगे मेरी पीड़ा? कब तुमने मेरे अन्तः की पीड़ा जानी है' नारी के मार्मिक मनोभावों की अभिव्यक्ति है। 'पर कुछ यादों की उम्र? वही ठहर मेरे जिंदा होने के अहसासों से मुझे मिलवाती रही... यह कविता विरह वेदना का सुन्दर संयोजन है।

प्रगति गुप्ता का रचना-संसार बहुत उम्दा शैली से से भरा हुआ और आधुनिक काव्य जगत में विशेष स्थान लिए हुए है। आशा करता हूँ भविष्य में वो देश और विदेश को एक बेहतरीन रचनाकार से साक्षात्कार करवाती रहेगी। आपकी तीनो कृतियों की कुछ रचनाये यकीनन बरसों बाद भी आपकी प्रतिनिधि रचनाओं में चुनी जायेंगीयह मेरे आशीर्वचन है और आपकी कविताओं की क्षमताओं को साधुवाद! यूँ ही सदा-सर्वदा 'प्रगति' करती रहिये।