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रोजगार-सृजन और गरीबी दूर करने का सशक्त साधन
September 1, 2018 • Sushil Kumar Sharma

मानव मन सदा से प्रकृति का साथ चाहता है। इसीलिए तमाम व्यस्तताओं से बचकर वह जा पहुँचता उस छाँव में, जहाँ वह खुद को पुनर्नवा कर सकता है। इस प्रक्रिया में वह कभी नदियों को जीतता है, कभी पर्वतों को लाँघता है। तो कभी मरुस्थलों को टोहता है।

भारतीय परम्परा में परिव्राजक का स्थान प्राचीन काल से ही है। संन्यासी को किसी स्थान विशेष से मोह न हो, इसलिए परिव्राजक के रूप में पर्यटन करते रहना होता है। ज्ञान के विस्तार के लिए अनेक यात्राएँ की जाती थीं। आदि शंकर और स्वामी विवेकानन्द की प्रसिद्ध भारत-यात्राएँ इसी उद्देश्य से हुईं। बौद्ध-धर्म के आगमन पर गौतम बुद्ध के सन्देश को अन्य देशों में पहुँचाने के लिए अनेक भिक्षुओं ने लम्बी यात्राएँ कीं। अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को इसी उद्देश्य से लंका भेजा। सामान्यजन के लिए ज्ञान के विस्तार और सामूहिक विकास के लिए तीर्थयात्राओं की व्यवस्था भी प्राचीन भू-पर्यटन का ही एक रूप थी।

जिस तरह शब्दों का आलोपन, विलोपन चेतना को झंकृत करता है, उसी तरह ऋतुओं का नर्तन और ऐतिहासिक स्थापत्य, मन को वीतरागी, तो कभी मयूर कर देता है। पर्यटन खुद से पुनः-पुनः जुड़ने का अवसर तो है ही, साथ ही सांस्कृतिक धरोहर और विरासत से जुड़ने का मौका भी।

भारत का पर्यटन और स्वास्थ्यप्रद पर्यटन मुहैया कराने की दृष्टि से विश्व में 5वाँ स्थान है। भारत-जैसे विरासत के धनी राष्ट्र के लिए पुरातात्त्विक विरासत केवल दार्शनिक स्थलभर नहीं होती वरन् इसके साथ ही वह राजस्वप्राप्ति का स्रोत और अनेक लोगों को रोजगार देने का माध्यम भी होती है।

स्वास्थ्य-पर्यटक शोध अथवा अनुसंधान के उद्देश्य से पर्यटक की श्रेणी में आते हैं। मुख्यतः ये छोटे-छोटे समूहों में विभिन्न प्रजातियों और जातियों का अध्ययन करते हैं। यहाँ पर्यटक मानव के सन्दर्भ में स्थानीय रूप से जन्म-मृत्यु दर, स्वास्थ्य, आवास, धर्म, त्योहार, रीतिरिवाज, शिक्षा, भोजन, मानव-बस्तियों की बनावट आदि संबंधित आँकड़ों को एकत्रित करते हैं। विभिन्न स्कूलों, विश्वविद्यालयों एवं समाजसेवी संस्थाओं द्वारा इसी प्रकार की यात्राएँ आयोजित करवाई जाती हैं।

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