राष्ट्रभाषा के पुरोधाः भारतेंदु हरिश्चन्द्र
September 25, 2019 • Parmod Kumar Kaushik

आधुनिक हिन्दी साहित्य के जन्मदाता, हिंदी भाषा के परिष्कारकर्ता तथा भारतीय नवोत्थान के प्रतीक भारतेंदु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितम्बर, 1850 ई. को हुआ था। उन्होंने मात्रा चौंतीस वर्ष, तीन महीने, सत्ताइस दिन जीवित रहे और 12 जून, 1885 ई. को उनका देहान्त हो गया। उनका यह परिमित जीवन असाधारण रचना-शक्ति, राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना के प्रवर्तक तथा युगांतरकारी व्यक्तित्व के त्रिवेणी-संगम का परिचायक था। भारतवर्ष के राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक एवं नैतिक क्षितिज पर होनेवाले युगांतरकारी महापरिवर्तन के अरुणोदय की सूचना बनकर आप देश की जनता के सामने प्रगट हुए थे। इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने विशुद्ध लोकचेतना, सांस्कृतिक समष्टिगत वेदना तथा परतंत्राता की पीड़ा का प्रतिनिधित्व कर अपनी बहुमुखी प्रतिभा के व्यापक कार्यों के कारण भारतीय जन-जीवन को सपफल नेतृत्व प्रदान किया। भारतेन्दु की अल्पायु को देखते हुए उनके महान् साहित्यिक अवदान को दैवीशक्ति से प्रेरित ही कहा जाएगा। बाबू राधाकृष्णदास जी ने उनकी दो सौ अड़तालीस रचनाओं का उल्लेख किया है। इतनी कम अवधि में इतना विपुल साहित्य विश्व के और किसी साहित्यकार के द्वारा सर्जन करने का उदाहरण नहीं मिलता है।

समाज को राष्ट्र की सेवा के लिए, राष्ट्र को संघटित और सशक्त बनाने के लिए उनकी सबसे प्रमुख घोषणा थीः

'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल।'

बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटत भारतेन्दु एक राष्ट्रभाषा की कल्पना के मौलिक प्रवर्तकों में से थे। उन्होंने इस रहस्य का साक्षात्कार किया कि बिना भाषा के माध्यम के, न तो राष्ट्र में एकसूत्राता ही आ सकती है और न अंग्रेजों को सब कुछ समझने की दास मनोवृत्ति दूर हो सकती है। इसी कारण उन्होंने हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए आजीवन सेवा का व्रत लिया और भाषाभिमान के जागरण द्वारा जनता के हृदय में राष्ट्र-गौरव का भाव जगाने के अनवरत प्रयास में वे लगे रहे। हिन्दी की सेवा के लिए उन्होंने जो तपश्चर्या की, उसका विकसित परिणाम है कि स्वतंत्रा भारत में हिंदी आज राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित हो सकी।

राष्ट्रभाषा के परिष्कार, राष्ट्रोद्धार तथा समाज सुधार के कार्य में वे आजीवन संलग्न रहे। उनके लिए राष्ट्रभाषा का प्रेम भारत भक्ति का पर्याय था। वस्तुत वे हिन्दी साहित्याकाश के इंदु थे और इसीलिए भारत के भी इंदु थे। हिन्दी और भारत के प्रति उस महापुरुष का कितना उपकार है, यह अधुनातन अध्ययन और अनुसंधान से स्पष्ट होता जा रहा है। उनके अनंत उपकारों का स्मरण करके ही स्व. मैथिलीशरण गुप्त ने कहा थाः

'कह सकता है कौन, कि कितना काम किया है?

हिंदी पर सर्वस्व उन्होंने वार दिया है।'

मन-वचन-कर्म से उन्होंने हिंदी की सेवा के व्रत का निर्वाह किया। निस्संदेह हिंदी के अलख जगानेवालों में उनका स्थान सबसे ऊंचा था। उस युग में राष्ट्र के मनोभावों, नवीन आकांक्षाओं और भारतीय स्वतंत्राता-प्राप्ति की नयी हलचलों को लेखन और वाणी के क्षेत्रों में अभिव्यक्ति के लिए जिस साधन की आवश्यकता थी, वह हिंदी गद्य के रूप में प्रकट हुआ। भारतेंदु ने 1863 ई. में 'हरिश्चन्द्र मैगजिन' के प्रकाशन के साथ एक नए गद्य का प्रवर्तन किया उसका मेल राष्ट्र के नए हृदय के करा दिया। उनके काव्य-संगम में सात्त्विक श्रृंगार, ईश्वर भक्ति राष्ट्रभक्ति की त्रिवेणी लहराती है। उन्होंने अपनी ओजस्विनी वाणी तथा सशक्त व्यंजनाशैली द्वारा देशप्रेम, भाषाप्रेम स्वतंत्राता की भावना स्पफूर्त की। अपनी बहुमुखी प्रतिभा के कारण नाटक उपन्यास, निबंध, इतिहास, समाचार प्रकाशन आदि विभिन्न क्षेत्रों में हिन्दी का प्रयोग किया। उनका अनुकरण हुए हिन्दी में गद्य लेखकों की एक परंपरा चल पड़ी। इंद्र जैसे अपने वज्र से रुंधे जल स्त्रोतों को खोल देता तो मूसलाधार वृष्टि होने लगती है, उसी प्रकार भारतेंद्र हरिश्चन्द्र ने हिन्दी भाषा के रुंधे हुए को खोल दिया और उनसे छूटे हुए प्रवाह साहित्य की भूमि को सींचते हुए ओर फैल गए। भारतेंदु-युग हिन्दी साहित्य में गद्य के सर्जन का स्वर्णकाल बन चारों दिशाओं से विविध विधाओं साहित्य-निर्माण होने के कारण मानो साहित्य की वीरान पड़ी हुई धरती शस्यश्यामल बनकर मंगल रचनाओं से लहलहा उठी। कल्याणकारी भावों की प्रतिष्ठा हुई। उनके हृदय की सरसता भक्ति, शृंगार और राष्ट्रीयता का प्रवर्तन करनेवाली भावधारा में बह निकली। सचमुच 'भारत-भानु' का 'प्रकाश' किंवा 'स्वराज्य' तो हो गया, दासता भी जाती रही। पर, सभी प्रकार से उन्नत न होने के कारण हृदय-कमल कहाँ खिला और दुख का नाश भी कहाँ हुआ? राष्ट्रभाषा को वह सम्मान कहाँ मिला, जो मिलना चाहिये था? राजकीय कामकाज अर्थात प्रशासन और शिक्षा के माध्यम के रूप में उपेक्षित होकर हिन्दी जाने क्यों राजनीति का शिकार हो रही है? अब उनकी 168वीं जयंती तथा राजभाषा की विश्वयात्रा पर राष्ट्रभाषा को पूर्ण गौरव प्रदान करने का संकल्प लेकर उस महाप्राण को सच्ची श्रद्धाजलि दें, यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है।