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रामपाल सिंह ‘सब्दलपुरिया'
January 1, 2019 • E. Hemant Kumar

श्री रामपाल सिंह का जन्म जनपद बिजनौर (उ. प्र.) के ग्राम फीना में हुआ था। इनकी जन्मतिथि का ब्यौरा उपलब्ध नहीं है, परंतु वर्तमान में इनकी आयु लगभग 105 वर्ष है। इस हिसाब से इनका जन्म सन् 1905 से 1910 के बीच किसी वर्ष में हुआ होगा। श्री रामपाल सिंह के पिता जी छतर सिंह चौहान कृषक थे। इनके परिवार को गाँव में सब्दलपुरिया के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में इनका घर दक्षिण फीना में सतियों के स्मारक/मंदिर के पास है। रामपाल सिंह ने कक्षा तीन तक उर्दू भाषा पढ़ी हैं। उस जमाने में बहुत कम लोग पढ़े-लिखे होते थे, तथा हिंदी भाषा का प्रचलन बहुत कम था।

इन्होंने 1942 के असहयोग आंदोलन में भाग लिया था। नूरपुर क्षेत्र के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानियों ने आम जनता तथा क्रांतिकारियों से 16 अगस्त 1942 को नूरपुर थाना पहुँचकर तिरंगा फहराने की अपील की थी। इसके लिए श्री रामपाल सिंह भी 16 अगस्त 1942 को गांव के अन्य लोगों के साथ नूरपुर थाना पहुँचे थे। वह फीना से नूरपुर के लिए लगभग 10.00 बजे चले थे, इनके दल में 20-25 लोग थे। ये थाने पर अन्य लोगों की तुलना में कुछ देर पहले ही पहुँच गए थे, इसलिए इनको थाने की बाउंड्री के पास खड़ा होने का मौका मिल गया था। वहाँ से इन्हें थाने के अंदर तथा चाहरदिवारी के आस-पास होने वाली सभी घटनाएँ दिखाई पड़ रही थी। इनके सामने ही परवीन सिंह ने सबसे पहले तिरंगा फहराने की कोशिश की थी, जिस पर पुलिस ने उन्हें गोली मार दी थी। गोली लगने के कुछ मिनटों बाद ही परवीन सिंह के प्राण निकल गए थे। इसके बाद रिक्खी सिंह ने तिरंगा खड़ा किया था। श्री रामपाल सिंह ने बताया कि स्वतंत्रता सेनानियों को थाने से भगाने के लिए जब पुलिस ने आसमान में अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी तब गोली के कुछ छरें इनके आसपास गिरे थे। और जिन लोगो पर पुलिस ने लठियाँ बरसायी थीं, वे इनसे थोड़ा सा ही आगे खड़े थे। नूरपुर से लौटकर आप भी कुछ समय के लिए भूमिगत हो गए थे। पुलिस को इनका नाम नहीं पता चल पाया, और किसी सरकारी रिकॉर्ड में इनका नाम दर्ज नहीं हुआ। इस कारण इनको स्वतंत्रता सेनानी पेंशन भी नहीं मिल पायी। इन्होंने बताया कि जिस समय फीना के अग्रणी सेनानी क्षेत्रपाल सिंह दिसौन्धी, रणधीर सिंह पोटिया, होरी सिंह, प्रताप सिंह सैनी ‘बेचैन' जंगलों में शरण लिए थे, तब ग्राम मुराहट के कुछ लोग यथा-सम्भव उनकी सहायता किया करते थे।

मुझे श्री रामपाल सिंह से दो बार बात करने का अवसर मिला। इस दौरान इन्होंने 16 अगस्त 1942 को नूरपुर थाना केस से जुड़ी बहुत सी बातों को बताया। श्री रामपाल सिंह ग्राम फीना से जुड़ी बातों के गहरे जानकार हैं। मेरे द्वारा लिखी जा रही पुस्तक ‘ग्राम फीना का परिचय एवं इतिहास' के लिए उपयोगी अनेक पुराने तथ्य आपने बताए। इनके द्वारा फीना से जुड़ी अनेक ऐसी बातें पुष्ट हुईं, जो अन्य स्रोतों से प्राप्त हुई थी। ग्राम फीना के प्रसिद्ध इंटर कॉलेज को इन्होंने यथा संभव दान भी किया हैवर्तमान में इनकी आयु अधिक होने के कारण शारीरिक शक्ति, देखने तथा सुनने की शक्ति काफी कम हो गई हैइनको चलनेफिरने, उठने-बैठने के लिए सहारे की आवश्यकता पड़ती है। इसके बावजूद श्री रामपाल सिंह की समझने और बोलने की शक्ति अच्छी है। परिवार वाले इनकी अच्छी तरह देखभाल करते हैं। इनका स्वभाव शांत तथा गंभीर है, परंतु ये सीधा और साफ बोलते हैं। वर्तमान में गलत को गलत और सही को सही बोलने वाले लोग बहुत कम बचे हैं, इस हिसाब से श्री रामपाल सिंह जैसे लोग समाज के लिए अनमोल धरोहर के समान हैं। दुर्भाग्य है कि इनका न तो कभी कोई सम्मान किया गया और ना ही उल्लेख। ऐसे सेनानियों का सम्मान तथा गुणगान करना और उनके व्यक्तित्व व कृतित्व को अगली पीढ़ियों तक ले जाना, समाज का दायित्व होता है। प्रस्तुत लेख उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व के प्रति नमन का एक छोटा सा प्रयास है।