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राजनीति और धर्म के समन्वयक सम्राट अशोक महान्
August 1, 2017 • Suresh Chandra Shrivastav

भारत के ऐतिहासिक स्मारक तक्षशिला, इन्द्रप्रस्थ, कौशाम्बी, तोसाली, सारनाथ, पाटलिपुत्र, साँची, आदि के स्तूपों और खण्डहरों में टिमटिमाते दीप एक ऐसे अद्वितीय सम्राट् के ऐश्वर्य के प्रतीक हैं जो धर्मविजयी और चक्रवर्ती था, जिसने समस्त विश्व को सत्य, अहिंसा, शान्ति और कल्याण का शुभ सन्देश देकर धर्मचक्ररत्न प्रवर्तन किया। हिमालय से कन्याकुमारी तक के भूभाग में भगवती भागीरथी और पुण्यसलिला गोदावरी तथा कृष्णा के तट पर धर्मराज्य की स्थापना कर प्रियदर्शी अशोक ने भारतीय राजत्व के इतिहास में अपना नाम अमर कर दिया। अशोक के राज्यकाल में भारत भौतिक और नैतिक उत्कर्ष की चरम सीमा पर पहुँच गयाथा। आदर्श और यथार्थवाद- दोनों अपनीपराकाष्ठा पर थे। देश उन्नत, समृद्ध और वैभव संपन्न था। वास्तव में ईसा से तीन-चार सौ साल पहले भारतीय जीवन परम शान्तिपूर्ण और सुसंस्कृत था।

सम्राट् अशोक, महाराज बिन्दुसार के पुत्र और परम तेजस्वी सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य के पौत्र थे। अपने पिता के राजकाल में वे तक्षशिला के कुमारामात्य भी रह चुके थे, इस तरह शासनकार्य और सैन्य-संचालन की उनमें अद्वितीय योग्यता पहले से ही थी। पिता की मृत्यु के चार वर्ष बाद मन्त्रिपरिषद् के निर्णय के अनुसार अशोक का राज्याभिषेक हुआ। उन्होंने ईसा से 274 साल से 237 साल तक शासन किया। अशोक के राज्यकाल में कलिंग युद्ध हुआ, अतएव राजसीमाविस्तार को ध्यान में रखकर विचार करने पर पता चलता है कि बिन्दुसार ने एक बहुत विशाल साम्राज्य छोड़कर परलोक यात्रा की थी। ऐसी जनश्रुति है कि अशोक अपने राज्यकाल के प्रथम चरण में अत्यन्त क्रूर हृदय के थे और सिंहासन आदि के लिए उन्होंने अपने 99 भाइयों की हत्या करवा दी थी। वे उस समय कट्टर शैव थे और हिंसा आदि में उनकी विशेष अभिरुचि थी। बौद्ध धर्म में दीक्षित होने से पहले उन्हें चण्डाशोक' कहा जाता था। बौद्ध धर्म में दीक्षित होने से पहले अशोक चण्ड थे या धर्मात्मा? ऐतिहासिकता में प्रवेश करने पर इस सम्बन्ध में भिन्नभिन्न मत मिलते हैं। पर सारे इतिहास एकमत होकर यह निर्णय देते हैं कि कलिंगयुद्ध के भीषण रक्तपात से सम्राट् अशोक का हृदय काँप उठा और उन्होंने राज्य की सीमा नदियाँ, समुद्रों और पहाड़ों से वेष्ठित न कर मानवमात्र के हृदय पर अहिंसा, सत्य और शक्ति के शीतल आलोक में शासन करना उचित समझा। 

अशोक अखिल भारतवर्ष के सम्राट् थे। अखिल भारतवर्ष पर अलाउद्दीन और आलमगीर का भी आधिपत्य था, पर उनकी राजनीति धार्मिक असहिष्णुता और पक्षपात की नींव पर खड़ी थी, अशोक ने अपना राज्यविस्तार धर्म और सत्य के शस्त्र से किया था, उनके राज्य में घृणा-द्वेष नहीं, प्रेम का निवास था। हिमालय से कन्याकुमारी तक के भूभाग के सम्राट् का राज्य ऐसा होना ही चाहिए था। अशोक के राज्य में अफगानिस्तान, हिंदूकुश की दक्षिणी घाटी, नेपाल, बलूचिस्तान, गान्धार, सिंध, काश्मीर आदि भूखण्ड सम्मिलित थे, दक्षिण में नीलगिरी पहाड़ की घाटी में उनकी विजयिनी धर्मपताका फहराती थी। अशोक ने अपने शिलालेख में उद्गार प्रकट किए हैं कि वास्तविक राज्यसीमा पृथिवी-विजय नहीं, अपितु जनता के नैतिक और धार्मिक उत्कर्ष पर निर्भर है। उन्होंने राजनीति का नैतिक और आध्यात्मिक कायाकल्प किया। वे जनता के मान-सम्मान और धन तथा बल के संरक्षक थे, आदर्श शासक थे। राज्य के विभिन्न प्रांतों के कुमारामात्य भी राजकार्य-संचालन में उन्हीं के आदर्श के अनुसार आचरण करते थे, अतएव जनता परम सुखी और समृद्ध थी।

कलिंग-युद्ध के भीषण रक्तपात ने अशोक को नये जीवन में प्रवेश करने के लिए विवश किया। अशोक के 13वें शिलालेख में ऐसा उल्लेख है कि जितने मनुष्य कलिंग-युद्ध में घायल हुए, मरे या कारागार में डाल दिए गये, उनके 100वें या 1000वें अंश का विनाश भविष्य में सम्राट् अशोक के लिए घोर दुःख का कारण होगा, इसलिए उन्होंने युद्धबन्दी की आज्ञा दी और साम्राज्य में धर्मविजय का शंखनाद किया। अभिषेक के ठीक 13 वर्ष बाद, धर्म की रक्षा करने के लिए धर्म की वृद्धि करने के लिए सारे राज्य में धर्ममहामात्य नियुक्त किएगये। रणभेरी के स्थान पर धर्मभरी ने ले लिया और रणयात्रा धर्मयात्रा में बदल गयी। सम्राट अशोक ने बौद्धधर्म को राजधर्म घोषित किया। सत्यानुराग और धर्माचरण की भावना में डटकर वे जनता को स्वकल्याण का पाठ पढ़ाना चाहते थे और निस्सन्देह इस तरह के शुभ कार्य में वे अधिक मात्रा में सफल रहे। राज्य की ओर से नियुक्त राजुक और धर्ममहामात्य प्रजा को न्यायकारक आचरण के लिए प्रोत्साहित करते थे। लगभग 24 साल तक सम्राट् पद पर आरूढ़ रहने के बाद अशोक ने तीर्थाटन आरम्भ किया। भारत के प्रसिद्ध धर्मस्थानों, बुद्ध के जीवन से सम्बद्ध स्मारक-क्षेत्रों का दर्शन करना तथा प्रजा को सत्य और शान्ति की शिक्षा देना इस धर्मयात्रा का प्रधान उद्देश्य था। प्रसिद्ध-प्रसिद्ध स्थलों पर गड़े शिलालेख अशोक के साम्राज्य–विस्तार के प्रतीक हैं और साथ-ही-साथ वे प्रजापालन और धर्म के प्रचार-विस्तार के द्योतक भी हैं। उनके आकार-प्रकार से तत्कालीन भारतीय शिल्पकला की उन्नति और परिपूर्णता का पता चलता है। ये शिलालेख मौर्य साम्राज्य के सुदूरवर्ती सीमाप्रान्तों के साथ सात भिन्न-भिन्न स्थानों में पाए गए हैं। राजनीति और धर्म का सफल समन्वय अशोक के शासनकाल में ही उत्तमतापूर्वक हो सका। चौरासी हजार स्तूपों का निर्माण अशोक - जैसा कलाप्रिय और धर्मविजयी सम्राट् ही करवा सकता था। बौद्ध-साहित्य में उन्हें ‘धर्माशोक' कहा गया है। सदाचार, सत्यभाषण और अहिंसा पर अशोक ने विशेष जोर दिया। देवप्रिय अशोक ब्राह्मण, बौद्ध और श्रमण को समान दृष्टि और समान भाव से देखते थे। किसी वर्ग के प्रति अनुचित या विशेष पक्षपात नहीं करके धर्मसभाओं में सभी वर्ग को समान पद दिए जाते थे। अशोक का धर्म किसी विशेष वर्ग या सम्प्रदाय का नहीं था। अशोक युद्धप्रिय नहीं, देवप्रिय राजा थे, उनकी ‘प्रियदर्शी' उपाधि का वही आशय था। अशोक ने सब सम्प्रदायों की उन्नति और प्रतिष्ठा करनी चाही। बारहवें शिलालेख में उनके उद्गार हैं:

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