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राजद्रोही-राष्ट्रद्रोही
June 1, 2016 • Pramod Kaushik

अयोध्या' का नाम लेते ही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम और उनकी जन्मभूमि का चित्र आँखों के सामने आ जाता है। श्रीराम भारतीय राष्ट्र के प्रतीक हैं। वाल्मीकीयरामायण में श्रीराम के व्यक्तित्व की तुलना हिमालय और सागर से की गई है, यानि श्रीराम उत्तर से दक्षिण तक समूचे राष्ट्र के प्रतिनिधि-पुरुष हैं। अयोध्या उनकी जन्मभूमि है। जहाँ तक श्रीरामजन्मभूमि के संबंध में हिंदू समाज के न्याय मांगने का प्रश्न है, उसका आदर किया जाना चाहिये। जो महत्त्व ईसाइयों के लिए वेटिकन सिटी का है, मुसलमानों के लिए मक्का और मदीने का है, वही महत्त्व हिंदुओं के लिए श्रीरामजन्मभूमि का है। जब मिस्र और ईरान अपनी राष्ट्रीय संस्कृति के प्रतिनिधि फराहो पर गर्व कर सकते हैं; दक्षिण-पूर्व एशिया के मुस्लिम राष्ट्र अपने यहाँ श्रीरामलीला का भव्य मंचन करवा सकते हैं, इण्डोनेशिया अपने यहाँ गणेश मुद्रा जारी कर सकता है, ईराक अपने यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण पर डाकटिकट जारी कर सकता है, तो भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक-पुरुष श्रीराम के प्रति भारतीय मुस्लिम गर्व क्यों नहीं कर सकते? और इस देश में श्रीराम के जन्मस्थान पर भव्य मन्दिर क्यों नहीं बन सकता ?

छः दिसम्बर, 1992 को अयोध्या में विवादित ढाँचे को उसी तरह लोगों ने गिराया, जिस तरह 1918 में पौलेण्ड ने अपने देश में रूसियों द्वारा निर्मित चर्च को गिराया था। इस तरह की अनेक इमारतें, जो विजय के प्रतीक के रूप में बनाई गईं, भूतकाल में गिराई जाती रही हैं। वस्तुतः कोई भी स्वाभिमानी राष्ट्र गुलामी के प्रतीक को सहन नहीं करता; क्योंकि ये प्रतीक तेजाब के समान उस राष्ट्र को पीड़ित करते हैं। इसलिए मुस्लिम भाइयों को उस ढाँचे को प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाकर उसे एक आक्रांता द्वारा थोपा गया गुलामी का प्रतीक मानना चाहिये। वैसे भी हिंदू समाज अपने आराध्य भगवान् श्रीराम की जन्मभूमि ही मांग रहा है, जिसपर वह भव्य मन्दिर बनाना चाहता है। आज अनेक मुस्लिम भाई, राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ना चाहते हैं, परन्तु कतिपय कट्टरपंथी नेताओं के चलते यह सम्भव नहीं हो पा रहा है। भारत का आम मुसलमान यह भली-भाँति समझता है कि भारतीय मुसलमानों का अस्तित्व भारत की एकता और अखण्डता द्वारा ही रह सकता है। साथ ही वह यह भी जानता है कि उन्हें भारत में कतिपय मुस्लिम राष्ट्रों से कहीं ज्यादा स्वतन्त्रताएँ और सुविधाएँ प्राप्त हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि वह यहाँ गणतंत्र दिवस के बहिष्कार और 'भारतमाता की जय' -जैसे पवित्र जयघोष तक के विरोध की स्वतंत्रता प्राप्त कर लेते हैं, जबकि साम्यवादी चीन का उदाहरण उनके सामने है जहाँ अभिव्यक्ति की थोड़ी स्वतंत्रता की मांग कर रहे हजारों छात्रों को गोलियों से भून दिया जाता है। भारत में ‘अल्पसंख्यक' कहा जानेवाला वर्ग जितनी समानता और अधिकार लेकर सुखी और सबल है, उतना वह संसार के किसी देश में नहीं है। राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़ने तथा सभी प्रकार का भेदभाव भुलाकर साथ रहने में ही सबका कल्याण है। हर भारतवासी को स्वदेश से संचालित होना होगा, न कि परदेश से। इस विषय में संकेत और सूत्ररूप में हम इतना ही कहना चाहते हैं।

प्रस्तुत अंक में हमने श्रीरामजन्मभूमि-संबंधी विवाद पर प्रचुर सामग्री देने का प्रयास किया है। प्रायः इस संबंध में प्रामाणिक सामग्री एक जगह प्राप्त नहीं होती। किन्तु इस अंक में इस मामले से जुड़े गवाहों, विद्वानों और लेखकों से प्रामाणिक सामग्री जुटाकर विषय की परिपूर्णता और यथासम्भव समाधानकारक प्रयास किया गया है। इस अंक में कोलकाता पर परिशिष्ट-सामग्री दी गई है जो अत्यन्त रुचिकर लगेगी। कोलकाता कई शताब्दियों से भारत के वाणिज्य-व्यापार की केन्द्र-बिन्दु और भारत की बौद्धिक राजधानी मानी जाती रही है। ब्रिटिश काल में यह भारत की राजनीतिक राजधानी भी रही है। इसी के साथ इस नगरी ने स्वाधीनता संग्राम में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया है और देश को अनेक नररत्न प्रदान किए हैं।

स्वाधीनता दिवस और श्रीकृष्णजन्माष्टमी की शुभकामनाओं के साथ...