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मेरी अपनी हिन्दी
September 25, 2019 • वीना सिंह

चलते-चलते उम्र ढलान पर आ गई। बच्चे अपने-अपने काम में लग गये पति अपने बिजनेस और यात्राओं में व्यस्त रहते। मैं पूरे दिन अकेली और खाली। भला करती भी क्या? कभी टी.वी. देखती कभी समय काटने के लिए किचन के डिब्बे पोंछती रहती। बराबर काम करने की आदत जो ठहरी, सो पूरे दिन ऊहापोह में रहती कि क्या करूँ? एक दिन मेरी प्रिय सखी मिलने आई, मेरी मनोदशा देख मुझे यह बात समझाई। मुझे मेरी ताकत, मेरी हिन्दी मुझे याद दिलाई। बोली याद कर तू किसी जमाने में हिन्दी की सुपर शिक्षिका थी। टॉप की हिन्दी पढ़ाती थी। अब भी पढ़ा सकती है, तू नौकरी कर ले। मुझे उसकी बात जम गई। अगले ही दिन सुबह तैयार हो अपना पुराना लम्बा सा बैग टांग कर, एक पास ही के विद्यालय में पहुँची और अध्यापन कार्य करने की इच्छा जताई। टाई, टोपी, बेल्ट के साथ रंग-बिरंगे कपड़ों से सुसज्जित वहाँ के प्रिंसिपल जी से साक्षात्कार हुआ, वे पान की पीक छोड़ते हुए बोले- “मैडम हिन्दी हिंदी छोड़ते हुए बोले- “मैडम हिन्दी हिंदी हमारे यहाँ पढ़ाई नहीं जाती और दूसरे विषयों के लिए अंग्रेजी फरार्टेदार आना आवश्यक है। सब इंग्लिश मीडियम है। मैंने कहा पर मैं तो केवल हिन्दी ही जानती हूँ। अंग्रेजी का हमें जरा भी भान नहीं। वे बाहर का रास्ता दिखाते हए बोले सॉरी हिंदी जी।

हिंदी वहाँ से विदा ली फिर हिंदी सोचा कोई दूसरा विद्यालय देख लूँगी। गली-गली में चाट के खोमचे की तरह जगह-जगह तो विद्यालय खुले हुए हैं। नौकरी मिल ही जाएगी। कहीं तो हिन्दी पढ़ाई जाती होगी। अगले दिन दूसरे विद्यालय पहुँची वहाँ भी वही प्रॉब्लम। फिर तीसरे दिन तीसरे स्कूल, चौथे दिन चौथे, इसी तरह पूरे पन्द्रह दिनों में पन्द्रह विद्यालयों के चक्कर लगा डाले पर हिन्दी के लिए जगह न मिलीअब तो मैं फिकरमंद हो चली कि यह हिन्दी के साथ कैसा दुराभाव। पर मैंने हिम्मत नहीं हारी। सोलहवें दिन कुछ आशा जागी। जैसे ही सोलहवें प्रिंसिपल ने कहा- मैडम आप नौकरी कर सकती हैं, हमारे यहाँ हिन्दी पढ़ाई जाती है। हमारी बांछे खिल उठी। लेकिन हमारी कुछ शर्ते है। कैसी शर्ते? हमारी खिली बांछे गुल होने लगी। वे समझाते हुए बोले- पहली शर्त आपको अपना हुलिया बदलना होगा, यहाँ ये देहाती ताना-बाना नहीं चलेगा। मतलब यहाँ स्टाइल में आने का। एकदम हाई-फाई दिखने का। मैं मन ही मन बुदबुदाई अब बुढ़ापे में स्टाइल। नौकरी करनी ही थी सो हाँ में सिर हिलाना ही पड़ा। सोचा आज ही ब्यूटी पार्लर जाऊंगी, थोड़ा रंग रोगन करा लूँगी। 

दूसरी शर्त- स्कूल के अन्दर हिन्दी बोलना मना है। मैं चौंककर बोली- पर मैं हिन्दी अंग्रेजी में कैसे पढ़ाऊँगी? वे फिर समझाने लगे देखिए आप हिन्दी तो हिन्दी में ही पढ़ाईये, पर पढ़ाने के अलावा सारी बातचीत इंगलिश में ही करिएगा। यहाँ हिन्दी बोलने वाले पर फाइन लग जाता है। मुसीबत तो बहुत बड़ी थी, पर नौकरी करना भी जरूरी थी। मैने कहा मंजूर है सर। मैंने विचार किया आज ही इंगलिश डिक्शनरी खरीद लूंगी और हिन्दी पढ़ाने के लिए अंग्रेजी पढूंगी। चलो इसी बहाने एक नई भाषा सीख लूंगी। बच्चों की बात मान कर पहले ही अंग्रेजी सीख ली होती तो आज यह दिन ना देखना पड़ता, पर मैं तो अपनी हिन्दी से चिपकी रही। तीसरी शर्त सुन मैं अपने डुबकी लगाते ख्यालों से बाहर निकली। वे बोलेआपको अन्य टीचरों की अपेक्षा कम वेतन दिया जायेगा। मैंने हड़बड़ा कर पूछा क्यों? वे बोले क्योंकि आप हिन्दी की टीचर हैं। हिन्दी की अब कोई वैल्यू नहीं है, न कोई पढ़ना चाहता है और न हम पढ़ाना चाहते हैं। वह तो पाठ्यक्रम में है तो साथ में घसीटना पड़ता है। अब मेरे सब्र का बांध टूट चुका था, मैं भड़क उठी- सर आप मेरा और मेरी हिन्दी का अपमान कर रहे हैं। मैं अपनी प्राणों से प्यारी मातृभाषा का और अपमान नहीं सह सकती। मुझे नहीं करनी ऐसी नौकरी। जिसमें अपनी हिन्दी की आहुति देनी पड़े और मैं अपनी हिन्दी के साथ अपने घर वापस आ गई।