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मूर्तिकला का अनुपम वैशिष्ट्य
April 1, 2018 • Lalit Sharma

जिन के अनुयायियों को जैन तथा ‘जिनों द्वारा स्थापित धर्म को जैन-धर्म के नाम से जाना गया है। जैन-धर्म के ऐसे महापुरुषों को तीर्थंकर या केवली कहा गया है। ये तीर्थंकर 24 हुए हैं जिनकी धारणा ही जैन-धर्म की धुरी है। अन्य जैन-देवों की संकल्पना भी इन्हीं जिनों से सम्बद्ध है।

गुप्तोत्तर काल में इन 24 तीर्थंकरों की पहचान के निमित्त उनके लाञ्छनों, यक्षों और शासन-देवियों का निर्धारण किया गया, जिनमें 1 से 24 तक महान् तीर्थंकरों की मूर्तियों के लक्षण तथा यक्ष व यक्षी (शासन देवी-दिगम्बर-श्वेताम्बर) निर्धारित की गयी। निर्धारण का यह क्रम व तालिका जैन-धर्म के इतिहास-विषयक ग्रन्थों में आसानी से देखी, परखी तथा समझी जा सकती है। अतः हम उनकी यहाँ चर्चा न करके मूर्तियों के लक्षणों की ही चर्चा करेंगे।

जैन-साहित्य के साक्ष्यों पर दृष्टि डाली जाए, तो ज्ञात होता है कि अन्तिम तीर्थंकर महावीर स्वामी की मूर्ति को उनके जीवनकाल में ही निर्मित करवा दिया गया था, जिसे जैन-धर्म में ‘जीवन्त स्वामी कहा गया। तीर्थंकर-मूर्तियों में अभी तक सर्वाधिक प्राचीन, पटना के लोहानीपुर से प्राप्त मौर्ययुगीन नग्न (दिगम्बर) धड़ को माना जाता है। इसका मूल कारण यह माना गया कि तीर्थंकर दिगम्बर ही थे। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने मथुरा की जैनमूर्तिकला पर विशद प्रकाश डाला है। उनकी जैनकला विवेचना से यह प्रामाणित होता है कि मथुरा के कंकाली टीले से कुषाणकालीन जैन स्तूप खण्ड, आयांगपट्ट तीर्थंकर मूर्तियाँ मिली थीं। इन पर कुछ ऐसे शिलालेख पठन में आये जिनमें वहाँ देवनिर्मित स्तूप के निर्माण के प्रमाणों का भी पता चलता है। प्रतीत होता है कि मथुरा जैनधर्म और कला का प्राचीन केन्द्र था। यहाँ से प्राप्त सारी अमूल्य निधियाँ अब लखनऊ के राज्य पुरातत्त्व संग्रहालय में दर्शित हैं। मथुरा के उक्त टीले के उत्खनन से जैन-शिल्प की जो अद्धत सामग्री मिली, उनमें एक जैन-स्तूप, दो प्रासाद व जैन- मन्दिरों के अंकल चित्र मिले थे। इनमें 18वें तीर्थंकर अरहनाथ स्वामी की मूर्ति की चौकी पर एक लेख में यह अंकित है। कि- कोट्टियगण की वज्री शाखा के वाचक आर्य वृहस्ती की प्रेरणा से एक श्राविका ने देवनिर्मित स्तूप में अर्हत की मूर्ति स्थापित की। मूलतः यह लेख संवत् 89 का है, जो कुषाण-सम्राट् वासुदेव के शासनकाल का 167 ई. का है। यह सामग्री ठीक ईसापूर्व द्वितीय शती से लगातार 11वीं शती तक मिलती है। इनमें निम्न मूर्तियों का विश्लेषण, लक्षण प्रस्तुत है।

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