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मुकदमों का सिलसिला
August 1, 2016 • Prof. Meenakshi Jain

सन् 1857 के पश्चात् रामजन्मभूमि/तथाकथित बाबरी मस्जिद से संबंधित कचहरियों की सम्पूर्ण कार्रवाई की लोकप्रिय चर्चाओं में अनेदखी की गई है। इन कार्रवाइयों के द्वारा महान् स्वतंत्रता संग्राम तथा साहसी हिंदुओं की गिरफ्तारी का आश्चर्यजनक विवरण प्राप्त होता है।

प्रथम प्राप्त रिकॉर्ड 28 नवंबर, 1858 को अवध के थानेदार के द्वारा लिखाई गई रिपोर्ट (शिकायत) का है। इसमें लिखा गया है कि एक ‘निहंग सिंह फकीर खालसा' ने मस्जिद जनम अस्थान के मध्य में पूजा आरंभ कर दी है। (पृ. 2298-2299, अनुच्छेद 2315*)। [यह ध्यान देने योग्य है कि प्रथम रिपोर्ट में इस ढाँचे को मस्जिद जनम अस्थान कहा गया है।

मुहम्मद असगर की पैटिशन

दो दिन पश्चात् मुहम्मद असगर ने, जो तथाकथित बाबरी मस्जिद का ‘मुएजिन' था, ब्रिटिश सरकार के सामने इस बारे में प्रतिनिधित्व किया। इस समय की परिस्थिति पर प्रकाश डालने के लिए उसकी शिकायत सबसे पुराना प्रथम व्यक्तिगत एवं गैर-सरकारी (प्राइवेट) (प्रमाण-प्रपत्र) (डॉक्यूमेंट) हैरिपोर्ट में कहा गया है कि पंजाब निवासी एक सरकारी कर्मचारी निहंग सिख ने 'मेहराब तथा मिंबर' के समीप एक चबूतरा बनाकरइस पर एक मूर्ति स्थापित कर दी है। ‘प्रकाश तथा पूजा के लिए वहाँ अग्नि का प्रबंध किया गया है। वहाँ पर लगातार ‘होम' (पूजा) की जा रही है। पूरी मस्जिद में कोयले से जगह-जगह ‘राम-राम' लिखा दिया गया है।

मुहम्मद असगर ने आगे लिखवाया कि ‘बाबरी मस्जिद की चारदीवारी की सीमा में वह जन्मस्थान वीरान पड़ा है जहाँ हिंदू सैकड़ों वर्षों से पूजा कर रहे थे। उसने इस बात को बड़े जोर से प्रकट किया कि थानेदार के षड्यंत्र के कारण वैरागियों ने वहाँ एक ही रात में कार्य रोकने' (व तोड़ने) निषेधाज्ञा के आदेश पारित होने से पूर्व ही एक बालिश्त का चबूतरा अवैध रूप से बना लिया।' मुहम्मद असगर ने कोतवाल से प्रार्थना की कि वे स्वयं वहाँ जाकर चबूतरा तुड़वाएँ तथा हिंदुओं को वहाँ से बाहर निकलवायें। (पृ. 2300- 2303, अनुच्छेद 2317)

इस प्रमाण (दस्तावेज) को तथा इस प्रार्थना-पत्र को लिखनेवाले व्यक्ति की पहचान को प्रमाणित (संदेह से परे) मानकर इलाहबाद उच्च न्यायालय ने इसे इस बात का अकाट्य प्रमाण माना है कि हिंदू मस्जिद के अंदर, राम चबूतरे पर तथा बाहरी आंगन में स्थित सीता रसोई के स्थान की पूजा करते थे। (पृ. 2304, अनुच्छेद 2318)। यह कभी भी संभव नहीं हो सकता था यदि यह सम्पूर्ण क्षेत्र मुस्लिम कब्जे में होता। (पृ. 2304-2305, अनुच्छेद 2319) न्यायाधीश एस.यू. खान के ध्यान में यह तथ्य आ गया कि मुस्लिमों ने माना था कि 19वीं शताब्दी के मध्यकाल से हिंदू बाहरी क्षेत्र, जिसमें राम चबूतरा है, में पूजा करते आ रहे हैं। (न्यायाधीश एस.यू. खान, पृ. 5-6)'।

पूरा प्रयत्न करने के पश्चात् भी थानेदार 10 दिसम्बर, 1858 को यह सचना नहीं दे सकता कि मस्जिद जनम अस्थान से झण्डा हटवा दिया गया है तथा अन्दर रहनेवाले फकीर को बाहर निकाल दिया गया है।' (पृ. 2309-2310, अनुच्छेद 2325)। उस रिपोर्ट में नमाज से संबंधित कोई चर्चा नहीं की गई थी। न ही इस बात की कोई चर्चा की गई कि बाबरी मस्जिद में मुस्लिमों ने बाद में नमाज आरंभ कर दी। (पृ. 2310, अनुच्छेद 2326)

एक अन्य उपलब्ध रेकार्ड 05 नवंबर, 1860 के दिन बाबरी मस्जिद के खातिब, मीर राजिब अली द्वारा उपायुक्त को लिखी शिकायत के रूप में है। मीर राजिब अली ने शिकायत में लिखा कि 'जब ‘मोइजिन अजान देते हैं, विरोधी लोग शंख बजाना आरंभ करते हैं। उसने प्रार्थना की कि नवनिर्मित चबूतरे को गिरवाने की .. करें तथा विरोधी पक्ष से एक बॉण्ड (आश्वासनपत्र) लिखवाने की कृपा करें कि वह अवैध रूप से मस्जिद की भूमि पर कब्जा नहीं करेगा तथा 'अजान' के समय शंख नहीं बजाएगा' (पृ. 2313-2317, अनुच्छेद 2329)। दिनांक 12 मार्च, 1867 को मीर राजिब अली ने पुनः शिकायत की कि अभी तक चबूतरा नहीं हटवाया गया है। (पृ. 2318, अनुच्छेद 2331)।

मुहम्मद अफजल द्वारा शिकायत

दिनांक 25 दिसम्बर, 1866 को एक अन्य शिकायत मुहम्मद अफ़ज़ल द्वारा लिखाई गयी। इसमें कहा गया कि 'एक मास पूर्व मस्जिद के क्षेत्र में ‘वैरागियाँ जनम अस्थान राम' की संस्था ने एक मास पूर्व ‘कुछ ही घंटों में मस्जिद के आंगन में अवैध रूप से एक कोठरी बना ली है। उनकी नीयत वहाँ मूर्ति स्थापित करने की है। मुहम्मद अफ़ज़ल चाहता था कि कोठरी गिरवा दी जाए तथा मस्जिद को ‘बैरागियों के कोप' से बचाया जाये। उसने विश्वासपूर्वक कहा कि मस्जिद के कार्यों में विघ्न डालनेवाले हिंदुओं से सदा से ही संघर्ष होता रहा है। यह ‘न्यायालय की बुद्धिमत्ता तथा न्याय का ही परिणाम था कि मस्जिद सुरक्षित है।' (पृ. 2064, अनुच्छेद 1978; पृ. 23412346, अनु. 2347)।

मुहम्मद असर अपाल

दिनांक 07 नवम्बर, 1873 को मुहम्मद असगर की शिकायत के कारण आदेश पारित किया गया कि चरणपादुका, जिनके बारे में कहा गया कि वह 'विवादित भवन में बनाया गया है, गिरा दी जाए (पृ. 2065, अनुच्छेद 1979)। वर्ष 1877 में मुहम्मद असगर ने पुनः शिकायत की कि आदेश का पालन न करके चरणपादुका को गिराया नहीं गया है। महंत ने उस क्षेत्र में एक चूल्हा बना लिया है। इस चूल्हे का क्षेत्र भी बढ़ा लिया गया है और वहाँ पूजा होती है।' (पृ. 2065, अनु. 1979; पृ. 2355-2361, अनुच्छेद 2352)। इलाहबाद उच्च न्यायालय ने संज्ञान लिया कि शिकायत इस बात का प्रमाण है कि 1877 में मस्जिद के प्रांगण में चूल्हा भी था। (पृ. 2065, अनुच्छेद 1980)।

मोहम्मद असगर की शिकायत

उसी वर्ष मोहम्मद असगर ने शिकायत की कि दीवार में से एक नया मार्ग (दरवाजा) बना दिया गया है जो मस्जिद को चूल्हे से अलग करता है। फैजाबाद के उपायुक्त ने अपना मत व्यक्त किया कि त्यौहार के अवसरों के लिए जन्मस्थान के भक्तों के लिए नया मार्ग खोलना अनिवार्य था। 

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