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मार्तण्ड सूर्य मान्दर
September 23, 2019 • अवनीश सिंह राजपूत

गर्तण्ड सूर्य मन्दिर का निर्माण जामध्यकालीन युग में 7वीं से 8वीं शताब्दी के दौरान हुआ था जो सूर्य भगवान् को समर्पित है। कर्कोट राजवंश के राजा ललितादित्य ने इस मन्दिर का निर्माण अनन्तनाग के पास एक पठार के ऊपर करवाया था। इसकी गणना हिंदू सम्राट् ललितादित्य के प्रमुख कार्यों में की जाती है। इसमें 84 स्तम्भ हैं जो नियमित अंतराल पर रखे गए हैं। इस मन्दिर को बनाने के लिए चूने के पत्थर की चौकोर ईंटों का उपयोग किया गया है जो उस समय के कलाकारों की कुशलता को दर्शाता है। इस मन्दिर की राजसी वास्तुकला इसे अलग बनाती है। बर्फ से ढके हुए पहाड़ों की पृष्ठभूमि के साथ केंद्र में यह मन्दिर इस स्थान का करिश्मा ही कहा जाएगा। इस मन्दिर से काश्मीर घाटी का मनोरम दृश्य भी देखा जा सकता है। मन्दिर की राजसी वास्तुकला इसे अलग बनाती है। बर्फ से ढके हुए पहाड़ों की पृष्ठभूमि के साथ केंद्र में यह मन्दिर करिश्मा ही कहा जाएगा। मार्तण्ड सूर्य मन्दिर का प्रांगण 220 फुट x 142 फुट है। यह मन्दिर 60 फुट लम्बा और 38 फुट चौड़ा है। इसके चतुर्दिक लगभग 80 प्रकोष्ठों के अवशेष वर्तमान में हैं। इस मन्दिर के पूर्वी किनारे पर मुख्य प्रवेश-द्वार का मण्डप है। इसके द्वारों पर त्रिपार्श्वत चाप (मेहराब) थे, जो इस मन्दिर की वास्तुकला की विशेषता है। द्वारमण्डप तथा मन्दिर के स्तम्भों की वास्तु-शैली रोम की डोरिक शैली से कुछ अंशों में मिलती-जुलती है। मार्तण्ड मन्दिर अपनी वास्तुकला के कारण पूरे देश में प्रसिद्ध है। यह मन्दिर काश्मीरी हिंदू राजाओं की स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना है। काश्मीर का यह मन्दिर वहाँ की निर्माण- शैली को व्यक्त करता है। इसके स्तंभों में ग्रीक संरचना का इस्तेमाल भी किया गया है।

ऐसी किंवदन्ती है कि सूर्य की पहली किरण निकलने पर राजा अपनी दिनचर्या की शुरूआत सूर्य मन्दिर में पूजा कर चारों दिशाओं में देवताओं का आह्वान करने के बाद करते थे। वर्तमान में खण्डहर हो चुके इस मन्दिर की ऊँचाई भी अब 20 फुट ही रह गई है। मन्दिर में तत्कालीन बर्तन आदि अभी भी मौजूद हैं। महाराजा ललितादित्य द्वारा बनवाया यह मन्दिर विशेष धार्मिक महत्त्व रखता है। यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर का एक अनूठा उदाहरण है, खासकर यह काश्मीरी हिंदुओं के लिए बहुत ही पूज्य माना जाता है। इसका वास्तुशिल्प इसलिए भी असाधारण है, क्योंकि यह पूरे काश्मीर में एकमात्र उपासना-स्थल है जो पश्चिमोन्मुखी है। आज इस मन्दिर के जीर्ण-शीर्ण लेकिन अद्भुत अवशेष भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के अधीन हैं, जो लगता है उस जगह के दुरुपयोग को लेकर बेपरवाह है, जिसे संभालने, सहेजने की उस पर जिम्मेदारी है। इतना ज़रूर है कि यह मन्दिर, जो खण्डहरों में तब्दील हो चुका है, आज भी सैलानियों को अपनी ओर खींचने की शक्ति रखता है।