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महिमा मानवालोकेश्वर महाकाल की
February 1, 2018 • lalit Sharma

 भारत के हृदय-प्रदेश मध्यप्रदेश की पौराणिक और ऐतिहासिक नगरी महाकालपुरी अर्थात् ‘उज्जयिनी' प्राचीन और संवत्-प्रवर्तक सम्राट् विक्रमादित्य की राजधानी होने तथा कालजयी महाकालेश्वर (शिव) को अपने में प्रतिष्ठित कर सम्पूर्ण विश्व का मध्य-स्थान होने का गौरव प्राप्त कर चुकी है। वेदों से चुकी है। वेदों से लेकर महाकाव्यों एवं प्रायः सभी पुराणग्रन्थों में इस नगरी की गरिमा का गौरवगान गाया गया है।

ऐतिहासिक दृष्टि से इस नगरी की गणना सप्तपुरियों, द्वादश ज्योतिर्लिंगों तथा चार महाकुम्भों की स्थली में प्रमुखता से की जाती है। यह पुरी अनादिकाल से ही अनेक राजवंशों की शासित स्थली के साथ-साथ आश्रय-प्राश्रय व तपोभूमि भी रही है। यहाँ हैहयवंशी कार्तवीर्यार्जुन, महाभारतयुगीन विन्द-अनुविन्द, सम्राट् चण्डप्रद्योत, सम्राट् अशोक, विक्रमादित्य, समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) सहित परमार व मराठा-शासकों ने भी राज्य किया तथा कला व संस्कृति के माध्यम से इस नगरी को देवराज इन्द्र की अलकापुरी के समान बना दिया था। यहाँ के बाजारों में विशाल रत्नराशि देखकर महाकवि कालिदास ने कहा था कि मानो रत्नसागर के सारे रत्न ही यहाँ एकत्र हो गये हों और सागर में रत्नों के स्थान पर जल ही शेष रह गया हो।

इस वैभवशालिनी पुरी के अतीत-गौरव की भव्यता का विराट् चित्र जब नेत्रों के समक्ष उपस्थित होता है, तब ऐसा कौन-सा हृदय होगा, जिसका मस्तक महाकाल की इस नगरी के चरणों में सादर न झुक जायेगा? जहाँ कंकर-कंकर में शंकर विराजमान रहते हैं, ऐसी उज्जयिनी को यदि भारतवर्ष के इतिहास से मिटा दिया जाये, तो भारत का इतिहास ही आधा रह जायेगा। ‘महाकालपुरी’, ‘कनकशृंगा’, ‘पद्मावती', ‘भोगवती’ ‘कुशस्थली' व 'हिरण्यवती' - जैसे नामों से समलंकृत रही उज्जयिनी का एक अति प्राचीन नाम जगजाहिर हैअवन्तिका। जी हाँ, कविकुलगुरु कालिदास की कृति 'मेघदूत' में वर्णित यह वही अवन्तिका' है, जिसका एक पैर आज भी कालिदास युग के शिप्रा तट पर खड़ा हुआ ‘श्रीविशाला' के नाम से इसकी सम्पन्नता का बोध करा रहा है।

उज्जयिनी एवं महाकाल का काल का प्राकृतिक और वैज्ञानिक महत्त्व

मेरुस्थान अर्थात् पृथिवी के उत्तरी ध्रुव की स्थिति पर 21 मार्च से प्रायः 6 मास का दिन होने लगता है। इस प्रकार 6 मास के दिन के 3 मास बीत जाने पर सूर्य दक्षिण क्षितिज से अत्यन्त ऊँचाई पर चला जाता है। वराहमिहिराचार्य के अनुसार (21 जून को) उस समय सूर्य उज्जैन के ठीक मस्तक पर स्थित (उज्जयिनी से गुजरी कर्क रेखा पर स्थित) कर्कराजेश्वर पर आ जाता है। तभी इसका अक्षांश और सूर्य की परम क्रान्ति- दोनों ही 24 अंश मानी जाती है। सूर्य की ठीक मस्तक पर स्थिति उज्जयिनी के सिवाय दुनिया के किसी अक्षांश पर प्राप्त नहीं होती। इस प्राकृतिक और भौगोलिक विशेषता के कारण पूरे देश में उज्जयिनी ही एक ऐसा स्थान रहा है जिससे मानक काल (प्रामाणिक समय) का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसी कारण से उज्जयिनी को ग्रीनविच माना गया। कालगणना की इस अद्भुत विशेषता के कारण ही यहाँ के प्रधान देवता का नाम ‘महाकाल' हुआ है।

इसी प्रकार जहाँ आकाश में सूर्य मस्तक पर उज्जयिनी में ही आता है और खगोल में उसे ठीक मध्यवर्ती स्थान होने भूमध्य रेखा पर) का गौरव प्राप्त है, उसी प्रकार भौगोलिक स्थिति से भी उज्जयिनी सारे देश का मध्य स्थान है, जिसे नाभि देश' नाम से संज्ञापित किया गया है। वैदिक संहिता में इसे ‘अमृतस्य नाभि व योगशास्त्र ‘मणिपुर चक्रस्थली' कहा गया है। इसे मातृकास्थान' अर्थात् ‘जगद्धत्रिस्थान' भी कहा गया है। इसमें गम्भीर तथ्य अवश्य है। आकाश में ही मध्यस्थ नहीं, किन्तु धरती पर भी मध्यस्थ का स्थान प्राप्त होने के कारण जो असाधारण महत्त्व महाकाल की नगरी उज्जयिनी को प्राप्त है, वह दुनिया में किसी भूमिखण्ड को प्राप्त नहीं है। लंका से सुमेरुपर्यन्त जो भूमध्य रेखा गई है, 

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