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महाशिवरात्रि आओ शिव का ध्यान करें।
March 1, 2019 • Prof. Rakesh Kumar Upadhyay

भूमि पर रखा पाँव परंपरा है, आगे बढ़ने के लिए उठा हुआ पाँव आधुनिकता है। धर्म और परंपरा का यह अखंड हिन्दू जीवन प्रवाह भारत भूमि पर युगों से बहता चला आ रहा है। नाम और रूप बदले होंगे लेकिन सब में भाव वही कि ईशावास्य मिदम् सर्वम्।। इसलिए आज संभल संभलकर एक-एक कदम आगे बढ़ने और बढ़ाने की आवश्यकता है। मातृभूमि और जीवन-जगत के प्रति भारत का सनातन दृष्टिकोण हर तरह के बंधन से आपको मुक्त करता है। असल आजादी की अवश्यंभावी गारंटी, मुक्ति का वास्तविक महापथ।

भारत के महान अद्वैत दर्शन ने हमें तो यही बताया है। इस प्रकृति पदार्थ मय जगत की हर हलचल इसे प्रमाणित करती है। वायु की लहरें उसी एक की परिक्रमा करने के लिए निरंतर मचलती इठलाती आसमान में ऊपर तक उठती दबाव बनाती देह के पोरपोर को स्पर्शजन्य सुख प्रदान करते हुए ह्रदय के भीतर तक दौड़ती चली जाती हैंक्योंकि वायु के निर्गुण ऊर्जामय रूप को भी मालूम है कि उसे सृजित करने वाला वह महान स्वामी इसी देह के भीतर अन्तरयामी बनकर निवास कर रहा है। इसीलिए देह के सो जाने पर भी यह वायु निरंतर सांसों के जरिए भीतर की प्रत्येक कोशिका तक निरंतर ड्यूटी पर निरत रहती है, मनबुद्धि और शरीर के सारे अवयवों को उसी परम चैतन्य की गोद में लोरी सुना सुनाकर यह सांस इस देह को परम चैतन्य की तरह ही फिर से चैतन्य करती है। जो रूप तुम्हारे भीतर है, उसी को पहचानो, जिसकी सेवा में मैं 24 घंटे जीवन भर इस घर में घूम रही, उसी एक को जानो, वायु का यह संदेश निरंतर पोर पोर तक गीत बनकर समाता है। वायु है तो जीवन में स्पर्श है।

पृथ्वी को भी पता है कि वह चैतन्य नानाविध शरीर के रूप में उसी के गर्भ से नित्य जन्म लेता है, मिट्टी के रजकण विश्व रंगमंच पर उसी एक नटराज के नाट्य के प्राकट्य के लिए पंचतत्वों के साथ लीला रचाते हैं, शरीर रूप में बदलते चले जाते हैं, वनस्पति और अन्न रूपों में वही ज्योति आकार ग्रहण करती है, मिट्टी की गंधमयी ममता में खिलखिलाने वह परम चैतन्य विविध रूप में आते हैं, स्वयं की इच्छा पर्यन्त ममतामय मिट्टी से सने शरीर रूप का वस्त्र पहनते हैं, माया की माया देखकर मुस्काते हैं, उसे माता होने का सुख दे जाते हैं, शरीर के ऐन्द्रिक इंद्रिय केंद्रित रूप के कारण वह परम चैतन्य ही इंद्रिय जनित सुख-दुख के हिचकोलों में गोता भी लगाते हैं, और कर्तव्य और कर्तृत्व रूप में जीवन भर जीकर जब वह देह छोड क र निकल जाते है तो मिट्टी की मूरत जस की तस फिर से मिट्टी में मिल जाती है, वायु का हिस्सा वायु में, अग्नि का हिस्सा अग्नि में, आकाश का हिस्सा आकाश में और जल का हिस्सा जल में वैसे ही विलीन हो जाता है जैसे शरीर की निर्मिति के समय में सब एक साथ चला आता है। जिस देह की साज-संवार में करोड़ों न्यौछावर करते हैं, सबसे तनकर हम जीवन भर चलते हैं, वह तन ही क्षणमात्र में तन्मात्र होकर मिट्टी का ही न्यौछावर बन जाता हैमिट्टी है तो जीवन में गंध है।

वेद ने बताया है कि पृथ्वी युग सृजन के पूर्व कल्पांतकाल में जल में डूब जाती है, और सृजन के समय चतुर्दिक विस्तीर्ण अगाध समंदर रूप जल से ही निकलकर प्रकट हो जाती है क्योंकि वह परम चैतन्यरूप शिव ही सभी पंच तत्वों को क्रीड़ा का समान अवसर और स्थान उपलब्ध कराते हैं, सबको सृजन पथ पर चलने के लिए नियम-निर्देशित करते हैं। वेदों ने इसे ही ऋत कहा है। ऋत से ही ऋतु है, ऋतुएँ हैं, ऋत से ही नियम हैं, यह संपूर्ण ब्रह्मांड ऋत पर टिका है। ऋतेन सत्यं। ऋत क्या है तो ऋत सत्य है। इसी ऋत की रीति चली आई है युगों से भारत में कि रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जायं पर वचन न जाई। क्योंकि वचन जो सत्य है, वह सत्य ऋत हैऔर इस ऋत ने ही प्राण के रूप में समस्त ब्रह्मांड को धारण कर रखा है। ऋत का प्रण या संकल्प है यह ब्रह्मांड और विश्व व्यवस्था। यह ऋत अपने कर्तव्य पथ पर निर्मम और अप्रतिहत गति से चलता है एक सेकेंड भी अपनी ड्यूटी से यह ऋत हटता नहीं है क्योंकि उसे मालूम है उसके परम शिव को सत्य से द्रोह यानी कर्तव्य में आलस पसंद नहीं है, जो प्रण रूप है और जो वचन है उसे निभाना ही ऋत है। नहीं निभाया तो ऋत ऋत नहीं रहेगा, प्रण समाप्त होते ही प्राण चले जाते हैं, यही परंपरा हमने देखी है इस देश में सदियों से। यह ऋत ही कर्तव्य रूप है, यह कर्तव्य ही धर्म हैअतएव ऋत ही धर्म है। यह धर्म ही है जो समूचे ब्रह्मांड को धारण करता है। धारयते इति स धर्मः। जो धारण करता है वही धर्म है, धर्म यानी जो जोड़ता है। मानव को मानव से, मानव को समस्त देहधारियों से और समस्त संसार, भूमि और ब्रह्मांड से जो जोड़ता है वह धर्म है। और जो तोड़ता है, जो शिव की लीला के विरूद्ध जाकर कार्य करता है, उसे ही इस देश ने अधर्म कहा है। आजकल के धर्म इस परिभाषा में कहाँ टिकते हैं, कौन बताए, कौन सुनाए।

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