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महात्मा गाँधी की दृष्टि में गौ
November 1, 2017 • Parffulla Chandra Thakur

सनातन-धर्म के अन्तर्गत भारतीय जनमानस में गाय की एक विशेष स्थिति रही है। इसे माता का स्थान प्राप्त है। वैदिक साहित्य, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृति तथा इतिहास में गो-माहात्म्य की भरपूर चर्चा है। गोसेवा, गोपालन, गो-संवर्धन और गोवंश की उन्नति भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। गो के धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक महत्त्व सर्वविदित हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने भी गाय की महत्ता को स्वीकार करने पर बल दिया है। वे गाय को भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग मानते थे। वे इसे धार्मिक, आध्यात्मिक, आर्थिक और पर्यावरण की उन्नति का प्रतीक भी मानते थे। इस तरह उन्होंने गाय को मानव की प्रगति के केन्द्र-बिन्दु में स्थान दिया है। गाँधीजी का मानना था कि गाय भारत सहित सम्पूर्ण विश्व की व्यवस्था का केन्द्र-बिन्दु है। गाँधीजी मानते थे कि मानव और प्रकृति के बीच सम्बन्ध में गाय की अत्यधिक प्रभावशाली भूमिका है। भारत में गाय को हमेशा ही पालनहार माना जाता है। गाय भरपूर मात्रा में दूध देती है। गोवंश पर ही कृषि-व्यवस्था टिकी हुई है।

भारत के पुनरुत्थान में गाँधीजी का योगदान महत्त्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने देश की मूलभूत आवश्यकताओं और समस्याओं के निदान के ठोस उपाय प्रस्तुत किए। गाँधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों में गो-संरक्षण एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम था। गाँधीजी की मान्यता थी कि जिस तरह एक कारीगर अपने औजारों-उपकरणों के बिना कुछ नहीं कर सकता, उसी तरह एक किसान भी गाय के बिना कुछ नहीं कर सकता। गाय अन्न का एक प्रमुख स्रोत है। यह हमारी अर्थव्यवस्था का आधार भी है। गाँधीजी गाय का खेती में योगदान एक चालित शक्ति के रूप में मानते हैं। बैलों का प्रयोग हुल के अतिरिक्त फसल ढोने में भी होता है। गाँधीजी देश की अर्थनीति का केन्द्रबिन्दु गाय को मानते थे जो बाद में कोयला, डीजल और पेट्रोल बन गया। दुनिया में कोयले और पेट्रोल की मात्रा तो सीमित है। इसे कभी-न-कभी खत्म होना ही है। इसके विपरीत गाय, बैल, गोबर और मूत्र तो शाश्वत हैं। पेट्रोल को लेकर कई देशों में तनावपूर्ण स्थिति हो जाती है, जबकि गाय पर आधारित अर्थनीति की एक स्थायी नीति और शांतिपूर्ण अर्थशक्ति भी हो सकती है। गाँधीजी अर्थव्यवस्था में गाय को प्रतीक के रूप में रखने पर जोर देते थे। वे गायों की उपयोगिता को बढ़ाने के पक्षधर थे। वे खेती में पारम्परिक ढंग के औजारों को ही पसन्द करते थे। उनका मानना था कि इससे भूमि की क्षमता को बचाया जा सकता है। पारम्परिक हल एक ऐसा औजार है जो भूमि में एक सही गहराई तक जाता है तथा मिट्टी का संरक्षण करता है। गाय-बैल के मल-मूत्र से निर्मित खाद अच्छी, उपजाऊ और सुरक्षित होती है। गोबर जलाने के काम में आता है। मृतक गाय के शरीर के अंगों का उपयोग भी किया जाता है। 

गाँधीजी गाय की रक्षा को हिंदू-धर्म का मुख्य तत्त्व मानते थे। गाँधीजी गाय को हिंदूधर्म की विश्व को एक प्रमुख देन भी मानते थे। उनके अनुसार आखिर में एक हिंदू का मूल्यांकन इसी बात से होता है कि वह गायों की किस प्रकार और किस हद तक सेवा तथा रक्षा करता है। गाँधीजी को इस बात का मलाल था कि हमारे समाज में गाय की सुरक्षा तथा संवर्धन जितना होना चाहिए, उतना नहीं हो रहा है। गाँधीजी गाय को धर्म ही नहीं, जीवन से भी जुड़ी मानते हैं।