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मन्दिर और उनका मूल प्रयोजन
October 1, 2016 • Shri Ram Sharma Achayar

मन्दिरों के निर्माण का प्रमुख उद्देश्य जनमानस में धार्मिकता को, निष्ठा को जमाने और बढ़ाने में योग देना ही है। ईश्वभक्ति का मतलब इतना ही नहीं है कि कुछ मंत्र जप लिए जायें, कुछ पाठ कर लिया जाये, देवदर्शन कर लिया जाये और प्रतिमाओं को भोग-प्रसाद चढ़ाकर कर्तव्य की इतिश्री मान ली जाये और इतने से ही यह आशा लगा ली जाये कि यह थोड़ा-सा क्रिया-कृत्य ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए पर्याप्त है। ईश्वरभक्ति का मतलब अपने अन्दर भरे हुए कुविचार और कुकर्मों का, दुर्भावों और । दुष्प्रवृत्तियोंका शमन करना है। यह जितनी ही बढ़ती है उतना ही हमारा आत्मिक स्तर बढ़ता है। और इस बढ़ोत्तरी के अनुपात से ही ईश्वर के निकट पहुँच सकना सम्भव होता है। सद्णी, सुसंस्कृत, विकसित, व्यवस्थित होना ही ईश्वरीय प्रकाश को अपने अन्तःकरण में प्रकाशवान होते हुए हम अपने भीतर देख सकते हैं। मान्यताओं को जनसाधारण के अन्तःकरण में जागृत रखना, व्यक्ति को कर्तव्यपरायण, आदर्शवादी और सुविकसित व्यक्तित्व का बनाए रखना मन्दिरों का उद्देश्य है। प्राचीन काल में जब उनका निर्माण आरंभ किया . गया था, तब ऋषियों के मस्तिष्क में एक ही प्रयोजन था कि इन धर्म-संस्थाओं माध्यम से जनमानस में धर्म-धारणा का जागरण एवं अभिवर्धन होता रहे।

मन्दिर एक प्रकार से धर्म के केन्द्र हैं। जिस प्रकार आजकल सभा संस्थाएँ बनती हैं, चन्दा इकट्ठा होता है, पदाधिकारी चुने जाते हैं, तू-तू, मैं-मैं होती है, धन और पद का लाभ लेने के संघर्ष खड़े होते हैं और अन्त में वे संस्थायें जो दूसरों का उद्धार करने के लिए बनी थीं, स्वयं ही दयनीय दुर्दशा में जा पहुँचती हैं। दूरदर्शी ऋषियों को इस संभावना का पता था इसलिए उन्होंने धर्म-संस्थाओं को मन्दिरों का रूप दिया। भगवान् की प्रतिमाएँ स्थापित कीं, संस्था का संचालक व्यक्तियों को नहीं, भगवान् को यो बनाया। उनके निवासस्थान के रूप में सुन्दर इमारतें बनीं, इन धर्म-संस्था के कार्यक्रमों को नियमित रूप से चलाने के लिए पुजारी एवं महन्तों की नियुक्ति की गयी। अर्थव्यवस्था का ऐसा क्रम बनायागया कि इन धर्म संस्था के कार्यकर्ताओं के निर्वाह का क्रम ठीक चलता रहे, उनके स्वाभिमान को किसी भी प्रकार ठेस न पहुँचे। भगवान् के भोग-भोजन, जलपान, रात्रि को दूध का प्रबन्ध किया गया ताकि उस निमित्त से उस संस्था के कार्यकर्ताओं को नियत समय पर सुसन्तुलित आहार मिलता रहे और वे अपना शरीर स्वस्थ रखते हुए नियत उत्तरदायित्वों को ठीक तरह निभाते रह सकें। जो दक्षिणा और पूजा चढ़ाई जाए, सो भगवान् के चरणों में रखी जाये ताकि कार्यकर्ताओं के आवश्यक निर्वाह-व्यय का क्रम ठीक-ठीक चलता रहे। देनेवाला यह न समझे कि हमने कार्यकर्ताओं को देकर उनके ऊपर अहसान किया और कार्यकर्ता यह न अनुभव करे कि उन्हें दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता है। दानी को अहंकार और प्रतिग्राही को दीनता उत्पन्न न होने पाये, इसलिए भगवान् को माध्यम बनाकर उनके निमित्त से कार्यकर्ताओं के निर्वाह का उचित और स्थायी प्रबन्ध करना ही उचित एवं दूरदर्शितापूर्ण ही था।

भगवान की प्रसनता का माध्यम

स्पष्टतः भगवान् किसी के द्वारा दिए हुए रोटी-कपड़ों के इच्छुक नहीं हैं। वे स्वयं इन वस्तुओं के उत्पादक हैं और मनुष्य को देते हैं। ऐसी देशा में ये वस्तु उन्हें प्रसन्नता- अप्रसन्नता देनेवाली नहीं बन सकतीं।भगवान् तो भावना के भूखे रहते हैं, उनकी प्रसन्नता का कारण मनुष्य की सत्प्रवृत्तियाँ ही हो सकती हैं। आरती-स्तुति आदि देख- सुनकर भी वे किसी के साथ पक्षपात या कृपा करने को तत्पर नहीं हो सकते। उनके सामने तो मनुष्य के सत्कर्म एवं दुष्कर्म ही विचारणीय होते हैं, वे इसी आधार पर किसी को भक्त-अभक्त, आस्तिक-नास्तिक मानते हैं। पूजा-उपकरण तो इसलिए बनाए गए हैं कि उनके निमित्त से मनुष्य अपने और ईश्वर के स्वरूप तथा सम्बंध को समझता रहे और पथभ्रष्ट न होकर कर्तव्य पर दृढ़तापूर्वक आरूढ़ बना रहे। ऐसी दशा में बिना मन्दिर के, बिना पूजा-अनुष्ठान के भी मनुष्य अपनी सच्चरित्रता एवं सद्भावना के आधार पर ईश्वप्राप्ति का अधिकारी हो सकता है। फिर मन्दिरों का निर्माण क्यों हुआ? क्यों इनके लिए इतनी धनशक्ति, इतनी जनशक्ति लगानी पड़ी? इसका उत्तर एक ही है और वह यह कि इन धर्म- संस्थानों के माध्यम से सत्प्रवृत्तियाँ फैली रहें जो मनुष्य को आस्तिकता एवं धार्मिकता को बढ़ाने का उद्देश्य पूर्ण करें।

प्राचीन काल में मन्दिरों में देवपूजन मात्र ही नहीं होता था वरन् उनमें वे समस्त रचनात्मक प्रवृत्तियाँ भी पलती थीं जो जन- कल्याण के लिए आवश्यक थीं। मन्दिर एक प्रकाश स्तम्भ की तरह होते थे। अपने क्षेत्र में मानवीय उत्कर्ष एवं कल्याण के सभी सम्भव आयोजन करते रहते थे। पुजारी का, महन्त का एकमात्र उद्देश्य जनजीवन में सत्प्रेरणाएँ उत्पन्न करने के लिए निरन्तर प्रयास करते रहना ही था। मन्दिररूपी धर्मसंस्था उन सभी सत्प्रवृत्तियों की केन्द्र रहती थी जो उस समय की आवश्यकताओं की दृष्टि से अभीष्ट होती थी। जिस प्रकार शासनतन्त्र के कचहरी-कार्यालय आदि होते हैं, उसी तरह धर्मतन्त्र के कार्यालय ये मन्दिर थे। भ्रमण करनेवाले परिव्राजक, साधु-सन्त वहाँ ठहरते थे, अफसरों के दौरे में जो उद्देश्य डाक बंगलों, इन्सपेक्शन हाउसों से पूरा करते हैं, वही सुविधा मन्दिरों में परिवाजक, साधओं एवं धर्म-प्रचारकों को मिलती थी। जैसे तहसील-थाने आदि में सरकारी अफसर रहते हैं, वैसे ही धर्मतन्त्र के कार्यकर्ता-पुजारियों, पुरोहितों-महन्तों और साधुओं के रूप में रहते थे। जिस प्रकार सरकारी कर्मचारी जनता की भौतिक सुरक्षा एवं व्यवस्था का ज़िम्मेदारी उठाते हैं, उसी प्रकार धर्म-पुरोहितों की जनता के मानसिक स्तर की भावना, संस्थान की, चरित्र एवं स्तर की देखरेख करनी थी, इसलिए उनका कार्य एवं उत्तरदायित्व भी शासनतन्त्र की अपेक्षा किसी प्रकार कम न था। सरकार को इमारतें, कर्मचारी तथा सम्पत्ति चाहिये तो धर्मक्षेत्र में काम करने के लिए भी इन तीनों की आवश्यकता रहेगी ही। इन साधनों को सुव्यवस्थित रूप से जुटाने के लिए मन्दिर बनाये गये- उन्हें धार्मिक किले ही कहना चाहिए।

चिरकाल तक मन्दिर अपना यही विशुद्ध स्वरूप बनाए रहे, पर आज तो जबकि सब कुछ उलटा ही हो रहा है तो मन्दिर से ही यह आशा कैसे की जाये कि ये वही कार्य करते रहेंगे जिनके लिए इनके निर्माण करने की योजना दूरदर्शी ऋषियों ने बनाई थी। अब तो मन्दिर बनानेवाले इसलिए मूर्तियाँ पधारते हैं कि भगवान् को रोटी, कपड़ा, स्नान, स्तुति, आरती आदि की जो सुविधाएँ जुटायेंगे, उसके बदले में भगवान् भी उन्हें तथा उनके घरवालों को कुछ दिया करेंगे। भगवान् के ऊपर अहसान किया जा रहा है तो भगवान् भी कृतघ्न क्यों होंगे? वे भी अहसान का बदला अहसान में ही चुकायेंगे। हम भगवान् के रहने का बढ़िया प्रबन्ध करें और भगवान् बदले में हमें यहाँ रोटी-बंगले और स्वर्ग में बड़े-बड़े महल दें- ऐसी ही कामनाएँ लेकर लोगों के मन्दिर बनते चलते हैं। पुजारी अपना कर्तव्य प्रतिमा का श्रृंगार कर देना, भोग लगा देना आरती कर देना मात्र समझकर छुट्टी पा लेते हैं। दर्शनार्थी केवल प्रतिमा को देखकर उसे नमस्कार कर देवता के अनुग्रह एवं वरदान का अपने को अधिकारी मान लेते हैं। आज ऐसी ही लोक विडम्बना चारों ओर फैली फिर रही है। उन उद्देश्यों को भुला ही दिया गया है जिनको लेकर ऋषियों के मस्तिष्क ने मन्दिरों की सुव्यवस्थित योजना विनिर्मित की थी।