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मन्दिरों में प्रतिमा का स्थान एवं अनुपात
April 1, 2018 • Prof. Vasudev Upadhyay

मन्दिरों के गर्भगृह में ही मुख्य प्रतिमा प्रतिष्ठित की जाती है। प्रतिमा के अनुसार ही मन्दिर के प्रांगण तथा अन्य आकार-प्रकार तैयार किए जाते हैं। वैष्णव मन्दिर में विष्णुआसन, स्थानक या शयन-प्रतिमा के कारण मन्दिर के दीवालों पर वैष्णव धर्म- सम्बन्धी अन्य कलाकृतियाँ दिखलाई पड़ती हैं। आमलक के ऊपर चक्र दिखलाई पड़ता है। मुख्य द्वार के सामने गरुड़ की भी आकृति मिलती है। बेसनगर का हेलियोडोरस का विष्णुध्वज उसी का रूपान्तरमात्र है। पुरी के जगन्नाथ मन्दिर में मुख्य द्वार के बाहर गरुड़-ध्वज स्थित है। उसी तरह शैव मन्दिर में शिव की प्रतिमा, शिव-परिवार की आकृतियाँ तथा नन्दी की मूर्ति बनाई जाती है। त्रिशूल को देखकर ही कहा जा सकता है कि अमुक (मन्दिर) शिव-मन्दिर है। मन्दिर के गर्भगृह के चारों और लम्बवत् दीवार में अन्य आकृतियाँ खुदी मिलती हैं। भारत में प्रधान प्रतिमा के चारों और आवरण-देवता की मूर्तियाँ भी कलापूर्ण तैयार की जाती थीं।

मन्दिर के बाहरी भाग पर विभिन्न आकृतियाँ दीख पड़ती हैं। उनके परीक्षण से पता चलता है कि उन आकृतियों का कोई पृथक् स्थान निर्धारित नहीं किया जा सकता, अपितु वे सब मन्दिर के स्थापत्यकला के अंग हैं। उन्हें मन्दिर के दीवाल की सतह से उभारकर बनाया गया है। प्रायः उनको एक सीध में रखते हैं। जिससे सुन्दरता में किसी प्रकार की कमी न आ सके। खजुराहो के कन्दरिया महादेव मन्दिर पर आकृतियों का यही क्रम दिखलाई पड़ता है। मन्दिर के दीवाल की मोड़ (मॉल्डिंग) पर पूरे ढंग से आकृतियाँ उभारकर खोदी गई हैं। उस खुदाई में सभी आकृतियाँ धार्मिक भावना से सम्बन्धित हैं। उनकी खुदाई की सार्थकता में सन्देह नहीं किया जा सकता, पर उन्हें प्रासाद (मन्दिर) का अलंकरण भी कह सकते हैं।

मन्दिर के स्थापत्यकला की जो रूपरेखा तैयार हुई, उसके अन्तर्गत सभी खुदाई का स्थान प्रायः निश्चित-सा हो जाता है। आकृतियों द्वारा बाहरी आकार-प्रकार का आभास नहीं होता। किन्तु मन्दिर की मुख्य प्रतिमा के सहायक रूप में अन्य मूर्तियाँ या आकृतियाँ तैयार की जाती थीं। मुख्य प्रतिमा का पृष्ठभाग दृष्टिगोचर न होने के कारण उसे समतल या चिकना करने की भी आवश्यकता न थी। इसी प्रकार चारों ओर स्थित आवरण देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ प्रस्तर के सम्मुख भाग पर खुदी मिलती हैं। आवरण- मूर्तियाँ गहराई में खोदकर तैयार की जाती हैं और मन्दिर के उतार-चढ़ाव में समुचित रूप से स्थिर की जाती हैं। तक्षण-कला के इस तरह के नमूने मन्दिरों को सुन्दर एवं भव्य बनाने में योगदान करते हैं।

मन्दिर के प्रधान गर्भगृह में स्थित) प्रतिमा से असम्बद्ध कुछ देवताओं की आकृतियाँ बाहरी दीवाल पर निर्मित हैं और विष्णुमन्दिर पर विभिन्न अवतार या शिवपरिवार के देवी-देवता अथवा अष्ट दिक्पाल को भी स्थान दिया गया है। मन्दिर के द्वार पर चौखट से सम्बद्ध कई प्रकार की आकृतियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। ऊपरी चौखट के केन्द्रभाग में मुख्य प्रतिमा का संक्षिप्त आकार (प्रतिमूर्ति) तथा दोनों ओर नदी देवता की मूर्ति खोदी जाती थी। इसके अवलोकन से एक समष्टि की भावना होती है। किसी भी तरह उनका पृथक्करण सम्भव नहीं है। 

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