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मध्य प्रदेश के सीतामऊ का लदूना दुर्ग
May 16, 2019 • डॉ. कुमारी रेखा द्विवेदी

मध्यकाल में दुर्ग स्थापत्य में काफी निखार आया। पूर्व मध्यकाल (सल्तनत काल) से स्थापत्य की परम्परा चली वो उत्तर मुगल काल तक अनवरत चलती रही। मुगल काल को अगर स्थापत्य की दृष्टि से आंका जाय तो वह स्वर्ण युग था। उस युग के स्थापत्य ने ब्रिटिश शासन के स्थापत्य को भी प्रभावित किया। मुगल काल के बाद जो भी दुर्ग बने उन पर मुस्लिम शैली का पूरा प्रभाव रहा है।

भारत में सैंकड़ों की संख्या में दुर्ग है। ऐसा ही एक दुर्ग मध्यप्रदेश के पश्चिम में स्थित मन्दसौर जिले के अन्तर्गत सीतामऊ तहसील में स्थित गाँव लदूना में स्थित है।

16वीं शती के अंतिम वर्षों में लदूना मुगल साम्राज्य के तत्कालीन तीतरोद परगने के अन्तर्गत था।

ऐसा माना जाता है कि लदूना गाँव की उत्पत्ति पाँचवी शताब्दी में हुई थी। इसका नाम लव नगर और बाद में लवसागर के नाम पर पड़ा। यह नाम कब और कैसे पड़ा इसके बारे में पूरी जानकारी नहीं मिलती। ऐसा माना जाता है कि सर्वप्रथम कुछ बंजारों ने यहाँ धर्मराज मन्दिर, पालकी, चामुण्डा मन्दिर और झील का निर्माण किया।

केशवदास राठौड़ ने अक्टूबर 30, 1701 ई. को सीतामऊ राज्य की स्थापना की और लदूना तालाब (लवसागर) के पूर्वी किनारे पर निवास हेतु महलों की नींव रखी। केशवदास के पौत्र फतेहसिंह के शासनकाल (1752 से 1809 ई.) में मराठों का आतंक बढ़ गया था उस दौरान 1748 ई. में सीतामऊ से बदलकर लदूना के राज महलों में अपना निवास कर लिया। अतः सुरक्षा की दृष्टि से राजा फतेहसिंह द्वारा लदूना को सीतामऊ की संकटकालीन राजधानी बनाया गया क्योंकि यहाँ एक और तो तालाब से उसकी रक्षा हो सकती थी और आक्रमण होने पर पास के जंगल में बचाव के लिये आश्रय मिल सकता था।

फतेहसिंह का पुत्र राजसिंह भी कुछ वर्षों तक लदूना में ही रहा। उसके द्वारा दुर्ग के पश्चिम में महल से लगी हुई एक कुईया खुदवाई और उसके निकट तालाब पर घाट भी बनवाया। राजसिंह की द्वितीय रानी राजकुंवर चावड़ीजी ने तुलादान किया और तालाब पर राजघाट का निर्माण करवाया। महल के प्रथम मंजिल की छत पर लगे शिलालेख से जानकारी मिलती है कि राजसिंह द्वारा गढ़ की मरम्मत का कार्य भी करवाया गया। राजा राजसिंह के शासन काल में लदूना में और भी कई निर्माण कार्य हुएराजसिंह के बाद क्रमशः भवानीसिंह, बहादुरसिंह, शार्दूलसिंह तथा रामसिंह सीतामऊ के शासक बने।

रामसिंह ने भी लढूना के दुर्ग में निवास किया और यही महारानी सरसकुंवर की कौख से प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. रघुबीरसिंहजी का जन्म हुआ।

इन राजमहलों का महत्व डॉ. रघुबीरसिंह के जन्म के कारण बढ़ गया है। रघुबीरसिंह जन्म स्थली होने के कारण लदूना ने इतिहासकारों एवं साहित्यकारों के हृदय में स्थान बना लिया हैयहाँ पर समय-समय पर देश भर के इतिहासकार एवं साहित्यकार एकत्रित होकर डॉ. रघुबीरसिंह का स्मरण करते हैं और इतिहास एवं साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हैं।

लदूना दुर्ग-वर्तमान स्वरूप - सर्वप्रथम केशवदास ने सीतामऊ राज्य की स्थापना (अक्तूबर 31, 1701 ई.) के बाद लदूना तालाब (लवसागर) के पूर्वी किनारे पर राजमहलों की नींव रखी। तदनन्तर विभिन्न शासकों ने इसका विस्तार एवं जीर्णोद्धार करवाया।

लदूना गढ़ का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा में स्थित है, इसकी ऊँचाई 25' एवं चौड़ाई 10' है। अन्दर जाने पर खुला मैदान हैऔर आगे चलकर दूसरा प्रवेश द्वार है, इसकी ऊँचाई 12' तथा चौड़ाई 7'3' है। द्वितीय प्रवेश द्वार के दक्षिण में एक बड़ा हॉल बना हुआ है, जिसकी लम्बाई 32'3" तथा चौड़ाई 11'6" है। वर्तमान में इस हॉल पर छत नहीं है और यह जीर्ण शीर्ण अवस्था में है। इसी प्रवेश द्वार के उत्तर दिशा में एक दूसरा हाल एवं एक कमरा है। हाल की लम्बाई (पू.प.) 53' तथा चौड़ाई 14'3" है तथा कमरे की लम्बाई (उ.द.) 14'3' और चौड़ाई 129" हैइसी प्रवेश द्वार के पश्चिम में लक्ष्मीनारायण जी का मन्दिर बना हुआ है जिसकी लम्बाई (पू.प.) 35' तथा चौड़ाई 26'6' है। मन्दिर का प्रवेश द्वार उत्तर में स्थित है, तथा मन्दिर से निकलने पर उसके बाहर इतना ही बड़ा चबूतरा स्थित है। इस चबूतरे पर एक तुलादान का स्मारक बना हैस्मारक पर एक शिलालेख है, जिस पर राजा फतेहसिंह (17481802 ई.) की रानी अखेकुंवर चावड़ी द्वारा किये गये तुलादान का उल्लेख है। इस मन्दिर का निर्माण एवं उद्यापन राजा राजसिंह के शासन काल में हुआ थाइसका निर्माण कार्य पंचोली गणेशराय कामदार के निरीक्षण में सीतामऊ निवासी जेल्या गोत्र के विसराम द्वारा किया गया था।

इसी प्रवेश द्वार के पश्चिम में मन्दिर से लगा हुआ मुख्य महल है। महल का प्रवेश द्वार जनानी ड्योढ़ी उत्तर दिशा में स्थित हैतथा इसकी चौड़ाई 5' एवं ऊँचाई 8'6" हैमहल के प्रवेश द्वार के बाहर दाँयी एवं बाँयी और एक-एक बरामदा एवं एक-एक कमरा है। यह दालान एवम् उस समय के चलन के अनुसार पहरेदारों तथा काम काज करने वालों के बैठने के लिए बने थे। दाँयी ओर स्थित बरामदे की लम्बाई (पू.प.) 129" तथा चौड़ाई 10'3" हैं। तथा कमरे की लम्बाई (उ.द.) 10'3" तथा चौड़ाई 9' है। बाँयी ओर स्थित बरामदे की लम्बाई (उ.द.) 11'3" तथा चौड़ाई 10'9" है। कमरे की लम्बाई (उ.द.) 10'3" तथा चौड़ाई 7'3" है। इनके ऊपर अभी टीन की छत हैं। महल के प्रवेश द्वार के सामने 12'3" लम्बा (उ.द.) तथा 9' चौड़ा गलियारा है। महल में प्रवेश करने पर 59'3" लम्बा तथा 53'6" चौड़ा बगीचा है जिसके बीचों बीच फव्वारा बना हुआ है। बगीचे के पश्चिम में एक चबूतरे जैसी खाली जगह है जिसके बीच में 6'*6' की भूल भुलैया पद्धति की जल प्रणालिकाएँ हैं। इसके उत्तर दिशा में 59" लम्बा (पू.प.) तथा 39" चौड़ा स्नानगार है तथा इसी से लगा हुआ 66" लम्बा तथा 5'3" चौड़ा शौचालय है। भूल भुलैया प्रांगण के पश्चिम में एक बरामदा तथा बरामदे के दाँयी एवं बाँयी ओर एक-एक कमरा है। बरामदे की लम्बाई (उ.द.) 249" तथा चौड़ाई 10'9" है। दाँयी ओर के कमरे की लम्बाई (उ.द.) 13' तथा चौड़ाई 10'9" है। बाँयी तरफ का कमरा भी इसी नाप का है। दोनों कमरों के प्रवेश द्वार बरामदे में ही हैंबरामदे से अन्दर जाने पर पश्चिम की तरफ एक हॉल है। हॉल की दाँयी एवं बाँयी ओर यहाँ भी एक-एक कमरा है। हॉल की लम्बाई (उ.द.) 24'6" तथा चौड़ाई 11'9" है। दोनों कमरों की लम्बाई (उ.द.) 12'4' तथा चौड़ाई 11'9" है।इनके पीछे खिड़कियाँ, गोखडे एवं झरोखे हैं, जो पश्चिम की तरफ खुलते हैं।

बगीचे के दक्षिण में दो कमरे हैं, जिनके प्रवेश द्वार बगीचे में ही हैं। इनमें से एक का पुनःनिर्माण कुछ समय पूर्व ही करवाया गया है। इसकी लम्बाई (पू.प.) 296" तथा चौड़ाई 6'3" है। इसे बीच में से दो भागों में बाँटा गया है।

दूसरा कमरा भूल भुलैया प्रांगण के दक्षिण में स्थित है इसकी लम्बाई (पू.प.) 12' तथा चौड़ाई 8'3" है। इस कमरे में महल की दूसरी मंजिल पर जाने के लिये सीढ़ियाँ बनी हैं।

दूसरी मंजिल - सीढ़ियों के ऊपर पहुँचने पर उत्तर दिशा में एक 13' लम्बा एवं 129" चौड़ा एक कमरा है, जिसका फर्श मिट्टी की है तथा इसमें एक मिट्टी का चूल्हा भी बना है। इस कमरे के पूर्वी एवं दक्षिणी (पू.प.) 179" तथा चौड़ाई 9'6' है। यह कमरा पूर्व में कच्चा था अब इसे संस्थान द्वारा पक्का बनाया गया है। इसी कमरे में फरवरी 23, 1908 ई. को महाराजकुमार डॉ. रघुबीरसिंह का जन्म हुआ था।

सीढ़ियों के ऊपर पहुँचने पर जो कमरा है उसके उत्तर के द्वार से निकलने पर 25 लम्बी तथा 12'3" चौड़ी खुली जगह है। इस जगह पर ऊपर जाने के लिये सीढ़ियाँ बनी हैं। इस खुली जगह के उत्तर दिशा में 149" (उ.द.) लम्बा तथा 12' चौड़ा कमरा है। इस कमरे के पूर्वी एवं उत्तरी कोने पर एक शौचालय एवं स्नानागार है।

उपर्युक्त खुली जगह के पश्चिम में 25'6" (उ.द.) लम्बा तथा 12'S' चौड़ा एक हॉल है, जिसका प्रवेश द्वार पूर्व दिशा में स्थित है। हॉल के दाँये-बाँये पुनः दो कमरे हैं। दोनों कमरों की लम्बाई 13" (पू.प.) तथा चौड़ाई 129" है। दाँये कमरे के उत्तर एवं पश्चिम दिशा की ओर एक-एक खिड़की है जबकि बाँये कमरे केपश्चिम में एक खिड़की है। हॉल के पश्चिम में एक खिड़की है। हॉल के पश्चिम में एक झरोखा है जिसकी चौड़ाई (पू.प.) 3'6" तथा लम्बाई 7'3" है। 

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