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भोग, भक्ति और भ्रम
June 1, 2017 • Rekha Bhatiya

जब से भाजपा सत्ता में आयी, फिर देश के कई स्थानों पर चुनावों में भाजपा ने जीत हासिल की और सबसे बड़ी गूंज के साथ एक सुबह भगवा वस्त्रों में फोटो के साथ हर अखबार में, हर चैनल पर समाचार आने लगे कि श्री योगी उत्तरप्रदेश के नये मुख्यमंत्री चुन लिए गए और भाजपा की ऐतिहासिक जीत हुई। तभी से सत्ता के गलियारों में जोरदार बहस छिड़ गई है। मोदीजी के बाद, योगीजी जिस तेजी से बदलाव ला रहे हैं, देश और मीडिया कई हिस्सों में बँट गया है। कुछ इसके पक्ष में हैं, परन्तु कुछ जो भगवा रंग को हिंदुत्व मानते हैं, वे इसके विरुद्ध हैं, क्योंकि हिंदुत्व से उन्हें । मानते हैं, वे इसके विरुद्ध हैं, क्योंकि हिंदुत्व से उन्हें । परेशानी है। कुछ बुद्धिजीवियों का मानना है भारत में हिंदू-धर्म की तेज चलती लहर अन्य धर्मों के अनुयायियों के लिए स्वास्थवर्धक नहीं है। कुछ ने धर्म की बड़ी-बड़ी परिभाषाएँ दी और सनातन-धर्म और हिंदू-धर्म में फर्क बताया। भारत में तेजी से कुछ एक सालों से एक नया बदलाव यह आया है कई आधुनिक धर्मगुरुओं ने अंग्रेजी में वैज्ञानिक तरीके से धर्म की नयी परिभाषा समझायी है जिसका पालन उपयुक्त, नीतिपूर्ण और आसान तरीके से व्यस्त दैनिक जीवन में किया जा सकता है, जिनकी ओर बहुत सारी जनता आकर्षित हुई है और पालन भी करने लगी है। कई हजार वर्ष पुराने हिंदू-धर्म के कई निंदक हैं, कई उपासक हैं, परन्तु नीतिपूर्ण उचित बदलाव भी चाहते हैं।

कई विद्वान् मानते हैं कि भारतीय समाज हमेशा से ही बड़ी-बड़ी बातें करता है, दुनिया को उपदेश देता है और स्वयं दोहरी मानसिकता का शिकार है। भारत पाँच सौ इकत्तीस साल गुलाम रहा, इस दौरान भारत के शासक दूसरे धर्मों के थे, भारत की जनसंख्या का बड़ा भाग सदियों से हिंदू-धर्म को मानता है और गुलामी के दौरान हिंदू-धर्म पर दूसरे धर्मों का प्रभाव भी पड़ा और उस पर अत्याचार भी हुए। क्या वर्तमान परिस्थिति के लिए सिर्फ धर्म को दोष देना उचित है? समाज में वर्तमान में यह भी भ्रम फैला हुआ है पश्चिम के लोग जीवन के मूल्यों को बेहतर समझते हैं। सिक्के के दो पहलू होते हैं। दूसरा पक्ष जाने बिना सिर्फ एक पक्ष को उचित ठहरना न्यायपूर्ण नहीं है। पहले जानें कि सनातन-धर्म की परिभाषा क्या है।

भारतीय सनातन परम्परा के अनुसार मनुष्य-जन्म में आत्मा को प्रथम स्थान दिया गया है और मानव शरीर को दूसरा। सनातन-धर्म के अनुसार शरीर के सुख, भोग, रोग, मनोरंजन, विलासिता, जीवन के दुःख, कठिनाइयों, परेशानियों और दर्द को दूसरा स्थान प्राप्त है, परंतु प्रथम हर जीव-जंतु, प्राणी, चर पहले एक आत्मा है जो कि परमात्मा का ही अंश है, जो इस जन्म में भौतिक शरीर को धारणकर इस भौतिक धरती पर जन्म लेकर आया है। सनातन-परम्परा के अनुसार हर आत्मा का कर्म धर्म के अनुसार हो, शरीर नाशवान् है। और दुःख, बुढ़ापा, मृत्यु, बीमारी और स्नेहजन-विरह- यह मनुष्यजीवन के पाँच सत्य हैं और सभी के जीवन में आयेंगे। आत्मा अमर है जो न कभी मर सकती है न ही कभी मिट सकती है, एक जन्म में धारण शरीर को छोड़कर कर्मों के अनुसार नये शरीर में दुबारा जन्म लेती है। इसीलिए सनातन-धर्म में कर्म की गति को बहुत महत्ता दी गई है, उसी परम्परानुसार आत्मा के जीवन का यह चक्र है और आत्मा इस चक्र से निकालकर मोक्ष को प्राप्त करती है, उसे मुक्ति मिलती है, परमात्मा का वही अंश आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है। आत्मा की इस चक्र से निकलने की जो प्रक्रिया है, उसका मार्ग कैसा हो, कर्म कैसे हों जो इस चक्र से निकलने और मुक्ति को पाने में सहायक हों- इस प्रक्रिया का मार्गदर्शन धर्म और अधर्म के ज्ञाता धर्मगुरु करते हैं। आत्मा के वाहन शरीर को जीवित रखने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है, यह ऊर्जा भोजन से प्राप्त होती है। भोजन को जुटाने के लिए अर्थ की और काम की आवश्यकता होती है। यह आवश्यकता प्रत्येक शरीर की मूलभूत आवश्यकता है। श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन से कहा, ''हे पार्थ! इस मूलभूत आवश्यकता के लिए तुझे कर्म तो करने ही होंगे।'' कर्म, अर्थ और धर्म का शरीर से वास्ता है, आत्मा से नहीं। इस तरह अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष जीवन की चारपाई के चार पाए हैं जिनपर जीवन टिका है। भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में पहले छः अध्यायों में भी अर्जुन (मनुष्य ) को यही याद दिलाने की कोशिश की है, “पहले तू मनुष्य बन, आत्मा है तू, इसका तुझे ज्ञान हो।'' फिर नवें अध्याय में जाकर उन्हें पूजने की बात की है। साथ ही श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यह भी कहा, “समतल रह! न ही दुःख में दुःखी हो न ही सुख में सुखी हो। जा और अपनी साधना कर। तू तठस्थ रहेगा तो हृदय विचलित नहीं होगा, इन्द्रियाँ तेरे वश में रहेंगी और तुम अपना कर्म सद्गति से, बिना भेदभाव के, बिना फल की लालसा के कर सकोगे। कर्म पर तेरा अधिकार है, फल तेरे नियंत्रण में नहीं, तेरे अधिकारों से बाहर है।''

सनातन परम्परा में काम, क्रोध, लोभमोह, राग और द्वेष- इन भावों को जीवन सेहृदय से, कर्मों से दूर रखने को कहा गया हैसाथ ही इन्द्रियों पर पूरा नियंत्रण रखने को कहा गया है। इन सभी का व्यावहारिक जीवन में पालन कैसे करना है और इन अमूल्य मूल्यों की मानव जीवन में कितनी अहमियत हैं, इन्हें दर्शाने के लिए कई-कई नैतिक, मौलिक, धार्मिक कथाएँ हैं।

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