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भारत-विभाजन की त्रासदी
August 1, 2017 • Vijay Kumar Malhotra

पन्द्रह अगस्त, 1947 का ऐतिहासिक दिन, जहाँ भारत 1000 वर्ष की गुलामी से स्वतंत्र हुआ था, वहीं यह दिन भारत राष्ट्र का एक और दुर्भाग्यपूर्ण दिन था। भारत का एक और विभाजन हो गया। भारत का 30 प्रतिशत भाग भारत से कटकर पाकिस्तान नाम से एक अलग देश बन गया। ‘‘पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा' की घोषणा करनेवाले महात्मा गाँधी असहाय से देखते रहे और शीघ्रता से सत्ता-सुख भोगने की लालसा में काँग्रेस के नेताओं ने देश का विभाजन स्वीकार कर लिया।

पन्द्रह अगस्त, 1947 को भारत की राजधानी दिल्ली दुल्हन की तरह सजी थी। सोलह श्रृंगार कर नृत्य हो रहे थे। 1000 वर्ष की पराधीनता से स्वतंत्र होने पर दिल्ली में जश्न मनाया जाना स्वाभाविक था। 15 अगस्त को लाल किले पर तिरंगा फहराकर नेहरू जी ने प्रथम स्वाधीनता दिवस की घोषणा की। 14 अगस्त की रात 12 बजे संसद के सेन्ट्रल हाल में श्री नेहरू के प्रसिद्ध Tryst with Destiny भाषण के साथ अंग्रेज साम्राज्य का यूनियन जैक उतारकर भारत का राष्ट्रध्वज तिरंगा लहरा दिया गया।

परन्तु उसी 15 अगस्त, 1947 को लाहौर में और पूरे पश्चिम पंजाब व सीमा प्रान्त में हिंदू-सिख इलाके और उनके घर धू-धूकर जल रहे थे। हजारों-लाखों के काफिले छोटा-मोटा समान लेकर छोटे बच्चों को उठाए, महिलाओं को बीच में रखकर बड़े-बूढ़ों को सम्हालते हुए भारत की ओर आ रहे थे। स्थान-स्थान पर लूटपाट, अपहरण व हत्याएँ हो रही थीं। रेलगाड़ियाँ चल तो रही थीं, परन्तु भीड़ इतनी अधिक थी कि लोग रेलगाड़ियों की छतों पर बाल- बच्चों समेत बैठने पर मजबूर थे। छतों पर बैठे कितने ही पटरियों के पास बैठे पाकिस्तानी दरिंदों की गोलियों का शिकार होते थे।

पन्द्रह अगस्त को मैं लाहौर में था और मैंने रोंगटे खड़े कर देने वाले वे भीषण भयावने काण्ड स्वयं अपनी आँखों से देखे थे जो लगभग 70 वर्ष बीत जाने पर आज भी मेरे दिलो-दिमाग को दहला देते हैं।

पंजाब के संघ-स्वयंसेवकों के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ओ.टी.सी. (शिक्षक शिक्षण वर्ग) फगवाड़ा में लगा था। यह शिविर 20 अगस्त को समाप्त होना था। परन्तु पश्चिमी पंजाब व सीमा प्रान्त में भीषण मार-काट, हत्या, लूट, अपहरण मुस्लिम लीगियों द्वारा संचालित मुस्लिमों द्वारा गाँवों, कस्बों और शहरों की हिंदू आबादी क्षेत्रों पर सामूहिक हमलों की घटनाओं और हिंदू- सिखों के पलायन के दिल दहलानेवाले समाचार आ रहे थे और हिंदुओं की एकमात्र रक्षक आशा संघ के लगभग 1,900 प्रमुख स्वयंसेवक और अधिकारी फगवाड़ा में एकत्रित थे। संघ-अधिकारियों ने निर्णय किया कि शिविर को 20 अगस्त की बजाए 10 अगस्त को समाप्त कर दिया जाए। हमलोग 10 अगस्त को ही पहली गाड़ी से लाहौर के लिए चल दिए। उस गाड़ी में या तो संघ के स्वयंसेवक वापिस पंजाब के अपने घरों को लौट रहे थे या फिर अमृतसर व पूर्वी पंजाब से भागकर जा रहे मुसलमान थे। अटारी स्टेशन पार करते ही वातावरण बदला सा था। जल्लो, हरबंसपुरा, मुगलपुरा स्टेशनों पर जिन्ना का फोटो लिए मुस्लिम हजूम एकत्र था। वे रेल के हर डिब्बे में ‘कायदे आजम' के चित्र बाँट रहे थे। मेरे साथ के स्वयंसेवक ने वह चित्र घृणा से फाड़कर पाँव से कुचल दिया। डिब्बे में हम चार-पाँच स्वयंसेवकों को छोड़कर सब अमृतसर से पाकिस्तान जा रहे मुसलमान थे। गाड़ी में झगड़ा करना उचित न समझकर मैंने उसे रोका। उस समय जिन्ना प्रतीक थे मुस्लिम साम्प्रदायिकता के, भारत-विभाजन के, हिंदुओं के नरसंहार के। लाहौर पहुँचते ही स्टेशन पर संघ द्वारा संचालित पंजाब सहायता समिति का शिविर था। हमारे परिचित कुछ कार्यकर्ता वहाँ थे। उन्होंने बताया कि एक अन्य प्लेटफार्म पर वह गाड़ी खड़ी थी जो रावलपिंडी से आई थी, जिसे बीच-बीच में रोककर लूटा गया था और अनेक लोगों की हत्या की गई थी। हम स्टेशन से बाहर निकले और अपने-अपने घरों को चले गये।

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