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भारत में विनिमय-प्रणाली और मुद्रा का विकास
December 1, 2016 • Dr. Manisha Sharna

मनुष्य एक चेतनशील प्राणी है। यह सदैव उन वस्तुओं की खोज में व्यस्त रहा है जो उसके जीवन को सुखमय बना सकती है। मुद्रा के आविष्कार और विकास का इतिहास प्रारंभिक मनुष्य की उन मानसिक शक्तियों की देन है जिनकी सहायता से वह उन वस्तुओं का भी उपभोग करने में। सफल हुआ था जो उसने स्वयं उत्पन्न नहीं की थीं। मुद्रा का आविष्कार मानव जाति के सम्पूर्ण आर्थिक इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना है। वास्तव में मुद्रा के विकास का इतिहास ‘मानव सभ्यता के इतिहास का संग्रह है। मुद्रा का प्रारंभ बहुत प्राचीन समय में ही हो चुका था। मुद्रा का अर्थ केवल धातु के सिक्के ही नहीं रहा है। मुद्रा के रूप में कौड़ियों का इस्तेमाल प्राचीन काल से लेकर पिछली शती के अन्त तक होता रहा है- न केवल भारत में बल्कि अफ्रीका और एशिया के अन्य कुछ देशों में भी। इस संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रसिद्ध विद्वान् जॉन मेनार्ड कीन्स (1883- 1946) ने अपनी पुस्तक 'ए ट्रीटीज ऑन मनी' (1930) में लिखा है कि ‘मुद्रा मानव सभ्यता के अन्य सभी आवश्यक तत्त्वों के समान बहुत अधिक पुरानी है। मुद्रा का आरम्भ अतीत में निहित है। वास्तव में मुद्रा के आरंभ का अध्ययन करते-करते मानव इतिहास भी समाप्त हो जाता है, परंतु इसका स्रोत प्राप्त नहीं होता है।' कोई भी मनुष्य कभी भी उन सब वस्तुओं को, जिनकी उसे उपभोग करने की इच्छा हुई है, बनाने में सफल नहीं हुआ है। पुरातन मनुष्य के जीवन सरल तथा आवश्यकताएँ सीमित थीं। मानव सभ्यता के विकास के प्रारंभ में उत्पादन-व्यवस्था स्वावलम्बन पर आधारित थी। अतः आरंभ में मनुष्य अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं या अपने परिवार के सदस्यों की सहायता से करता था, लेकिन जैसे-जैसे मानव ने अपने सभ्यता और संस्कृति का विकास किया, वैसे-वैसे उसकी आवश्यकताएँ बढ़ती गईं जिससे मानवमात्र के लिए स्वयं अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करना सम्भव नहीं रह गया था। अतएव मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वे सभी वस्तुएँ जिनका वह स्वयं उत्पादन नहीं करता था, या तो दूसरों से बलपूर्वक प्राप्त करता था या चोरी करके। लेकिन कालान्तर में उसे यह अनुभव हो गया कि जिन वस्तुओं का उत्पादन वह स्वयं नहीं कर सकता था, उनको प्राप्त करने के लिए उपर्युक्त उपाय (बलपूर्वक और चोरी) अवाञ्छनीय एवं अनिश्चित थे। इन उपायों के प्रयोग द्वारा अपनी आवश्यकता की पूर्ति करना सामाजिक व्यवस्था तथा सभ्य जीवननिर्वाह के लिए अच्छा नहीं था। अतः उसने ऐसी वस्तुएँ, जिनका उत्पादन स्वयं नहीं कर सकता था तथा जो उसके लिए अत्यन्त आवश्यक थीं, प्राप्त करने के लिए कुछ अन्य उपायों को खोजना प्रारंभ किया। खोज के इस क्रम में सभ्यता के शैशवावस्था में कार्य का विभाजन हुआ। यद्यपि प्रागैतिहासिक युग में मनुष्य जंगली जीवन बिताता था, तथापि आगे चलकर आग एवं कृषि के आविष्कार तथा पशुपालन एवं मछली मारने की भावना में प्रगति के फलस्वरूप आदिम जातियाँ एक स्थान पर बस गई थीं। मानव जो स्वतंत्र था, क्रमशः एक स्थाई परिवार एक स्थाई समाज का रूप धारण कर चुका था। समाज में रहकर मानव श्रम-विभाजन के माध्यम से विभिन्न वस्तुओं का निर्माण करने लगा था। कृषि, पशुपालन एवं मछली करने लगा था। कृषि, पशुपालन एवं मछली मारने के अतिरिक्त बढ़ईगिरि, लोहारगिरि, कुम्भकला इत्यादि का विकास हुआ। उसे व्यापारिक लाभों का भी ज्ञान प्राप्त हुआ।

आरंभ में संयोगवश तथा जान-बूझकर मनुष्य ने उन वस्तुओं को, जिनके उत्पादन में उसे अधिक दक्षता प्राप्त थी, अपनी आवश्यकता से अधिक मात्रा में उत्पन्न करना आरंभ कर दिया। ऐसी स्थिति में मनुष्य, जिनके पास किसी एक वस्तु (उदाहरणार्थ चावल) की आवश्यकता थी, एक ऐसे अन्य व्यक्ति की खोज करता था जिसे मछली की आवश्यकता थी तथा जिसके पास चावल, उसकी अपनी आवश्यकता की तुलना में अधिक मात्रा में था तथा वह इसको मछली द्वारा बदलने को तैयार था। किसी एक वस्तु का किसी अन्य वस्तु द्वारा इस प्रकार सीधा विनिमय करने की क्रिया ‘वस्तु-विनिमय' कहलाती है। प्राचीन काल में मनुष्य अपनी आवश्यकतानुसार वस्तुओं की प्रत्यक्ष रूप से परस्पर अदला-बदली कर लेते थे। मुद्रा का आविष्कार होने से पूर्व मानव के प्रायः सारे काम वस्तु-विनिमय यानी वस्तुओं की अदला-बदली से सम्पन्न होते थे। अदला- बदली के लिए पत्थर के औजार, हथियार, मांस, अन्न, पशु-चमड़ा आदि वस्तुओं का उपयोग होता था। इस प्रकार समाज में अदल-बदल का प्रचलन प्रारंभ हुआ, जो पहले अज्ञात थी। इस रीति से दोनों वर्गों को लाभ था। मुद्राशास्त्रवेत्ता इसे ही सिक्कों की उत्पत्ति का प्रथम चरण मानते हैं। वास्तव में प्राचीन समाज की आर्थिक दशा समझने में अदल-बदल का कार्य पर्याप्त सहायता करता है। यद्यपि इस पद्धति को अच्छा नहीं कहा जा सकता, तथापि आज भी भारतीय समाज में यह किसी-न-किसी रूप में मौजूद है। ग्रामीण जन अपनी अधिक आवश्यकता दैनिक वस्तुओं की अदल-बदल से पूरी करते हैं। किसान की स्त्रियाँ तो गृहस्थी का सामान इस रीति से प्राप्त करती ही हैं, शहरों में भी स्त्रियाँ पुराने वस्त्र से बर्तन आदि खरीदती हैं। गृहस्थ, वस्त्रों की खरीद में उसी मूल्य का अन्न देते हैं। निर्धन व्यक्ति तो कर्ज की वापसी में गाय, बैल आदि जानवरों के द्वारा ऋणमुक्त हो जाता है। भारत क्या, अनेक सभ्य देशों में आज भी अदल-बदल का तरीका काम में लाया जाता है। यद्यपि इस रीति से मानव के कार्य अपर्याप्त रूप से समाप्त होते रहे, तथापि समाज में अन्य रीति को ढूँढ़ा गया। उसका कारण यह था कि व्यावहारिक कठिनाइयाँ सामने आने लगीं। यह प्रश्न हमारे सामने आया कि बेचने तथा खरीदनेवाले की वस्तुओं का पारस्परिक मूल्य किस प्रकार निश्चित किया जाय।

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