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भारत के विधि-प्रकाशनों पर बढ़ता विदेशी शिकंजा
May 1, 2018 • Dr. Santosh Kumar Tivari

कानून की पुस्तकों के प्रकाशन में विदेशी मल्टीनेशनल कंपनियाँ भारत में तेजी के साथ आगे बढ़ रही हैं और भारतीय कंपनियाँ पीछे खिसकती जा रही हैं। यह लेख मेरे अपने निजी अनुभव पर आधारित है। साथ ही इस लेख के लिए मैंने कानून की पुस्तकों के जाने-माने लेखक श्रीनिवास गुप्ता से एक लंबी बातचीत की। गुप्ताजी वर्ष 1978 से विधि-प्रकाशनों के लिए लिखते रहे हैं। वर्ष 2018 में उनकी दो अंगेजी-पुस्तकें- ‘क्रिमिनल लॉ' और 'भारतीय संविधान टॉमसन रायटर्स ने प्रकाशित की हैं। इन पुस्तकों की कुल पृष्ठ संख्या साढ़े तीन हजार से ज्यादा है।

एक जमाने में मुम्बई के एन.एम. त्रिपाठी प्रा.लि. भारत के सबसे बड़े विधि-प्रकाशक थे। वह इतने बड़े विधि-प्रकाशक थे कि वर्ष 1975 में जब मैं एलएल. एम. कर रहा था, तब एक बार उत्तरप्रदेश सचिवालय के विधि परामर्शी पुस्तकालय से एक साहब अपनी तीन दशक से ज्यादा की नौकरी के बाद रिटायर हो रहे थे। तब उन्होंने मुझको बताया था कि एन.एम. त्रिपाठी का कोई सेल्समैन कभी उनकी लाइब्ररी में पुस्तकें बेचने नहीं आया। बस उनका कैटलॉग आ जाता था और उसी को देखकर उनको पर्चेज ऑर्डर भेज दिया जाता था। बाद में एन.एम. त्रिपाठी प्रा.लि. को एक विदेशी प्रकाशक बटरवर्थ ने खरीद लिया। आज एन.एम. त्रिपाठी का नाम भी लोग भूल चुके हैं।

कुछ वर्षों के बाद नागपुर के ‘वाधवा एण्ड वाधवा नागपुर' भारत के सबसे बड़े विधि-प्रकाशक बनकर उभरे। बाद में ये लोग अपना व्यापार नागपुर से दिल्ली ले आए, परंतु इनका नाम ‘वाधवा एण्ड वाधवा नागपुर' ही बना रहा। इन्होंने देश की तमाम विधि- पुस्तकों के सर्वाधिकार (कॉपीराइट) को खरीद लिया था, जिनमें डॉ. दुर्गादास बसु की संविधान पर लिखी गई प्रसिद्ध पुस्तक भी शामिल थी। इन्होंने दक्षिण भारत के एक प्रमुख विधि-प्रकाशक ‘मद्रास लॉ जर्नल' को भी खरीद लिया था, जो जर्नल के साथ साथ पुस्तकें भी प्रकाशित करता था। इस प्रकार वाधवा एण्ड वाधवा नागपुर देश के सबसे बड़े विधि-प्रकाशक बन बैठे थे।

परन्तु हाल के वर्षों में वाधवा एण्ड वाधवा नागपुर को एक विदेशी मल्टीनेशनल लेक्सिस नेक्सिस' ने खरीद लिया। लेक्सिस नेक्सिस ने नयी दिल्ली के एक बड़े प्रकाशक यूनिवर्सल लॉ पब्लिशिंग कम्पनी को भी खरीद लिया। आज देश के जो दो सबसे बड़े विधि- पब्लिशर्स हैं, उनके नाम हैं : लेक्सिस नेक्सिस और टामसन रायटर्स। ये दोनों विदेशी मल्टीनेशनल कम्पनियाँ हैं। इस क्षेत्र में जो बड़े भारतीय प्रकाशक बचे हैं, उनमें लखनऊ की 'ईस्टर्न बुक कं, और हैदराबाद का ‘एशिया लॉ हाउस' भी शामिल है। हम भारतीयों की शुभकामनायें इनके साथ हैं। परन्तु ये कब तक विदेशी हाथों में जाने से बच पाएँगे, यह तो आनेवाला समय ही बताएगा।

इस बीच संचार की नयी तकनीकों ने भी जन्म लिया। नयी तकनीकों ने नया बाजार भी खोला है। आजकल लेक्सिस नेक्सिस अपनी तमाम पुस्तकों का डिजिटाईजेशन करा रहा है, ताकि इनको ई-बुक के तौर पर दुनिया में कहीं भी तुरंत और आसानी से बेचा जा सके।

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