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भारत के प्राचीनतम खेल वैदिक साक्ष्य
January 1, 2018 • Mahamahopadhyay Devrshi Kalanath Shastri

बालकों की भावनाएँ, बालकों की चिन्ताएँ, बालकों के खेल, बालकों के चाव- इन सबका साहित्य भारत में सहस्राब्दियों पुराना है। प्रत्येक प्राचीन संस्कृति ने अपनी नयी पौध को पनपाने पर पूरा ध्यान केन्द्रित किया है। भारत में भी यह हुआ है। यह बात अलग है कि उसके पूरे अभिलेख हमें उपलब्ध न हों। जो अभिलेख प्राचीनतम वाङ्मय के उपलब्ध हैं, उनमें अध्यात्म, धर्म, विज्ञान आदि तथाकथित उच्चतर तत्त्वों की खोज में लगे शोधार्थियों के गम्भीर अभियानों की व्यस्तता में हमें प्राचीनतम साहित्य में बालपाठ्य सामग्री और बालक पर केन्द्रित चिन्तन देखने की फुर्सत न मिले, वह बात भी अलग है, किन्तु हमारे प्राचीनतम वाङ्मय में जो बाल-केन्द्रित साहित्य है, उसका अभिगम अत्यन्त व्यावहारिक है, वह आज भी मूल्यवान् है, यह निर्विवाद है। उसकी जानकारी आज तक सामने नहीं लाई गई, यह एक आश्चर्यजनक तथ्य अवश्य है।

मानव के पुस्तकालय की प्राचीनतम पुस्तक ऋग्वेद से ही, जिसे विश्वभर में सर्वप्रथम उपलब्ध ग्रन्थ माना गया है, बालक्रीड़ाओं के अत्यन्त रोचक किन्तु गूढार्थपरक वर्णन मिलते हैं। उन्हें हम तक पहुँचाया ही नहीं गया, यह अत्यन्त खेदजनक है। पुरानी बालकथाओं की बात करनेवाले पण्डितगण अधिक-से-अधिक पुरानी कहानी बताएँगे तो नचिकेता की (जो कठोपनिषद् में आती है) जिसमें वाजश्रवा का पुत्र नचिकेता बालसुलभ जिज्ञासा से जन्म-मृत्यु का रहस्य जानने की ललक में यमराज तक पहुँच जाता है। और आत्मविद्या का ज्ञान लेकर ही लौटता है। वैसे यह कथा भी प्राचीनतम शिक्षण के अभिगम को संकेतित करती है, मानव की आदिम जिज्ञासा के साथ बालक की कुतूहल-वृत्ति और शिक्षा-दर्शन का प्रमाण भी देती है। यह भी बतलाया जाता रहा है। कि रूपक कथाओं (जिन्हें फेबल्स या अलेगरी भी कहा जाता है) का उत्स भारत में बहुत पुराना है, पशु-पक्षियों की रूपक कथाएँ, जो पंचतंत्र में आज भी मिलती हैं, विश्व की प्राचीनतम कथाएँ हैं, क्योंकि उनमें सियारों के जो नाम करटक और दमनक आते हैं, वे हजारों वर्ष पहले अरबी की कहानियों में कलिला और दमना बन गए थे, वहीं से विश्व में फैले थे। ईसप की नीति-कथाएँ उनसे बाद की हैं। आदि। इस पर डॉ. पी.एन. कवठेकर ने भी शोध-ग्रन्थ लिखा है।

इनसे भी पहले वेद में बाल-साहित्य के जो उत्स मिलते हैं, वे कहीं अधिक मर्मस्पर्शी और तात्त्विक हैं। वैदिक बालसाहित्य दो प्रकार का है- बालकों को शिक्षा देने के लिए बना साहित्य और बालकों का रूपक लेकर ज्ञान-विज्ञान के रहस्य बतानेवाला साहित्य। अन्य प्रकार के साहित्य भी रहे होंगे। किन्तु बीती सहस्राब्दियों में कितना कुछ विलुप्त हो गया या अब अप्राप्य है, कौन कह सकता है।

कबड्डी या आँखमिचौली

एक नमूने से उस समय के अभिगम को समझा जा सकता है और अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय कैसे खेल रहे होंगे, कैसे खेल के मैदान और कैसी शिक्षण प्रणाली। ऋग्वेद का ऋषि आकाशीय ज्योतियों का प्रेक्षक था, कालगणना के रहस्यों का जिज्ञासु और प्रवक्ता भी। ऐसी एक आकाशीय प्रघटना को उसने बच्चों की कबड्डी के पाले के रूपक में जिस तरह पिरोया है, उसमें तत्कालीन बाल-जीवन का मनोरम प्रतिबिम्ब मिलता है। सब जानते हैं कि चन्द्रमा में सूर्य के प्रकाश से चाँदनी दिखती है। जब पूर्णिमा को सूर्य और चन्द्र आमने- सामने होते हैं, तब सूर्य का पूरा प्रकाश पड़ने से पूरा चाँद दिखलाई देता है। फिर खगोलीय संक्रमण के कारण जब सूर्य और चन्द्र एक बिन्दु पर आ जाते हैं, तब अमावस्या हो जाती है, चन्द्रमा नहीं दिखता। फिर दूज का चाँद उगता है जो सूर्य से दूर जाते-जाते फिर पूर्णिमा को पूर्ण चन्द्र हो जाता है, पूर्णिमा के बाद फिर जब सूर्य की और आता रहता है, तो फिर अदृश्य हो जाता है। इस खगोलीय तथ्य को ऋग्वेद के दशम मंडल में इस मनोरंजक रूपक में बाँधा गया है

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