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भारत-एकीकरण की विश्वस्तरीय चुनौती और सरदार पटेल
November 1, 2018 • E. Hemant kumar

स्वतंत्रता के समय भारत एकीकरण अनेक मायनों में वैश्विक स्तर की अभूतपूर्व घटना कही जाएगी। अंग्रेज़ आज़ादी के समय भारत को ऐसे चौराहे पर छोड़कर गए थे, जहाँ हर कोई स्वतंत्र था। कोई भी राज्य/रियासत भारत या पाकिस्तान में विलय होने के लिए या नया स्वतंत्र राष्ट्र बनाने के लिए मुक्त थी। हर व्यक्ति इन में से किसी भी राष्ट्र में जाकर बसने के लिए स्वतंत्र था।

अंग्रेजों के जाते ही लोग क्षेत्र, धर्म, जाति, भाषा आदि के नाम पर आज़ाद घूमने लगे थे, समग्र राष्ट्रीय चेतना का ठीक से विकास नहीं हो पाया था, अनेक धार्मिक समूह अपनी- अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए मर- मिटने को तैयार थे। भारतीय हजारों साल से अलग-अलग स्वतंत्र राज्यों/देशों में रहने के आदी थे। छोटे-छोटे राज्य/देश क्षेत्रीय स्वतंत्रता के लिए लड़कर मरते-मिटते रहते थे। राजसत्ता में मोहग्रस्त हो शासक-कुलीन वर्ग, देशहित के लिए अनिवार्य, एकता के मार्ग से भटक गया था। इनकी सामान्य सोच यह हो गई थी कि या तो मेरा खुद का राज्य-शासन हो या मैं किसी के राज्य में उच्च पद पर रहूँ। दूसरे शब्दों में राजा-नवाब-मंत्री-पुरोहित होना व्यवसाय बन गया था। अब यदि पूरा देश एक है, तो एक व्यक्ति ही राजा बन पाएगा तथा कुछ लोग ही मंत्री, ऐसे में अन्य महत्त्वाकांक्षी लोगों की इच्छा तभी पूरी हो सकती है, जब उसके अनेक टुकड़े किये जायें। शायद यही वजह थी कि इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़कर हज़ारों साल के विदेशी आक्रमणों के बावजूद भी भारत के छोटे-छोटे राज्य एक नहीं हो पा रहे थे। इन्हीं बातों के आधार पर अंग्रेजों ने अनुमान लगाया था कि भारत के ये छोटे-छोटे सैकड़ों राज्य कभी भी मिलकर एक नहीं हो सकते।

भारतभूमि तथा इसके आसपास के भूभागों पर अनेक विदेशी आक्रमण हुए, जिसके कारण यहाँ सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक ढाँचे में भारी बदलाव आया। भारत के आस-पास कुछ ऐसे देश भी हैं, जिनके ये ढाँचे एकदम बदल गए। भारत में सत्ता भले ही बदली हो, परन्तु यहाँ के लोगों ने पराधीनता तथा आक्रमणकारियों के धर्म को कभी पूर्णतया स्वीकार नहीं किया। शायद यह स्वतंत्रप्रियता तथा गिरकर पुनः उठने की अदम्य जिजीविषा ही थी, जिसके कारण यहाँ के लोग लगातार आक्रमण सहते रहे तथा उनसे निरन्तर पीड़ित होने के बाद भी उबरते रहे। इसी अदम्य जिजीविषा का मुकाबला सरदार पटेल को तब करना पड़ा, जब सभी स्वतंत्र रियासतों एवं धार्मिक समूहों को एक संविधान-एक झण्डे के नीचे लाने का दायित्व उन्हें सौंपा गया। यह कितना दुरूह रहा होगा कि जो क्षेत्र हजारों वर्ष के सतत विदेशी आक्रमणों से भी अपनी निजी स्वतंत्रता की मानसिकता को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए, वे नये-नये बन रहे भारत संघ में इतनी जल्दी और बिना रक्तपात कैसे आ गए। सरदार पटेल को 'लौहपुरुष' यूँ ही नहीं कहा जाता, उन्होंने अंग्रेजों के उपर्युक्त विश्लेषण को ध्वस्त करने के साथ-साथ भारत की राष्ट्रीय एकता पर लम्बे समय से लगे प्रश्न-चिह्न को दूर करते हुए, भारत- एकीकरण का असम्भव-सा काम कर दिखाया। सैकड़ों रियासतों को एक संघ में विलीन करने के लिए ऐसे बहुआयामी कूटनीतिज्ञ की आवश्यकता थी, जो रियासतों के शासकों तथा वहाँ की जनता की नब्ज पढ़ने में पारंगत हो। सरदार पटेल ने इसके लिये पुख्ता योजना बनाई थी कि सबसे पहले मित्रतापूर्वक और सम्मान देकर विलय के लिये मनाया जाय, यदि इससे काम न बने तो राजनीतिक वार्तालाप से, फिर राजनीतिक कूटनीति से और यदि इस पर भी कोई न माने, तब ही सैन्य शक्ति से काम लिया जाएगा। उनकी यह नीति पूर्णतया सफल रही और बिना सैन्य शक्ति प्रयोग किए ही करीब 555 स्वतंत्र रियासतों का भारत में विलय करा दिया। इस महान् सफलता के पीछे मूलतः उनके विलक्षण ‘राजनीतिक- कूटनीतिक-वैदेशिक, वार्तालाप-कौशल की भूमिका थी, जिससे भारत का आमजन अभी तक अनिभिज्ञ ही है।

भारत को वर्तमान स्वरूप प्रदान करनेवाले सरदार पटेल ही हैं। भारत-विलय की ज़िम्मेदारी यदि सरदार पटेल की बजाए किसी और समकालीन व्यक्ति के पास होती तो भारत का यह स्वरूप इतनी सरलता, बिना रक्तपात और बिना जन-धन हानि के नहीं बन पाता। तत्कालीन राजनेता, सरदार पटेल की क्षमताओं से भली-भाँति परिचित थे, चित थे, इसीलिए महात्मा गाँधी ने भी एक बार उनसे कहा था कि ‘रियासतों की समस्या इतनी जटिल है कि इसे केवल तुम ही हल कर सकते हो।' सरदार पटेल प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे। परंतु देशहित में उन्होंने इसके लिए कभी विवाद नहीं किया। देश की अनेक समस्याओं के साथ-साथ सरदार पटेल को क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद का भी सामना करना पड़ा, परन्तु इनका एक भी छींटा सरदार पटेल पर नहीं है, इसलिए आधुनिक भारत के निर्माण में सरदार पटेल की भूमिका चाणक्य से भी बढ़कर है। वह एक सच्चे तथा दूरदर्शी स्वतंत्रता सेनानी थे। बड़ी-बड़ी ज़िम्मेदारी निर्वहन करने के बावजूद भी वह अजातशत्रु ही रहे। रसातल की तरफ तेजी से बढ़ रही, भारत की दलगत राजनीति के परिप्रेक्ष्य में भी, सरदार पटेल, सर्वस्वीकार्य तथा निर्विवादित व्यक्तित्व हैं। वे देश के सार्वकालिक महान् एवं आदर्श पुत्र माने जाते रहेंगे।

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