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भारतीय संस्कृति में पर्यावरण-संरक्षण
September 1, 2018 • Dr. Arjun Prasad Tiwari

पर्यावरण के बदलते हालात वर्तमान में पूरी दुनिया के लिए एक चिन्ता का विषय है, लेकिन भारत में तो पर्यावरण-संरक्षण सदा से संस्कृति व परम्पराओं का हिस्सा रहा है। भारतीय संस्कृति में पेड़-पौधों ही नहीं, अपितु पशु-पक्षियों के संरक्षण की संकल्पना प्राचीन काल से ही विद्यमान है, जो पूर्णतः वैज्ञानिक तथा संतुलित है। हमारी संस्कृति में पेड़-पौधों, पुष्पों, पहाड़, झरने, पशु-पक्षियों, हिंस्र जीवों, नदियाँ, तालाब, वन, मिट्टी, घाटियों, यहाँ तक की पत्थर की भी पूजा-अर्चना की जाती है, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण आज भी प्रतिदिन के क्रियाकलापों एवं पूजा-अर्चना में देखने को मिलता है। अनेक वृक्षों- पीपल, तुलसी, आँवला, अशोक, बेल, शमी, नीम, आम आदि तथा अनेक पुष्पों एवं गो, बैल, चूहा, साँप, बंदर, उलू, आदि को उनकी पूजा-अर्चना के माध्यम से संरक्षण प्रदान करने का प्राचीन हिंदू-ग्रंथों में विशेष उल्लेख है। यही नहीं, जल-स्रोतों के प्रति भी संरक्षण की भावना प्राचीन काल से ही चली आ रही है, जैसे- गंगापूजन, कुआँ-पूजा अथवा तालाब-पूजना। इस प्रकार स्पष्ट है कि सम्पूर्ण पारिस्थितिकी को सन्तुलित रखने हेतु भारतीय संस्कृति सदैव अग्रणी रही है। हमारी भारतीय संस्कृति में रची-बसी प्रकृति-संरक्षण अथवा पर्यावरण-संरक्षण की यह भावना पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आयी है एवम् आज भी देखने को मिलती है।

कहने की आश्यकता नहीं कि भारतीय मानस वृक्षों में देवताओं का वास मानता है। इतना ही नहीं, वह वृक्षों को देवशक्तियों के प्रतीक और स्वरूप के रूप में भी देखता-समझता है। उदाहरण के लिए पीपल के वृक्ष में त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु व शिव का वास होता है। इसी प्रकार आँवले के पेड़ में लक्ष्मीनारायण के विराजमान होने की बात कही गई है। सरस्वती को पीले फूल प्रिय हैं। धन-सम्पदा की देवी लक्ष्मी को कमल और गुलाब के फूल से प्रसन्न किया जा सकता । गणेश दूर्वा से प्रसन्न हो जाते हैं। बिल्व वृक्ष को भगवान् शंकर से तो ढाक, पलाश, दूर्बा एवं कुश-जैसी वनस्पतियों को नवग्रह पूजा आदि धार्मिक कृत्यों से जोड़ा गया। पूजा के कलश में सप्तनदियों का जल एवं सप्तमृत्तिका का पूजन करना- व्यक्ति में नदी व भूमि को पवित्र बनाए रखने की भावना का संचार करता था। हिंदू-धर्म के प्रत्येक देवी-देवता भी पशु-पक्षी और पेड़-पौधों से लेकर प्रकृति के विभिन्न अवयवों के संरक्षण का संदेश देते हैं। हिंदू-संस्कृति में प्रत्येक जीव के कल्याण का भाव है। हिंदू-धर्म के जितने भी त्योहार हैं, वे सब प्रकृति के अनुरूप हैं। मकर संक्रान्ति, वसन्त पञ्चमी, महाशिवरात्रि, होली, नवरात्र, गुड़ी पड़वा, वटसावित्री, ओणम, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, छठ पूजा, शरद पूर्णिमा, अन्नकूट, देवप्रबोधिनी एकादशी, हरियाली तीज, गंगा दशहरा, आदि सब पर्वो प्रकृति-संरक्षण का पुण्य स्मरण है। प्रकृति संरक्षण से सम्बन्धित कुछ भारतीय पर्व निम्नानुसार हैं :

छठ पूजा

भारत में छठ पूजा एक महत्त्वपूर्ण त्योहार है जो कई फल-प्रजातियों की रक्षा करने में मदद करता है। महिलाओं द्वारा सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तरप्रदेश और नेपाल के तराई-क्षेत्रों में मनाया जाता है। छठ पूजा चार-दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरूआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते और सूखी टहनियों का उपयोग करके चावल और गुड़ (गन्ना चीनी) के साथ एक विशेष पकवान तैयार करते हैं। चौथे दिन एक नदी या जल निकाय के पास एक पूजा (प्रार्थना अनुष्ठान) किया जाता है। पूजा में विभिन्न प्रकार के फल, फूल, मसालों और सब्जियों से बने प्रसाद शामिल हैं। महिलाएँ इन प्रसादों को ध्यान से व्यवस्थित करती हैं और पारम्परिक गीतों को पर्यावरण और पर्यावरण-संरक्षण के महत्त्व को दोहराने के लिए गाती हैं।

वटसावित्री अमावस्या

वटसावित्री व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। इस व्रत के पीछे सावित्री और सत्यवान की कथा है। इस दिन वटवृक्ष की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि बरगद के पेड़ की लम्बी आयु के कारण ही महिलाएँ इस पेड़ की पूजा करती हैं। इस पेड़ में काफी शाखाएँ लटकी हुई होती हैं, जिन्हें सावित्री देवी का रूप माना जाता है। यह भी माना जाता है कि बरगद के पेड़ में त्रिदेवों का वास होता है। यद्यपि पूजा अपने पति की दीर्घायु के लिए विवाहित महिलाओं द्वारा की जाती है, लेकिन यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि पूजा के पास अत्यधिक मूल्यवान् बरगद के पेड़ों को बचाने की आवश्यकता का सीधा सम्बन्ध है। बरगद के पेड़ को एक पवित्र पेड़ माना जाता है और इसका प्राचीन हिंदू-ग्रंथों में विशेष उल्लेख दिया जाता है। यह स्पष्ट है कि वट-पूजा का धार्मिक महत्त्व जीवन के समृद्ध गुणों और बरगद के पेड़ की भव्यता से निकलता है।

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