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भारतीय संस्कृति की पहचान : कुम्भ पर्व
January 1, 2019 • Brijkishor Sharma

कुम्भ पर्व भारतीय संस्कृति की एक विशिष्ठ पहचान है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कुम्भ बारह होते है, जिसमें आठ कुम्भ स्वर्ग में तथा चार कुम्भ पृथ्वी पर होते हैं। कुम्भ पर्व का धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्त्व रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार अमृत की प्राप्ति के लिए देवताओं और दानवों के मध्य क्षीर सागर के मन्थन को लेकर समझौता हुआ। अमृत प्राप्ति के पश्चात देवता और दानवों में हुए संघर्ष के फलस्वरूप अमृत की बूंदें पृथ्वी पर चार स्थलों प्रयाग, नासिक, हरिद्वार तथा उज्जैन में गिरी, इसी मान्यता के विधान के कारण इन चारों स्थानों पर कुम्भ पर्व (मेले) का आयोजन किया जाता है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि देवता-दानवों के मध्य अमृत के लिए 12 दिन तक संघर्ष चला इसी कारण हर 12 वर्ष के पश्चात इन स्थानों पर कुम्भपर्व आयोजित किया जाता है। कुम्भ तीन प्रकार का होता है। अर्द्धकुम्भ, पूर्णकुम्भ एवं महाकुम्भ। अर्द्धकुम्भ प्रत्येक 6 वर्ष में, पूर्णकुम्भ प्रत्येक 12 वर्ष में जबकि महाकुम्भ 144 वर्षों में मनाया जाता है।

स्कन्दपुराण के अनुसार

तान्येव यःपुमान् योगे सोऽ मृतत्वाय कल्पते। देवा नमन्ति तत्रस्थान् यथा रंका धनाधिपान्।

  

जो मनुष्य कुम्भ-योग में स्नान करता है,वह अमृतत्व की प्राप्ति करता है। कुम्भ-पर्व में स्नान करने वाले मनुष्यों को देवगण नमन करते है। विष्णुपुराण में कहा गया है कि “हजार अश्वमेध यज्ञ करने से, सौ वाजपेय यज्ञ करने से और लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो फल प्राप्त होता है, वह फल केवल प्रयाग कुम्भ के स्नान से प्राप्त होता है। स्कन्दपुराण में प्रयाग स्नान की महिमा के उल्लेख मिलता है कि -

हस्त्रं कार्तिके स्नानं माघे स्नानशतानि च।। वैशाखे नर्मदा कोटि:कुम्भस्नानेन तत्फलम्।।

कार्तिक माह में एक हजार बार गंगा स्नान करने से, माघ में सौ दफा गंगा स्नान करने से और बैसाख में करोड़ बार नर्मदा स्नान करने से जो फल प्राप्त होता है, वह प्रयाग में कुम्भ-पर्व पर केवल एक बार स्नान करने से प्राप्त होता है। प्रयाग को तीर्थों का राजा कहा जाता है, यह तीर्थों का अधिपति है। सातों पूरियाँ इनकी रानियाँ कही जाती है। गंगा-युमना की धाराओं ने सम्पूर्ण प्रयाग को तीन भागों में विभाजित किया है। यह तीनों भाग अग्निस्वरूप-यज्ञवेदी माने जाते हैं। प्रयाग में प्रतिवर्ष माघ मास में मेला लगता है जिसे कल्पवास कहते है। यहाँ प्रत्येक 12वें वर्ष में महाकुम्भ एवं कुम्भ से छठे वर्ष अर्धकुम्भ पड़ता है। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि हर्षवर्धन के काल (629-645 ई.) में भी महामोक्ष परिषद के नाम से कुम्भ पर्व का आयोजन किया जाता था। इस अवसर पर राजा हर्षवर्धन प्रयाग में अपना सर्वस्व दान कर दिया करते थे।

पौराणिक कथाओं में वर्णित मिलता है कि प्रयागराज को पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने प्रकट किया था। जिसके गर्भ में सरस्वती छिपी है, वह श्याम एवं श्वेत जलधरा ब्रह्मलोक में जाने का मार्ग है। प्रयाग में पृथ्वी के भीतर प्रवाहित होने वाली सरस्वती नदी के साथ गंगा व यमुना का संगम होता है जिसे त्रिवेणी से सम्बोधित किया जाता है। शास्त्रों में माना गया है कि यहाँ ईश्वरीय शक्ति का संचार होता है। इसी ईश्वरीय शक्ति के कारण मनुष्य को कुम्भ के दौरान पवित्र नदी में स्नान करने पर मोक्ष की प्राप्ति मिलती है।

कुम्भ-पर्व (मेला) विश्व का सबसे बड़ा एकत्रित जनसमूह है। इस जनसमूह एवं मेले के दौरान मुख्य आकर्षण नागा साधू एवं उनके अखाड़े होते हैं। कुम्भ मेले में शाही स्नान का प्रथम अधिकार इन अखाड़ों से जुड़े नागा साधुओं का रहता है। कहा जाता है कि कुम्भ मेला नागा परम्परा है जो ऋग्वेद काल से चली आ रही है। शताब्दियों से अपनी निरन्तरता को अक्षुण्ण रखते हुए यह महापर्व अपनी महत्ता विराट्-स्वरूप, धर्म एवं सौहार्द का संगम है। भारतीय आध्यात्मिक, दार्शनिक तथा सांस्कृतिक महत्त्व के साथ मानव मूल्यों का सार्थक एवं मांगलिक पर्व है। प्रत्येक भारतीय को इस मांगलिक पर्व एवं भारतीय विविधता की झांकी का दर्शन करना चाहिए।