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भारतीय संस्कृति का विश्व में प्रसार
August 30, 2019 • डॉ. सुशीलकुमार पाण्डेय 'साहित्येन्दु'

दक्षिण पूर्व एशिया के परिप्रेक्ष्य में भारतीय कौण्डिन्य तथा अगस्त्य की कालजयी सांस्कृतिक सेवाएँ

रामधारी सिंह 'दिनकर' ने संस्कृति के चार अध्याय नामक पुस्तक में - लिखा है कि- "इतिहास यह तो नहीं बतलाता है कि भारतवासियों ने अन्य जातियों को अपना दास बनाने के लिए कभी दूसरे देशों पर आक्रमण किया, किन्तु यह बात सिद्ध है कि धर्म एवं संस्कृति के प्रचारार्थ तथा व्यापार के लिए भारतवासी दूर देशों की यात्रा करते थे, बड़ी-बड़ी नौकाओं का बेड़ा लेकर हजारों मील समुद्र के पार चले जाते थे और वन-पर्वतों को लाँघकर दूसरे देशों से सम्बन्ध स्थापित करते थे।"

उक्त कथन से भारत की सनातन विश्वमैत्री की भावना परिपुष्ट होती है।

को हि भारः समर्थानां किं दूर

व्यवसायिनाम्।

को विदेश सुविद्यानां को परः प्रिय

वादिनाम्।।

अर्थात् “सामर्थ्यवान व्यक्ति को कोई वस्तु भारी नहीं होती। व्यापारियों के लिए कोई जगह दूर नहीं होती। विद्वानों के लिए कहीं विदेश नहीं होता। मधुर बोलने वाले का कोई पराया नहीं होता।" परम्परागत इस श्लोक में भारतीय जीवन-शैली का सार-संक्षेप तथा रहस्य प्रत्यक्ष है। यदि व्यक्ति में सामर्थ्य है तो वह कठिन से कठिन काम कर लेगा और साहस के अभाव में वह कुछ भी नहीं कर सकता। जिसमें सामर्थ्य है उसके लिए सर्प, रस्सी के समान है वह किसी न किसी तरीके से आयी हुई विपत्ति का विनाश कर लेता है, पर जिसमें सामर्थ्य नहीं है वह रस्सी को सर्प के समान समझ लेता है और हताश, निराश होकर विपत्ति के सामने आत्मसमर्पण कर देता है। व्यापारियों के लिए कोई स्थान दूर या निकट नहीं होता, वह जहाँ भी व्यापार प्रारम्भ कर देता है अपने उद्यम, साहस, शौर्य और सदाचरण से लक्ष्मी का प्रियपात्र बन जाता है। वह विश्व के किसी कोने में हो उसको आदर सम्मान तो मिलेगा ही। ऐसे ही वीरों, साहसियों के लिए पृथ्वी का वसुन्धरा (धन धारण करने वाली) नाम सार्थक होता है। कहा भी गया है "वीर भोग्या वसुन्धरा।" जिसके पास विद्या है उसके लिए कोई स्थान विदेश नहीं होता है। विद्या, योग्यता, क्षमता, कला-कौशल की उपयोगिता सर्वत्र होती है। कहा गया है कि 'राजा और विद्वान में तुलना उचित नहीं है क्योंकि राजा की पूजा स्वदेश में होती है जबकि विद्वान की पूजा सर्वत्र होती है। जो प्रियवादी, मधुरभाषी है उसके लिए कोई पराया नहीं होता। विद्वान, मधुरवाणी से प्रतिकूल परिस्थितियों को भी अनुकूल बना देता है।

प्राचीनकाल से ही भारतीय मान्यता रही है कि जो व्यक्ति किसी कार्यव्यवहार को निश्चयपूर्वक प्रारम्भ करता है, उसे मध्य में नहीं रोकता, समय को बर्बाद नहीं करता तथा अपने मन को नियंत्रण में रखता है, वही ज्ञानी है।

निश्चित्वा यः प्रक्रमते

नान्तर्वसति कर्मणः।

अवन्ध्यकालो वश्यात्मा

स वै पण्डित उच्यते॥

उक्त दोनों श्लोकों में भारतीय ऋषियों, ज्ञानियों, शूरवीरों, व्यापारियों तथा जिज्ञासुओं के गुणसूत्रों का सुसमावेश है, जिन्होंने अति प्राचीनकाल से आधुनिककाल तक अनेक विपरीत परिस्थितियों का डटकर सामना करते हुए "मानव-सेवा' के क्षेत्र में अकल्पनीय ऐतिहासिक योगदान दिया है, जिनके कालजयी कार्यों से "विश्व एक परिवार" के रूप में स्थापित हुआ है। ऐसे अनेक महामानवों में प्रकृत स्थल पर कौण्डिन्य तथा अगस्त्य का विशेष उल्लेख किया जा रहा है, जिन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया में ज्ञान-विज्ञान के विविध पक्षों का प्रचार कर "सर्वे भवन्तु सुखिनः" का प्रायोगिक कार्य सम्पन्न किया था। जावा के समुद्री तटों पर ऋषि अगस्त्य की प्रस्तर प्रतिमाएँ मिलती हैं। वहाँ के अनेक निवासी अगस्त्य को भारत गुरु तथा स्वयं को अगस्त्यवंशीय मानते हैं। इनकी विपरीत परिस्थितियों में स्थलीय तथा जलीय यात्राओं की विभीषिका-भयानक यन्त्रणा किसी सामान्य व्यक्ति को विचलित कर देने में सर्वथा समर्थ है। पर इनके लिए ऊपर लिखे गये दोनों श्लोक सर्वथा सार्थक हैं। दक्षिण पूर्व एशिया (कम्बोडिया, थाईलैण्ड, म्यांमार, इन्डोनेशिया आदि) को वृहत्तर भारत का अंग माना गया है। ज्ञान-विज्ञान के प्रकाश से दूर अति प्राचीनकाल में इन देशों को स्वर्णिम महत्त्व दिलाने में अगस्त्य ऋषि का योगदान इतिहास के भाल का स्वर्ण लेख है जिस पर समय की धूलि/काल का पर्त जमता जा रहा था, पर नयी पीढ़ी को अपने पूर्वजों की इस महान सेवा को समाज के समक्ष पुनर्जागरित करना अति आवश्यक है। भारत तथा दक्षिण पूर्व एशिया के प्राचीन सांस्कृतिक सम्बन्धों की गम्भीरता पर अनेक विदेशी तथा भारतीय विद्वानों ने अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों का उद्घाटन किया है। रूसी इतिहासविद् फ्योदोरकोरोव्किन ने 'प्राचीन विश्व का इतिहास' नामक पुस्तक में लिखा है कि "दक्षिण पूर्व एशिया के साथ भारत के विशेषतः घनिष्ठ सम्पर्क थे। इन देशों में लिपि, शिल्प और ज्ञान के विकास में प्राचीन भारत का बहुत बड़ा योगदान था।"

रामधारी सिंह दिनकर ने "संस्कृति के चार अध्याय' नामक ग्रन्थ में वृहत्तरभारत (भारत तथा दक्षिणपूर्व एशिया) पर विस्तार से विचार किया है। उन्होंने लिखा है कि "बर्मा और स्याम से दक्षिण और पूर्व की ओर जो भू-भाग और अनेक द्वीप हैं, इन्हीं का नाम वृहत्तर भारत है। स्याम से पूरब की ओर जो इन्डोचायना नामक देश है वह असल में भारतीय संस्कृति का ही वह क्षेत्र है जो चीन के पास पड़ता है, इसलिए उसको इन्डो-चायना, हिन्द चीन या भारत-चीन नाम बहुत ही सार्थक है। इसी प्रकार इन्डोनेशिया नाम दो यूनानी शब्दों के योग से बना है। इन्डो (Indos) = इन्डिया या भारत + (Nesus) द्वीप। अतएव इन्डोनेशिया का अर्थ भारत द्वीप है। यह नाम ही सूचित करता है कि किसी समय सांस्कृतिक दृष्टि से भारत और इन्डोनेशिया एक ही देश थे।" दिनकर का यह कथन अति महत्वपूर्ण है कि भारतीय जनता यदि देश के बाहर की जनता से अपना सांस्कृतिक सम्बन्ध बढ़ाना चाहे तो इस कार्य में उसे जितनी सफलता बर्मा, स्याम भारत-चीन, मलाया, सुमात्रा, जावा और बाली में मिलेगी, उतनी और कहीं नहीं मिल सकती है... जावा में बोरोबुदर और कंबोडिया में अंगकोर दो भग्नावशेष ऐसे हैं, जो हमें याद दिलाते हैं कि सारा पूर्वी एशिया एक समय भारत की सुगन्ध से सुगन्धित था। कला के सेवकों और विद्यार्थियों के लिए ये दोनों स्थान तीर्थ समझे जाने चाहिए।

. कौण्डिन्य

मान्यता है कि विदर्भ क्षेत्र (बरार) के कुण्डिनपुर नामक स्थान का निवासी था। इस स्थान की कल्पना महाराष्ट्र तथा उड़ीसा की सीमा के पास नागपुर परिक्षेत्र में की गयी है। कम्बोडिया (कम्बुज) में कौण्डिन्य की चर्चा चीनी अनुश्रुतियों में मिलती है जिसके अनुसार “फूनान (कम्बुज/कम्बोडिया का चीनी नाम) के आदिवासी लोग अर्द्धसभ्य थे, वे नंगे रहते थे और शरीर को गोदने से सजाते थे। उनकी रानी लियूची ब्राह्मण धर्म के अनुयायी हुएन तिएन से पराजित हुई, हुएन तिएन ने उसे विवाह कर लिया और इस प्रदेश पर शासन करने लगा। उसने इन लोगों में सभ्यता का प्रसार किया। औरतों को कपड़ा पहनना सिखाया। हुएन तिएन शब्द कौण्डिन्य का चीनी रूपान्तर है जो सीधे भारत से आया था और उसने सम्भवतः प्रथम ईस्वी में अपना राज्य स्थापित किया।"

कम्बोडिया में कौण्डिन्य का नाम एक बार और आता है जिसके अनुसार ईसा की चौथी शताब्दी के अन्त में अथवा पाँचवीं के आरम्भ में कियाओ चेन जू अथवा कौण्डिन्य नामक शासक वहाँ राज्य कर रहा था। यह सच है कि उत्तरी तथा दक्षिणी भारत से राजकुमारों, ब्राह्मणों तथा अन्य विद्वानों के नये दल सुदूर पूर्व के विभिन्न देशों में गये वहाँ उन्होंने भारतीय संस्कृति को और बढ़ावा दिया। लिअंग वंश के इतिहास (ई. 502-556) में कियाओ चेन जू अथवा कौण्डिन्य के विषय में लिखा है कि वह ब्राह्मण था और भारत का रहने वाला था। एक दिन उसने फूनान जाकर वहाँ पर राज्य करने के लिए भविष्यवाणी सुनी। यह फूनान के दक्षिण से पन पन पहुँचा जहाँ के लोगों ने इसका स्वागत किया और उसे अपना शासक चुन लिया। उसने वहाँ भारतीय नियम, संस्कार और परम्पराओं का प्रसार किया।

अगस्त्य '

अगस्त्य ऋषि का उल्लेख वैदिक पौराणिक तथा अन्य भारतीय साहित्य में मिलता है। उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत को सांस्कृतिक दृष्टि से एकता के सूत्र में बाँधने में उनका अभूतपूर्व योगदान था। उनकी समुद्रपान की कथा प्रसिद्ध ही है। भारतीय पुराण अगस्त्य की समुद्रपान की कथा के आगे मौन धारण कर लेते हैं। अगस्त्य के जीवन के उत्तरार्द्ध की कथा से सुवर्णदीप सुमण्डित है। बी.एन. पुरी ने बोरोबुदूर (जावा) से प्राप्त अगस्त्य की प्रस्तर मूर्ति का चित्र अपने ग्रन्थ में प्रस्तुत किया है। बी.एन. पुरी एक जगह लिखते हैं कि लेखों से यह ज्ञात होता है कि भारत से समय-समय पर गये हुए विद्वानों से इनको बड़ा प्रोत्साहन मिला था और इसीलिए भारत के साथ शैक्षिक सम्पर्क बना हुआ था। कम्बुज में भारतीय विद्वान आगन्तुकों में आर्यावर्त का निवासी अगस्त्य वेद और वेदांगों में पारंगत था। सर्वज्ञ मुनि नामक आर्यावर्त निवासी ब्राह्मण चारों वेदों और आगमों का ज्ञाता तथा शिवभक्त था। कम्बुज देश में आकर उसने तथा उसके वंशजों ने उच्च पदों को सुशोभित किया। प्रो0 नीलकंठ शास्त्री के मतानुसार शैलेन्द्र वंश की उत्पत्ति शिव से अवश्य हुई और जावा में शैव मत का प्रवेश दक्षिण भारत से अगस्त्य की उपासना के साथ हुआ और कदाचित पांड्य क्षेत्र से ही वहाँ भारतीय गये। चन्द्रगुप्त वेदालंकार ने लिखा है कि प्रायः इन सभी द्वीपों (दक्षिण पूर्व एशिया) में प्राप्त अगस्त्य ऋषि की प्रतिमाएँ, भारत में प्रसिद्ध उनके समुद्रपान तथा दक्षिण दिशा में जाकर बसने की समस्या का सुन्दर समाधान कर रही हैं।"

भारत तथा दक्षिण पूर्व एशिया के प्राचीन सांस्कृतिक सम्बन्धों को प्रगाढ़ करने में कौण्डिन्य तथा अगस्त्य का विशेष योगदान है जिससे भारतीय संस्कृति को वैश्विक प्रसार मिला।