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भारतीय संस्कृति और जल
April 1, 2017 • Dr. Alka Aggarwal

भारतीय  पुराण विश्व के प्राचीनतम ज्ञानकोश हैं जो जल-संरक्षण व जल के महत्त्व पर प्रकाश डालते हैं। अनन्त क्षीरसागर में मत्स्यावतारी भगवान् विष्णु का धाम है। भगवान् विष्णु को इराक में विशन कहा जाता है जो मत्स्य रूप में है। विष्णु जल-संरक्षण और जल- संचयन हेतु कच्छप बने थे। पुराणों में इन्हें कच्छपावतारी विष्णु कहा गया है। भगवान्विष्णु से सृष्टि के जनक ब्रह्माजी का जन्म हुआ जो स्पष्ट संकेत करता है कि जीवन का उद्भव और विकास जल से ही हुआ है। भगवान् शिव द्वारा गंगा जल को सर्वोच्च स्थान मस्तक पर संजोना भी जल की उपादेयता व महत्त्व को प्रदर्शित करता है। हमारी संस्कृति में दशावतारों का क्रम भी यही दर्शाता है कि विकास के क्रम का प्रारंभ जल से ही हुआ है। दशावतारों में प्रथम अवतार मत्स्यावतार है जो पूर्णतः जलीय जीव है। तदुपरांत कूर्म (कच्छप) अवतार जो जल व थल- दोनों पर जीवन-यापन करता है। तृतीय वराह अवतार ने डूबती धरती को बाहर निकाला। नृसिंह अवतार पशु व मनुष्य का मिश्रित रूप था। इसके बाद के सभी अवतार मानव स्वरूप में हैं।

दशावतारों का क्रम जीवन-विकास के क्रम को दर्शाता है। जलशक्ति व महत्त्व के विषय में अनेक पौराणिक कथाएँ व मिथक हैं। देवीपुराण के अनुसार वर्षा की दो रमणियाँ हैं- मेघवी और मेघायन्तिका। इनमें जल को संजोए रखने के लिए जल-संरक्षण की विशेष व्यवस्था है। विश्व का प्राचीनतम शहर वाराणसी गंगा तट पर बसा है। वाराणसी ही नहीं, सभी बड़े शहर नदियों के तट पर बसे हैं। गंगा का जल तो अमृततुल्य है। सभी प्रकार के विकारों से मुक्त, रोगविनाशिनी, मोक्षदायिनी, जीवनदायिनी, गंगाजल का महत्त्व अद्वितीय है। देवाभिषेक, शुद्धिकरण, आचमन और अर्चन में जल की अनिवार्यता जाति, धर्म, सम्प्रदाय से परे है। हमारी संस्कृति के सम्पूर्ण इतिहास में गंगाजल का गौरव गुंथा हुआ है। ऋग्वेद (10.75.5), गंगा, यमुना, सरस्वती, शतद् (सतलज), पयोष्णी (रावी), आरीवनी (चिनाब), वितस्ता (व्यास), मूरुवृधा (संगम) आर्जीकीया (झेलम), सिंधु आदि नदियों का उल्लेख करता है और उनकी स्तुति करता है।

हिंदू-दर्शन के अनुसार सभी धार्मिक कार्यों एवं शुभ कार्यों में जलपूजन, जल के महत्त्व को प्रतिबिम्बित करता है। गुरुवाणी में धरती को माँ, हवा को गुरु तथा पानी को पिता कहा गया है- पवन गुरु, पानी पिता माता धरत महत्व। भारतीय संस्कृति में जल में देवता का वास होना जल-संरक्षण व जल का जीवन में महत्त्व को दर्शाता है। तालाब, बावड़ी, कुएँ इस प्रकार बने होते थे कि वे वर्षा-जल से लबालब रहते थे जिनके माध्यम से वर्षभर समस्त नगरवासी शुद्ध जल का उपयोग करते थे।

मध्यकाल में आतताइयों के आक्रमण व भारतीय संस्कृति को नष्टकर राज्य करने के सिद्धान्त ने जल-संरक्षण एवं ऐतिहासिक धरोहर को संजोए रखने में बाधा उत्पन्न की। मुगल-शासकों के 600 वर्ष व उसके बाद अंग्रेजों के 200 वर्ष के शासनकाल में जल-संरक्षण राजकीय व राष्ट्रीय चिन्ता का विषय नहीं था। विश्व-जनसंख्या के साथ- साथ भारत की भी जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धि हुई। आजादी के बाद आर्थिक विकास में तेजी आती गई। बढ़ते औद्योगिकीकरण के कारण अधिकांश उद्योग नदियों के तट पर लगाए गए जिनसे निकलनेवाले प्रदूषकों से जल विषाक्त व अनुपयोगी हो गया। बढ़ती आबादी के साथ-साथ जलापूर्ति के कारण भूजल-स्तर गिरता गया। पर्यावरण के साथ छेड़छाड़, यथा- वृक्षों की कटाई, खेती में कीटनाशकों का प्रयोग, अदूरदर्शिता के कारण बहुत-से तालाबों, कुओं व नदियों का नामोनिशान नहीं रहा। आज जिस रफ्तार से भूजल-स्तर गिरता जा रहा है, नदियों का जल प्रदूषित हो रहा है एवं जलवायु, पर्यावरण में परिवर्तन आ रहा है, वह भारत ही नहीं अपितु सारे विश्व के लिए बेहद भयानक संकट की दस्तक है। अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा- ऐसी आशंका विश्व बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष स्माइल सेराबेल्डिन ने 1995 में व्यक्त की थी।

विगत 40-50 वर्षों से भूजल-स्तर लगातार गिर रहा है। भारत जल का दबाव झेलनेवाला देश बन रहा है। आँकड़ों के अनुसार कम-से-कम 22 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को पानी लाने के लिए आधा किलोमीटर और उससे भी अधिक दूर पैदल चलना पड़ता है।

यदि हम जल के सही संरक्षण, रखरखाव व उपयोग के प्रबंधन पर ध्यान दें, तो पानी की समस्या पर काफी हद तक विजय पा सकेंगे, अन्यथा आनेवाली पीढ़ी का जीवन कष्टमय हो जायेगा। कहीं वर्षा का पानी तबाही मचा देता है तो कहीं पानी की कमी। यदि सभी नदियों को जोड़ दिया जाए, वर्षा-जल को सीधे धरती, कुओं, तालाबों, पोखरों में संजोकर रखा जाए, तो जलसमस्या से निजात पाई जा सकेगी। जागरुकता के बिना जल-समस्या से नहीं उबरा जा सकता है।

आज सारे विश्व में जल बचाने के लिए तीन आर- री-ड्यूस, री-सायकिल और रीयूज का नुस्खा दिया जाता है। अमेरिका के लॉसएंजलिस शहर में सीवर के पानी को । पीने लायक बनाया जाता है।

जनसंख्या-नियंत्रण, स्वच्छता, जागरुकता, वृक्षारोपण, वाटर-हार्वेस्टिंग, पुनर्चक्रण, पानी के व्यर्थ उपयोग को रोकना, टोंटियों से व्यर्थ बहाव को रोकनाजैसे उपायों द्वारा नयी पीढ़ी को संस्कृति का हस्तान्तरण संभव है।

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