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भारतीय वाङ्मय में गो माहात्म्य
November 1, 2017 • Dr. Jitendra Kumar Singh 'Sanjay'

गावो विश्वस्य मातरः का उद्घोष करनेवाले भारतवर्ष के जनमानस में गाय की अद्वितीय महत्ता है। गाय की महत्ता को ध्यान में रखकर ही उसे ‘सर्वदेवमयी', 'सर्वोपकारिणी और ‘अघ्न्या' आदि कहा गया है। गाय की अनुकम्पा जिस किसी भी गृहस्थ पर हो जाय, तो उसका लोक और परलोक- दोनों ही सुधर जाता है। इसलिए भारतीय वाङ्मय गोमाता के माहात्म्य से भरा पड़ा है। वैदिक वाङ्मय से लेकर लौकिक वाङ्मय तक गोमाता की कीर्ति-कथा के अनेक आख्यान हैं। भारतीय प्रजा ने सनातन परम्परा से ही गाय से प्राप्त होनेवाले गोक्षीर, गोघृत, गोदधि, गोमूत्र और गोमय के ओषधीय महत्त्व को भी जान लिया था। इसलिए भारत में प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान की सम्यक् पूर्ति तब तक नहीं मानी जाती, जब तक यजमान को देहशुद्धि के निमित्त पञ्चगव्य का प्राशन न मिल जाय। वस्तुतः ऋषि-संस्कृति में रच-बसकर ही भारतीय ऋषियों ने ज्ञानविज्ञान के उषःआलोक का सन्दर्शन किया है। मानवता के कल्याण के सहस्रमुखी स्रोतों का अनुसन्धान किया है। लोकमंगल की इन्हीं ज्ञान-रश्मियों ने जीवन के प्रत्येक सोपान को मंगल-ऋचाओं से अलंकृत किया है। तत्त्वतः वैदिक वाङ्मय का प्रस्तार अपनी परिधि में जीवन एवं जगत् की। व्यवहारिकता को समग्रतः समेटे हुए है। इसलिए वैदिक ऋषियों ने मनुष्य के सुख दुःख में मातृभाव से सदैव तत्पर रहनेवाली गाय को 'माता' माना और उसके सार्वजनीन महत्त्व को प्रतिपादित करने के लिए अनेक सूक्त रच डाले। गोमाता के प्रति भारतीय ऋषियों की वाङ्मयी पुष्पाञ्जलि का शाश्वत स्वर-प्रवाह भारत की अर्वाचीन भाषाओं के पुष्कल साहित्य तक प्रसृत है।

वैदिक ऋषियों ने गाय के सार्वभौमिक महत्त्व को देखते हुए उसके विश्वरूप का प्रतिपादन किया है। वैदिक ऋषियों की गो-विषयक ऋचा कहती है कि अदिति ही द्युलोक है, अदिति ही अन्तरिक्ष है, अदिति ही माता है, अदिति ही पिता है, अदिति ही पुत्र है, अदिति ही सारे देवता हैं, अदिति ही अतीतकालीन वस्तुसमूह है और भविष्य में होनेवाला सब कुछ भी अदिति ही है

अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।

विश्वेदेवा अदितिः पञ्च जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्॥

-ऋग्वेद, 1.89

यहाँ ‘अदिति' का तात्पर्य गाय से है। वैदिक वाङ्मय के नदीष्ण विद्वान् पं. श्रीपाद दामोदर सातवळेकर ने ‘अदिति पद के दो अर्थ का उल्लेख किया है। ‘दिति' का अर्थ हैटुकड़े-टुकड़े करना, काटना; अतः ‘अदिति । वह है, जो टुकड़े करने योग्य अर्थात् हिंसनीय न हो। ‘अदिति' का दूसरा अर्थ (अदनात् अदितिः) है- भक्षण करने योग्य दूध, दही, मक्खन, घी आदि देनेवाली तथा बैल को जन्म देकर उसके द्वारा कृषि से धान्य आदि उत्पन्न करानेवाली। भारतीय परम्परा में इन दोनों ही अर्थों का मथितार्थ 'गाय' ही है। भारतीय जनजीवन में गाय की उपयोगिता पदे-पदे लक्षित होती है। इसलिए वैदिक ऋषियों ने गोमाता की सेवा का स्पष्टतः निर्देश दिया है। इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि और मरुत के साथ गाय (अदिति) की भी प्रार्थना करते हुए ऋषियों ने कहा है कि अपनी रक्षा के लिए हम इन्द्र, मित्र, वरुण एवं अग्नि को मरुतों के बल को और अवध्य गौ को बुलाते हैं; बुरे मार्ग से लोग जिस प्रकार रथ को सुरक्षित रखते हैं, उसी प्रकार अच्छे दानी और सुखपूर्वक बसानेवाले ये सभी देवता सब प्रकार के पापों से सुरक्षित रखें

इन्द्रं मित्रं वरुणमग्रिमूतये मारुतं शर्थों अदितिं हवामहे।

रथं न दुर्गाद्वसवः सुदानवो विश्वस्मान्नो अंहसो निष्पिपर्तन॥

-वही, 1.106.1

भारतीय प्रजा सनातन परम्परा से गाय को माता मानती है। इसलिए गाय का वध न करने का संकल्प ऋग्वेद की ऋचाएँ बारबार दुहराती हैं। गौ शत्रुओं को रुलानेवाले वीर मरुतों की माता, वसुओं की कन्या, अदिति के पुत्रों की बहिन और अमृत का तो मानो केन्द्र ही है। इसलिए मैं विवेकी मनुष्यों से घोषणापूर्वक कहता हूँ कि निरपराध तथा अवध्य गौ का वध न करो

माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसाऽऽदित्यानाममृतस्य नाभिः।

प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट॥

-वही, 8.101.15

अर्थात्, गौ, (रुद्राणां) दश प्राण और आत्मा- इन 11 रुद्रों की (माता) जननी है (वसूनां) पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा और नक्षत्र- इन आठ वसुओं की (दुहिता) दोहन करनेवाली पुत्री है, (आदित्यानां) द्वादश मासात्मा विष्णु भगवान् की (स्वसा) सहोदरा भगिनी हैं, (अमृतस्य) जीव मात्र को जीवित रखनेवाली जीवनी शक्ति ‘ऑक्सीजन' एवं विटामिन ए., का (नाभिः) केन्द्र है। (चिकितुषे) 'गाय के प्रति मनुष्य का क्या कर्तव्य है- ऐसा विचार करते हुए (जनाय) मनुष्य के प्रति ‘भगवान्, (प्र नु वोचं) आज्ञा देते हैं कि- (अनागां) अपराधरहित (अदितिं) अवध्य (गां) गाय को (मा वधिष्ट) मत मारो।

भारतीय परम्परा गाय को 'अघ्न्या कहती है। वैदिक वाङ्मय में 137 बार ‘अघ्न्या' पद प्रयुक्त हुआ है। तैत्तिरीयों के पाठ में ‘अघ्रियाः' पद है। पं. श्रीपाद दामोदर सातवळेकर इसे केवल उच्चारणगत पार्थक्य मानते हैं। अर्थ की दृष्टि से दोनों पदों का भाव एक ही है। विचार करने की आवश्यकता है कि जब गाय का एक नाम ही ‘अघ्न्या' है, तब गाय का वध तो सर्वथा निषिद्ध होगा ही। इसलिए अथर्ववेद में वर्णित है कि यदि तू हमारी गौ, घोड़े तथा पुरुष की हत्या करता है। तो हम सीसे की गोली से तुझे बांध देंगे, जिससे तू हमारे वीरों का वध न कर सके

तदि नो गां हंसि यद्यश्वं यदि पूरुषम्।।

तं त्वा सीसेन विध्यामो तथा नोऽसो अवीरहा॥

-अथर्ववेद, 1.16.4

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