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भारतीय मुद्रा (रुपया छ) से जुड़े रोचक तथ्य
December 1, 2016 • Pramod Kaushik

आविष्कार ने, जिसके द्वारा धातुओं का माप होता है, सुनिश्चित बटखरे की आवश्यकता उत्पन्न कर दी। आवश्यकतावश लोग बीजों से धातुओं का माप-तोल करने लगे। बीजों का वजन एक आकार के अनुसार धातुओं की इकाई को सुनिश्चित किया जाता था। तैत्तिरीयब्राह्मण में बताया गया है कि राजसूय-यज्ञ के अवसर पर रथ-दौड़ में भाग लेनेवाले को इस सेवा के पारितोषिक के रूप में एक-एक कृष्णल दिया जाता था। इससे स्पष्ट है कि सोना प्रत्येक भाग लेनेवाले को दिया जाता था एवं वहीं सोना कृष्णल के माप की इकाई था। कृष्णल एक प्रकार का बीज है जिसे बाद में साहित्य में रक्तिका अथवा गुंज की संज्ञा दी गई है। आधुनिक युग में इसे रत्ती के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त जौ (बार्ली), तन्दुल (चावल), मासा (दाल) वगैरह- वगैरह बीजों और अनाजों के नाम हैं जो धातुओं के तौल की इकाई के रूप में प्रयुक्त होते थे।

परन्तु धातुओं के साथ प्रतिक्षण माप की आवश्यकता होती थी। इन कठिनाइयों को कम करने के उद्देश्य से निर्धारित वजन के आधार पर शिलिकाओं द्वारा मूल्य सुनिश्चित किया जाता था। गोलाकार धातु का टुकड़ा शतमान के नाम से जाना जाता था। शतमान का अर्थ होता है 900 इकाइयाँ। इसका उल्लेख संहिता एवं ब्राह्मण-ग्रंथों में है। राजा के राज्याभिषेक के समय आयोजित राजसूय-यज्ञ में रथों की दौड़ में प्रयुक्त रथ के दोनों चक्कों में दो शतमान जड़े होते थे। अन्त में इन्हें पुरोहितों को दे दिया जाता था। उसी प्रकार बृहदारण्यकोपनिषद् में पाद की चर्चा की गई है। पाद एक प्रकार का धातु है जिसकी कीमत एक-चौथाई है। इसे विदेह के राजा जनक ने बहु-दक्षिणा के रूप में दिया था। उसने दार्शनिक महासभा आयोजित की जिसमें दरबार में उपस्थित विद्वन्मण्डली में सर्वाधिक मनीषी विद्वान् के चयन की प्रतियोगिता आयोजित की गयी। इसके लिए राजा ने 9,000 गायों का उनके सींगों में जड़ित दस पादों के इनाम की घोषणा की थी।

वैदिक साहित्य में हम यह निर्विवाद रूप से पाते हैं कि 1500 से 800 ई.पू. के प्रारंभिक भारत के इतिहास में सिक्कों के विकास-संबंधी दो स्तरों की चर्चा को गई है। परन्तु इनके प्रसंग इतने तितर-बितर एवं अव्यवस्थित हैं कि इनकी सहायता से सिक्कों के विकास के क्रम में विभिन्न स्तरों का अध्ययन कठिन है। यद्यपि धातुओं के स्थानान्तरण के द्वारा वस्तुओं के क्रयविक्रय की समस्या सुलझाई जाती थी, तथापि इस प्रणाली की कुछ कठिनाइयाँ थीं। यद्यपि धातुओं के वजन सुनिश्चित थे, तथापि धातु के सुनिश्चित वजन की निश्चितता एवं इसकी शुद्धता अविश्वसनीय थी। लोग इस असाध्य समस्या को सत्य मानकर चलते थे। अतः आवश्यक माप की आवश्यकता महसूस होने लगी। भारत एवं अन्य देशों में इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए धातु के सिक्कों पर जिम्मेदार सत्ताधिकारों के चिह्न एवं मोहर के द्वारा धातु की विश्वसनीयता को सुनिश्चित किया गया। इस प्रकार सर्वमान्य विश्वसनीय सिक्कों का आविर्भाव हुआ।

व्यावसायिक समुदायों में इस नवीनीकरण के लाभ विलक्षण थे। इससे उनके व्यापार के कार्य अत्यन्त ही सुलभ हो गए। चिह्नित सिक्कों के द्वारा इच्छानुकूल वस्तुएँ आसानी से प्राप्त होने लगीं। अतः यह स्वीकार करना आपत्तिजनक नहीं है कि स्वयं व्यवसायियों एवं व्यापारियों ने ही सिक्कों के विकास का नेतृत्व किया। परन्तु यह विचारधारा अत्यन्त ही विवादास्पद है। सिक्कों की प्रामाणिकता उस समय व्यक्तिविशेष का ख्याति एवं विश्वसनीयता का विषय रही है जिसने अपनी जिम्मेदारी पर सिक्कों को प्रामाणिकता प्रदान कर चलाया। समस्त व्यावसायिक निगमों एवं समुदायों के क्षेत्र उसके क्षेत्रविशेष तक सीमित थे। परिणामतः उसके सिक्कों का प्रचार दूरस्थ प्रदेशों में नहीं हो सका। यद्यपि व्यावसायिकों एवं व्यापारियों ने सिक्कों के निर्माण एवं विकास में योगदान दिया, तथापि यह गतिविधि सिक्कों के प्रारंभिक दिनों तक ही सीमित रही। इस संदर्भ में व्यापारियों एवं व्यावसायिकों का नाम उल्लेखनीय बताया गया है और न तो सिक्कों के विद्यमान नमूनों में इसकी जानकारी उपलब्ध होती है। वस्तुस्थिति यह है कि राजसत्ता ने स्वयं इन सिक्कों को बनाने एवं निर्गत करने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली एवं इसकी प्रामाणिकता चुनौती और संदेह की सीमा से परे है। कलकत्ता में यह उनका विशेषाधिकार हो गया।

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