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भारतीय परम्पराओं में वृक्ष-पूजा
August 30, 2019 • शंकर लाल माहेश्वरी

भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं में पेड़ों को विशिष्ट महत्ता प्रदान की गई है। पेड़ हमारी संस्कृति के संरक्षक भी माने जाते है। हमारे साधु संतों और महात्माओं ने पेड़ों की छत्रछाया में ही साधना करते हुए ज्ञान प्राप्त किया था। भारत भूमि पर वृक्षों, वनों, पौधों और पत्तों को देवतुल्य मानकर पूजा जाता रहा है। प्रत्येक माँगलिक अवसरों पर घरों के दरवाजों पर कनेर, आम तथा अशोक और केले के पत्तों से सजावट होती रही है। विशेष पर्वो और उत्सवों पर वृक्षों की पूजा अर्चना की जाती है। "परम्परा से आशय उस परिपाटी से है जो निश्चित सांस्कृतिक मूल्यों के निर्वाह तथा उन्हे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे से आगे हस्तांतरित करने के उद्देश्य से समाज में निश्चित अवसर पर निश्चित विधि से अपनाई जाती है।"

हमारे प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों और वेदों में भी उल्लेख है कि मानव शुद्ध वायु में श्वांस ले, शुद्ध जलपान करे, शुद्ध अन्न फल, भोजन करे, शुद्ध मिट्टी में खेले कूदे व कृषि करें तब ही वेद प्रतिपादित उसकी आयु "शतम् जीवेम शरदः शतम्' हो सकती हैं। हिन्दु धर्म में तो कई देव मन्दिरों में पेड़ को भी देवता का प्रतीक माना जाता है। पीपल, तुलसी, वट वृक्षों की पूजा अर्चना पर्यावरण सुरक्षा का ही परिचायक हैं। हमारे धर्मशास्त्रों में महामनीषियों ने वापी, पाली और जलाशय बनाकर वहाँ वृक्षारोपण करना किसी यज्ञ के पूण्य से कम नही माना है। ऋषि आश्रमों में यज्ञ हवन आदि में समिधा का प्रयोग होता हैं वह भी वृक्षों की देन हैं। जिसे पवित्र मानकर उपयोग किया जाता है।

वृक्ष एक ओर जहाँ हमारे जीविकोपार्जन के साधन है वहीं दूसरी ओर हमारे जीवन के भी आधार है। वृक्षारोपण और जलाशय निर्माण को पुनीत कार्य माना जाता है। हमारे राजा-महाराजाओं ने प्रजा की सुख सुविधा के लिए न केवल सड़कों का ही निर्माण कराया बल्कि इनके किनारे छायादार वृक्ष व जलाशयों की व्यवस्था भी की थी। सम्राट अशोक ने समूचे राज्य में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जगह-जगह फलदार व छायादार वृक्ष लगाकर वन्य जीवों और जीव जन्तुओं को आश्रय प्रदान किया है। "वृक्ष हमारे जीवन के सहचर हैं हमारा जीवन वृक्षों के अस्तित्व पर निर्भर है। वृक्षों की छोड़ी गई प्रश्वांस हमारी श्वांस है। वृक्षों के मूल, तना, पत्र, पुष्प, फल हमारे जीवन की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति करते है। वृक्षों की छाया हमें शीतलता प्रदान करती हैं। वृक्ष मेघों को आकर्षित कर हमारे लिए प्राकृत जल की व्यवस्था करते है" - वृक्ष पुराण।

भारतीय समाज में पेड़ो की पूजा व नदियों को माँ का दर्जा देना प्रकृति संरक्षण ही का परिचायक हैं। गंगा, यमुना, सरस्वती आदि पवित्र नदियों का उल्लेख शास्त्रों में पूज्य भाव से हैं। रामायण में काण्ड, महाभारत में पर्व और श्रीमद् भागवत में स्कन्ध शब्दों का प्रयोग हुआ हैं जिसका अर्थ क्रमशः तना, पोर और प्रधान शाखा से हैं। कण्व की पुत्री शकुन्तला का पूरा बचपन वृक्षों की छाया तले ही व्यतीत हुआ। उसकी विदाई के समय वृक्षों की पत्तियों से आँसू टपक रहे थे। उसने वृक्षों से गले मिलकर विदा ली थी। रामायण काल में राम का वनों में निवास करना और वृक्षों को अपना आश्रय बनाना उनके प्रकृति प्रेम का ही सूचक है। लंका में अशोक वाटिका में सीता का ठहराव वृक्षों की महत्ता प्रतिपादित करता है।

वृक्ष व वनस्पति रूद्र के रुप में मानी गई है क्योंकि ये विषैली गैस पीकर अमृतमयी गैस निकालते है अतः वृक्षों को सींचना नीलकण्ठ महादेव को जल चढ़ाना ही माना गया है। विष्णु पुराण में उल्लेख किया गया है कि सौ पुत्रों की प्राप्ति से भी बढ़कर एक वृक्ष लगाना और उसका पालन पोषण करना पुण्य माना गया है। चरक संहिता में प्राकृतिक औषधियों व जड़ी बंटियों का चिकित्सकीय दृष्टि से उपयोग बताया गया है। नींबू, आँवला, पपीता, सेव, पालक, चंदलाई आदि शरीर के लिए पौष्टिक एवं स्वास्थ्य वर्धक हैं। मत्स्य पुराण में दस पुत्रों, बावड़ियों एवं पुत्रों से बढ़कर एक वृक्ष माना गया है। वृक्षों के प्रति विशेष प्रेम से प्रेरित होकर राम ने दण्डकारण्य, इन्द्र ने नन्दनवन, कृष्ण ने वृंदावन, सौनकादि ऋषियों ने नेमिशारण्य वन तथा पाण्डवों ने खाण्डक वनों का निर्माण किया है। वर्षा का आव्हान, भूस्खलन का बचाव, प्राणवायु का दान और जीव जन्तुओं का संरक्षण आदि कार्य भी वृक्षों द्वारा की सम्पादित होते है। हमारी सांस्कृतिक परम्पराओं में प्रकृति प्रेम की अनेक गाथाएं भरी पड़ी है जिनके क्रियान्वयन से मानव जीवन को सुखी, समृद्ध बनाने हेतु प्रकृति प्रदत्त साधनों के संरक्षण की व्यवस्था बनाई गई है।

हमारी परम्पराओं में वृक्षों की पूजा का विशेष महत्व रहा है जो पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन को सुखी व स्वस्थ बनाने की दिशा में सफल है। वृक्ष पूजा की परम्परा में कार्तिक मास में महिलाएं पीपल व वट वृक्ष की पूजा कर पानी सींचती है तो पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। कदम्ब के पेड़ के नीचे परिवार सहित भोजन किया जाए तो परिवार फलता फूलता है। जिस घर में तुलसी की पूजा होती है उस घर में यमराज प्रवेश नही करता है। प्राचीन काल में प्रत्येक शिवालय के पास विल्व पत्र का वृक्ष लगाया जाता था जिसकी पत्तियाँ शिवजी को अर्पित होती है। तुलसी एकादशी के दिन तुलसी के पौधों की अपनी पुत्री के समान विवाह की रस्म सम्पन्न की जाती है। शास्त्रवेत्ताओं का कथन है कि पथ पर वृक्षारोपण करने से दुर्गम फल की प्राप्ति होती है जो फल अग्निहोत्र करने से भी उपलब्ध नहीं होता। वह मार्ग पर पेड़ लगाने से मिल जाता है।

ब्रह्माण्ड पुराण में लक्ष्मी को कदम्ब वनवासिनी कहा गया है। कदम्ब के पुष्पों से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। वृहदारण्यक उपनिषद में पुरुष को वृक्ष का स्वरुप माना गया है। पद्म पुराण में भगवान विष्णु को पीपल वृक्ष, भगवान शंकर को वटवृक्ष और ब्रह्मा जी को पलाश वृक्ष के रुप में प्रतिष्ठापित किया गया है। घर में वास्तु दोषों को नष्ट करने के लिए तुलसी का पौधा सक्षम है। माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए घर में श्वेत आक, केला, आँवला, हरसिंगार, अशोक, कमल आदि का रोपण शुभ मुहुर्त में करने का विधान है। आन्ध्र पदेश में तो नीम के पेड़ को राज्य वृक्ष माना गया है। शास्त्रानुसार ईशान कोण में आँवला नैरत्य में इमली, आग्नेय में अनार, वायव्य मे वेल, उत्तर में केथ व पाकर, पूर्व में बरगद, दक्षिण में गुगल और गुलाब तथा पश्चिम में पीपल का वृक्ष लगाना शुभ माना गया है।

तुलसी को विष्णु प्रिया, केला को बृहस्पति और सन्तान दाता तथा पीपल को ब्रह्मा, विष्णु, महेश के निवास के रुप में पूजा जाता है। चन्दन भक्त और भगवान के माथे की शोभा है। कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को आँवला नवमी कहते हैं। कहते हैं कि पीपल के पेड़ को नियम पूर्वक जल चढ़ाया जाए तो शनि का दुष्प्रभाव समाप्त हो जाता है। चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की दशमी को "दशामाता" कहा जाता है। स्त्रियाँ इस रोज पीपल पूजा करती है। ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को स्त्रियाँ वटवासिनी का व्रत रखती हैं। वट वृक्ष को जल सींचती हैं। हरियाली अमावस्या और बसंत पंचमी आदि पर्यों पर व्रत उपवास के साथ वनस्पति पूजा होती है। छत्तीसगढ़ के रतनपुर क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में आम के पेड़ से आम तोड़ने से पहले उसके विवाह की विधि सम्पन्न की जाती है।

बढ़ती जनसंख्या और भौतिक वादी व्यवस्थाओं के फलस्वरुप वृक्षों की अन्धा-धुंध कटाई हो रही है। प्रकृति से निर्दयता पूर्वक छेड़छाड़ की जा रही है अतः आज प्रदूषण की भयावही समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। गाँधीजी ने कहा था “प्रकृति सभी जीवों का भरण पोषण तो करती हैं किन्तु एक भी लालची की तृष्णा शांत करने में अक्षम है। पीपल बरगद को ब्राह्मण माना जाता था। उन्हे काटना ब्रह्न हत्या के समान माना जाता है। जिन पेड़ो पर पक्षियों के घोंसले हो तथा देवालय और श्मशान भूमि पर लगे पेड़ो को काटना शास्त्रानुकूल नहीं है। साथ ही दूध वाले वृक्ष जैसे बड़, पीपल, बहेड़ा, अरड़, नीम आदि को काटने पर पाप का भागीदार होता है किसी कारण से वृक्ष काटना ही हो तो वृक्ष पर निवास करने वाले जीव जन्तुओं से क्षमा प्रार्थना करते हुए अन्यत्र वृक्षारोपण की व्यवस्था की जानी चाहिए।" जोधपुर जिले की खेजड़ली ग्राम में संवत् 1780 में 363 वीर-वीरागंनाओं ने अपने सिर कटवाकर मरुस्थल में खेजड़ी के वृक्षों की रक्षा की थी। आज भी विश्नोई सम्प्रदाय के लोग खेजड़ी के पेड़ की सुरक्षा हेतु समर्पित है। पेड़ो को नष्ट होने से बचाने के लिए ही ओरण, डोली तथा गोचर व्यवस्था की परम्परा का विकास हुआ था। ओरण एक संरक्षित वन हैं जो किसी देव स्थान से जुड़ा होता है। डोली किसी मठ या मन्दिर के पुजारी को व्यक्तिगत सम्पत्ति के रुप में दी जाती है ताकि वन संरक्षण होता रहे।

बढ़ती जनसंख्या और भौतिकवादी व्यवस्थाओं के फलस्वरुप वृक्षों की अन्धाधुंध कटाई हो रही है। बढ़ते हुए सड़को के जाल, उद्योगों की स्थापना, बाँधों के निर्माण तथा रेल्वे लाइनों के विस्तार के कारण वृक्षों की अपार कटाई हो रही है अतः नष्ट हो रहे वृक्षों के स्थान पर नये वृक्षारोपण पर ध्यान दिया जाए तथा कानूनों का कठोरता से पालन किया जाना आवश्यक हैं अन्यथा वह दिन दूर नही हैं जब प्रकृति प्रकोप से पूरा प्राणी जगत प्रभावित हो जाएगा और हमारे अस्तित्व को खतरा उत्पन्न होगा अतः वृक्षों के बचाव हेतु सभी को कृत संकल्प होना चाहिए।