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भारतीय कृषि : आदिकाल से
March 1, 2017 • Prof. Mahesh Kumar Sharan

प्रारंभ से लेकर आज तक हमारी जनसंख्या का एक बड़ा भाग गाँवों में रहकर खेती का कार्य करता आ रहा है, इसलिए तो भारतवर्ष को गाँवों का देश भी कहा जाने लगा। कृषि-कार्य को अधिकाधिक उज्जत और सुसम्पन्न करने के लिए आर्यों ने अपने समाज की रचनात्मक आधार पर व्यवस्था की। इस काल तक कृषि और उससे उत्पन्न विविध अन्न उनकी आजीविका के साथ-साथ उनमें आर्थिक जीवन का मुख्य आधार बन चुके थे।

हमारा देश भारतवर्ष अति प्राचीन काल से ही एक कृषिप्रधान देश रहा है। कृषि पर निर्भर रहनेवालों की संख्या यहाँ काफ़ी थी। खेती गाँवों में ही होती थी तथा उस समय के गाँव सुखमय जीवन तथा समृद्धि के केन्द्र थे। कृषक अपना सारा समय कृषि-सम्बन्धी कार्यों में ही लगाया करता था। मेगास्थनीज के अनुसार युद्ध के समय भी ये खेती करते रहते थे, क्योंकि खेती से ही उत्पन्न अन्न लोगों के भोजन का मुख्य आधार था। प्रारंभ से लेकर आज तक हमारी जनसंख्या का एक बड़ा भाग गाँवों में रहकर खेती का कार्य करता आ रहा है, इसलिए तो भारतवर्ष को गाँवों का देश भी कहा जाने लगा।

जब हम इतिहास के पन्ने उलटते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन काल से समाज का उत्कर्ष मनुष्य के आर्थिक जीवन की सम्पन्नता पर निर्भर करता रहा है। व्यक्ति का भौतिक और सांसारिक सुख उसके आर्थिक विकास से प्रभावित होता है। हम जानते हैं कि समय-समय पर मानव के आर्थिक कार्यक्रम उसकी आवश्यकताओं के अनुरूप घटते-बढ़ते और कभी-कभी परिवर्तित भी होते रहे हैं, पर आर्थिक जीवन का मूलाधार सदा से कृषि और व्यापार रहा है। आज भी विश्व का समाज इन्हीं दो आधारों पर टिका हुआ है। यद्यपि निश्चित स्थितियों के अन्तर्गत कृषक और औद्योगिक-वर्ग के सदस्यों द्वारा निश्चित कार्यक्रम की उपेक्षा की जाती रही है, तथापि यह भी सच है कि निश्चित परिस्थितियों के कारण उनके कार्यक्रम में समयानुसार संशोधन भी होते रहे हैं। अतः आर्थिक जीवन को उत्प्रेरित करनेवाली ये प्रकृतियाँ प्रत्येक युग में सहज रूप से स्वभावतः उद्भूत होती रही हैं, जो समाज को उन्नति की ओर अग्रसर होकर सक्रिय सहयोग प्रदान करती रही हैं। निश्चय ही आर्थिक जीवन के विकास-क्रम से कृषि, पशुपालन और वाणिज्यजैसी वृत्तियों का प्रमुख योग था।

भारतीय समाज के आर्थिक जीवन का विकास क्रमशः हुआ। वैदिककालीन प्रारम्भिक आर्यों की आर्थिक स्थिति कोई बहुत अधिक सुगठित और सुव्यवस्थित नहीं थी। ऋग्वैदिक युग के लोग मुख्यतः पशुपालन और कृषि पर ही निर्भर करते थे तथा पशुओं को लेकर वे सर्वदा एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते थे एवं दस्युओं-जैसे शत्रुओं से संघर्ष करते रहते थे। ऋग्वेद में ऐसे अनेक स्थान हैं जिनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि आर्यों ने अपने यायावरी जीवन को स्थायी निवास में परिवर्तित करने के लिए अनार्यों से अनेक युद्ध किये। निश्चय ही ये युद्ध आर्थिक आधार सुदृढ़ करने में सफलता मिली। फलतः आर्य स्थायी निवासी ही नहीं हुए वरन् जीवन-यापन के आर्थिक आधार के भी स्वामी हुए। यहाँ के मूल निवासियों से भूमि छीनकर उन्होंने कृषि की ओर अपनी नज़र फैलायी तथा सर्वप्रथम एक सुव्यवस्थित आर्थिक आधार की नींव रखी। उत्तरवैदिक काल तक आते-आते आर्य अधिक साधन-सम्पन्न हो गये, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सशक्त और क्रियाशील हुई। अब वे पशुपालन के साथ-साथ कृषि भी करने लगे, जिसका उत्तरोत्तर विकास होता गया। आर्थिक दृष्टि से वे अपने समाज के प्रति अधिक उत्तरदायी हो गये। कृषि-कार्य को अधिकाधिक उन्नत और सुसम्पन्न करने के लिए उन्होंने अपने समाज की रचनात्मक आधार पर व्यवस्था की। इस काल तक कृषि और उससे उत्पन्न विविध अन्न उनकी आजीविका के साथ-साथ उनमें आर्थिक जीवन का मुख्य आधार बन चुके थे। कृषि-सम्बन्धी उनका ज्ञान कोई नया नहीं था। वे कृषि के निमित्त बैल का उपयोग करने लगे। भूमि को अधिक उपजाऊ बनाने के लिए वे खाद के रूप में गोबर का प्रयोग करते थे। ऋग्वेद (8.6.48 तथा 10.10.14) से हम यह जानते हैं कि हुल में 6, 8 या 12 बैल जुतते थे। हलों में धातु के बने फाड़ या फल लगे होते थे। खेती अधिकतर नदियों के किनारे होती थी तथा सिंचाई के लिए कुओं और नहरों का प्रयोग होता था। खेतों की उर्वरा-शक्ति बनाए रखने के लिए विभिन्न प्रकार के खादों का प्रयोग किया जाता था, जिन्हें ‘शकम्’ अथवा ‘करीष' कहा जाता था।

अन्न के पक जाने पर वे हँसिया से काटकर गट्ठर बाँधकर खलिहान में ले जाते थे। कृषि-कार्य में ब्राह्मण पुरोहित और क्षत्रियों का कोई योग न था। काठकसंहिता (37.1) से हमें यह स्पष्ट होता है कि वैश्य वर्ण के लोग कृषि-कर्म से सम्बन्धित थे तथा वे लोग ही कृषि कार्य के विकास में लगे रहते थे। कृषि कोमनोनुकूल और सफल साधन-सम्पन्न बनाने के लिए आर्य लोग इन्द्र, पूसा, सीता आदि विभिन्न देवी-देवताओं की स्तुति-वन्दना में लगे रहते थे। सिंधु-घाटी से गंगा की घाटी तक आर्यों का जो प्रसार हुआ, वह भाग कृषि की दृष्टि से अत्यन्त उर्वर, उपजाऊ तथा उपयुक्त था। इस क्षेत्र में आर्य-लोगों ने कृषि-कार्य में अपना प्रमुख स्थान बना लिया। सिंचाई के लिए यहाँ चउसों अथवा डोलों में भरकर चमड़े के रस्सों से कुओं से पानी निकाला जाता था। झीलों से भी सिंचाई का उल्लेख हमें मिलता है। सूत्रकाल में भी कृषि जीविकोपार्जन का आधार थी। अधिकाधिक लोग, विशेषतया वैश्य-वर्ण के लोग कृषि में दक्ष थे। सांख्यायनगृह्यसूत्र से हमें यह जानकारी मिलती है कि खेतों में हल जोतते समय मंत्र पढे जाते थे। ताकि फसल अधिक हो जिससे मानव-जाति का भरण-पोषण हो सके।

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