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भारतीय इतिहास के परिप्रेक्ष्य में पुरुषार्थ चतुष्टय की अवधारणा
June 20, 2019 • डॉ. सलिल कुमार पाण्डेय

अथर्ववेद में ज्ञानियों को इतिहास, पुराण, नाराशंसी एवं गाथाओं का प्रिय स्थान कहा गया है। 

पुराण का तात्पर्य पुरानी कहानी, प्राचीन आख्यान है। पुराण हिन्दू कथा-शास्त्र के अक्षय भण्डार हैं। पुराण के पाँच लक्षण कहे जाते हैं- सृष्टि, प्रलय, वंश, मन्वन्तर वर्णन तथा वंशानुचरित

अठारह पुराण प्रमुख माने गये हैं- ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव, भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिङ्ग, वाराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़ तथा ब्रह्माण्ड। जिन मन्त्रों द्वारा मनुष्यों की प्रशंसा की गयी है उन्हें वैदिक साहित्य में नाराशंसी कहा गया है।

भारतीय इतिहास का प्रमुख ध्येय रहा है सभी सुखी हों सभी स्वस्थ हों अर्थात् किसी को भी कष्ट की प्राप्ति न हो। स्वयं का सुख गौण तथा समाज का सुख प्रधान है। पूरा विश्व एक परिवार है हमें भारतीय इतिहास अनेक रूपों में प्राप्त होता है। यदि कहीं वह आख्यानक-व्याख्यानात्मक प्रधान है तो कहीं वह नाराशंसी तथा गाथा के रूप में है। पुराण भारतीय साहित्य के स्वर्णिम पृष्ठ हैं। महाभारत को वेदव्यास ने स्वयं ही इतिहास कहा है। वाल्मीकि रामायण भारतीय इतिहास का वह हीरक हस्ताक्षर हैजो हजारों लाखों वर्षों से देश-विदेश में भारतीय संस्कृति का कीर्तिध्वज फहरा रहा है। अन्य अनेक ग्रन्थ हैं जिनमें भारतीय इतिहास का वह मधु रस मिलता है जिसे हम पुरुषार्थ चतुष्टय कहते हैं। पुरुषार्थ चतुष्टय मानव-जीवन की सार्थकता का प्रमाण पत्र है। धर्माचरण पूर्णजीवन, धर्म से अनुप्राणित अर्थ एवं काम, भौतिक जीवन को तो समृद्ध करते ही हैं, साथ ही मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। पुरुषार्थ चतुष्टय की पृष्टभूमि व्यक्तित्व का विकास, राष्ट्र की पृष्टभूमि व्यक्तित्व का विकास, राष्ट्र निर्माण, तथा चेतना-बोध को सुदृढ़ करती है। यदि भारत को पुनः विश्वगुरु और सोने की चिड़ियाँ का बनना है तो उसे भारतीय इतिहास के परिप्रेक्ष्य में पुरुषार्थ चतुष्टय की अवधारणा को पुष्ट करना ही होगा।

इतिहास शब्द इति+ह+आस के संयोग से बना है जिसका आशय है- इस प्रकार का था। परम्परा से प्राप्त उपाख्यान (कथा- कहानी) के समूह को इतिहास कहते हैं, उपदेश समन्वित धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष इतिहास के लक्षण में सम्मिलित है। इन पुरुषार्थ चतुष्टय का आख्या इतिहास हैजो कथाक्रम के रूप में आज भी उपलब्ध है। दूसरे शब्दों में धर्म, अर्थ, काम, तथा मोक्ष का इतिहास से प्रत्यक्ष संबंध है। वीरगाथा जैसे महाभारत, इतिहास ग्रन्थ है। पुराण इतिहास को प्रमाण मानते हैं।

1. वेदव्यास ने महाभारत को अनेकशः इतिहास कहा है।

2. इस ग्रन्थ के लिए आख्यान नाम का प्रयोग किया है।

3. अथर्ववेद में ज्ञानियों को इतिहास, पुराण, नाराशंसी एवं गाथाओं का प्रिय स्थान कहा गया है।

4. पुराण का तात्पर्य पुरानी कहानी, प्राचीन आख्यान है। पुराण हिन्दू कथा- शास्त्र के अक्षय भण्डार हैं। पुराण के पाँच लक्षण कहे जाते हैं- सृष्टि, प्रलय, वंश, मन्वन्तर वर्णन तथा वंशानुचरित।

5. अठारह पुराण प्रमुख माने गये हैं-ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव, भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिङ्ग, वाराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़, तथा ब्रह्माण्ड। जिन मन्त्रों द्वारा मनुष्यों की प्रशंसा की गयी है उन्हें वैदिक साहित्य में नाराशंसी कहा गया है।

6. यह शब्द नाराशंस के विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ है। पूर्व वैदिक साहित्य में नाराशंसी अनेक अर्थों में प्रयुक्त दिखाई देता है। यथा Praise of men इसका एक अर्थ मनुष्यों द्वारा प्रणीत प्रशंसा भी है। The praises composed by men गाथा का अर्थ हैछन्द, धार्मिक, श्लोक, या छन्द जो वेदों से सम्बन्ध न रखता हो, श्लोक, गीत आदि यह अर्थ आप्टे के संस्कृत हिन्दी शब्दकोश में दिया गया है।

7. वेद में गाथा शब्द श्लोकात्मक साहित्य के रूप में प्रयुक्त हुआ हैऋग्वैदिक गाथाओं में इन्द्रगाथा एवं यज्ञ गाथा प्रमुख थे।

8. आख्यान का आशय है बोलना, किसी पुरानी कहानी की ओर निर्देश करना। इसके लिए कथा कहानी शब्द का प्रयोग होता है। मूलतः पौराणिक कथाओं को आख्यान कहा जाता है।

9. वैदिक काल में आख्यान शब्द का प्रयोग मिलता हैऐतरेय ब्राह्मण में शुनः शेप का आख्यान प्रसिद्ध हैमहाभारत आख्यानों उपाख्यानों के लिए प्रसिद्ध है। श्री हरिस्वामी के श्लोक से विदित होता है कि स्वयं देखे हुए प्रकरण का कथन आख्यान तथा दूसरे वक्ता द्वारा सुने गये प्रकरण को कहने पर उपाख्यान माना जाता है।

10.आचार्य चाणक्य ने पुराण, इतिवृत्त, आख्यायिका (कथाएँ) उदाहरण, धर्मशास्त्र, तथा अर्थशास्त्र को इतिहास कहा है। इन कथनों से स्पष्ट है कि इतिहास का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत हैऔर हमारे प्राचीन साहित्य से ही 'इतिहास' का तत्त्व बोध होता आ रहा है। हमें अपने इतिहास-बोध के प्रति सतर्क तथा सजग रहना है।

धर्म

धर्म (धृ+मन्) का आशय है कर्तव्य, जाति सम्प्रदाय, आदि के प्रचलित आचार का पालन। कानून प्रथा, तथा धार्मिक गुण या नैतिक गुण तथा अच्छे कार्य को भी धर्म कहते हैं। शास्त्र विहित आचरण, निष्पक्षता, पवित्रता, औचित्य तथा शालीनता को धर्म कहा जाता है। धर्मात्मा वह व्यक्ति है जो न्यायशील, भला तथा पुण्यात्मा, हो, जो सद्गुण तथा पवित्रता की दृष्टि से आगे बढ़ा हुआ हो उसे धर्मवृद्ध कहते हैं।

1. वेदवयास ने धर्म की विवेचना करते हुए कहा कि जिस कार्य से दूसरे को कष्ट न पहुँचे वह धर्म है। धर्म मात्र करने का दिखावा करने वाला कभी धार्मिक नहीं कहा जा सकता। जिस प्रकार नेत्रहीन सूर्य की प्रभा से अछूता रहता है उसी प्रकार धर्म का दिखावा करने वाला भी धर्म से अछूता ही रहता

2. मनुस्मृति में धर्म को अनेकश चर्चा की गयी है तदनुसार आचार ही श्रेष्ठ धर्म है। धर्म ही प्रज्ञा को धारण करता हैजिसका आधार नैतिक नियम तथा सदाचरण है। मनु के अनुसार धर्म का स्रोत वेद, स्मृति (धर्मशास्त्र) सदाचार तथा स्वयं की सन्तुष्टि है। भारतीय चिन्तन परम्परा में धर्म को व्यक्ति का नियामक, मार्गदर्शक माना गया हैं धर्म ही मानव की गतिविधियों को परिस्थितियो के अनुसार नियमितनियंत्रित करता है। महाभारत की मान्यता है कि सदाचरण से ही धर्म फलीभूत होता है।

 3. धर्म एक ऐसा तत्त्व है जो जीवन में मानव को प्रतिष्ठा देता ही है, मृत्यु के पश्चात भी साथ देता है। भारतीय मान्यता कहती है कि व्यक्ति की मृत्यु होने पर धर्म पृथ्वी में गड़ा रह जाता है, परिश्रम से पाले पोसे गये पशु बाड़े में ही रह जाते हैं पत्नी घर के दरवाजे तक साथ निभाती है, मित्रगण श्मशान तक साथ देते हैं और सबसे प्रिय देह चिता तक साथ देती है, फिर परलोक मार्ग में धर्म ही साथ जाता है।

 4. अतएव धर्म पूर्ण जीवन-यापन को उत्तम माना गया है। यदि इतिहासपुराण के पृष्ठों पर दृष्टि डाली जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जिन लोगों ने विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म का आचरण नहीं छोड़ा वे ही इतिहास के स्वर्णाक्षरों में प्रतिष्ठित और प्रशंसित हुए। राजा शिवि ने कबूतर की प्राणरक्षा के लिए अपने शरीर का माँस बाज को दे दियामहर्षि दधीचि ने देवताओं की रक्षा के लिए अपनी हड़ियों को दे दिया। महाराज हरिश्चन्द्र ने सत्यवचन की रक्षा के लिए अनेक भयावह कष्टों को झेला, इन लोगों ने धर्म की रक्षा के लिए ही अनेक भीषण यंत्रणाएं भोगी तभी गोस्वामी तुलसीदास ने इनकी प्रशंसा की

5. महात्मा गांधी सत्य को ईश्वर मानते थे और अहिंसा को परमधर्मगोस्वामी तुलसीदास ने भी अहिंसा को ही परमधर्म (श्रेष्ठधर्म) कहा है।

अर्थ

अर्थ (ऋ+धन्) का अभिप्राय हैआशय, प्रयोजन लक्ष्य उद्देश्य विषय, वस्तु आदि। इस शब्द का तात्पर्य धन या सांसारिक ऐश्वर्य की प्राप्ति से भी हैयहाँ यह तथ्य विचारणीय है कि अर्थ-धन वही सार्थक है जो स्वयं या समाज की भलाई के लिए समर्पित हो और जिससे धार्मिक क्रियाएँ पूर्ण होती हैं यही कारण है कि अर्थ को चतुर्वर्ग (चार पुरुषार्थ, पुरुषार्थ चतुष्टय) के अन्तर्गत रखा गया है। अर्थ का तात्पर्य उन भौतिक संसाधनों से है जो मानव को सांसारिक सुख प्रदान करते हैं। भारतीय चिन्तन परम्परा में संसार तथा स्वर्ग दोनों को महत्त्व दिया गया हैं मानव को धर्म विहित रीति से धनार्जन करना चाहिएउसका उपयोग स्वयं के उत्थान के साथ साथ समाज के उत्थान के लिए भी करना चाहिए। लोकोक्ति है कि यदि नाव में पानी भरने लगे और अधिक धनागम होने लगे तो दोनों हाथों से पानी तथा धन उलीचना चाहिए।

1. दूसरे शब्दों में उस धन को समाज की प्रगति में लगा देना चाहिए। तुलसीदास का कथन है कि पक्षी के पीने से नदी का जल नहीं घटता और यदि राम जी सहायक है तो दान देने से धन नहीं घटता।

2. अर्थ के सदुपयोग के पीछे मान्यता है कि जो अकेला खाता है वह पाप खाता है अर्थात् उसे अपने धन में से कुछ अंश किसी न किसी रूप में अन्य को जिसे जरूरत हो देना चाहिए। कालिदास ने रघुवंश में राजा रघु का वर्णन करते हुए लिखा है कि उन्होंने विश्वजित नामक यज्ञ में सर्वस्व दान कर दिया और मिट्टी के पात्र में भोजन करने लगे। उनके पास धन न होने की स्थिति में गुरुदक्षिणा के लिए चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राओं के याचक कौत्स को निराश नहीं किया। महाभारत में एक से एक सम्पन्न राजा थे पर दानवीर की उपाधि कर्ण को ही मिली। उसने मरते समय भी याचना किये जाने पर याचक को दाँत में लगे सोने को दान कर दिया था। भामाशाह को कौन भूल सकता हैं जिन्होंने राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व धन महाराणा प्रताप को समर्पित कर दिया। भारत को सोने की चिड़ियाँ कहा जाता था। इसके पीछे भारत की अकृत आर्थिक सम्पदा थी। विदेशी आक्रान्ताओं ने भारतीय सम्पदा को कितनी बार लूटा और कितना नष्ट किया कौन कह सकता है। उपनिषदों में ऋषिगण, भौतिक सम्पदा तथा आध्यात्मिक ज्ञान दोनों को समान महत्त्व देते थे। महाराज जनक के राज्य में समाज के उपेक्षित वर्ग के पास जो संपदा (अर्थ) थी उसे देखकर इन्द्र भी मुग्ध हो जाता था।

मुग्ध हो जाता था। 3. महाराज जनक उपनिषदकालीन ज्ञानपुंज थे। आचार्य चाणक्य ने तो अपने ग्रन्थ का नाम ही 'अर्थशास्त्र रक्खा । उन्होनें धन को धर्म का आधार माना है जिससे उपलब्धियों प्राप्त हो सकती हैं। राष्ट्र के विकास में अर्थ का अति महत्त्वपूर्ण योगदान है। राष्ट्र का आर्थिक विकास हम सबके हित में है। याद रखना है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि और व्यक्तिगत हित गौण है। अपनी प्राप्ति का प्रथम अंश राष्ट्र को समर्पित करना चाहिए। अर्थ नामक पुरुषार्थ दोनों लोकों में सुख देता है।

काम

काम (कम्+धम्) का तात्पर्य हैकामना, इच्छा, अभीष्ट पदार्थ, स्नेह अनुराग। काम के अन्तर्गत मानव की कामनाएँ, वासना जन्य तथा आसक्ति मूलक प्रवृत्तियों का समावेश होता है। 'काम' से सन्तानोत्पत्ति होती है तथा वंश परम्परा अग्रसर होती है। काम को दो रूपों में देखा जा सकता है- मंगल काम और अमंगल काम। मंगल काम मंगल मूलक होता है जिससे स्व तथा समाज दोनों का कल्याण होता है और अमंगल काम से अन्ततः अपमान और विनाश ही उत्पन्न होते हैंमनुस्मृति के अनुसार विधाता ने सृष्टि के निमार्णार्थ तप, वाणी, रति (प्रेम) काम क्रोध, आदि की थी

1. मनुस्मृति की मान्यता है कि इस संसार में किसी वस्तु कामना करना श्रेष्ठ नहीं है, फिर भी कामना नहीं है, ऐसा नहीं है। वेदों का अध्ययन करना तथा वेदविहित कमार्नुसार करना भी काम्य है।

2. कामना का पूर्ण अभाव सम्भव नहीं है। अतः कामना को एक सीमित स्तर पर रखकर उसे मांगलिक पृष्ठभूमि देकर उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। वेदों का अध्ययन करना तथा वेद विहित कमार्नुसार किया गया कार्य सुखद एवं शुभद होता है। वेदाध्ययन विश्वमंगल का प्रारंभिक सोपान है। वैदिक साहित्य में 'काम' तत्त्व पर गम्भीरता से विचार किया गया है। कामोत्पत्ति का उल्लेख ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में हुआ है, तदनुसार, सृष्टि के पूर्व चतुर्दिक अंधकार एवं जल व्याप्त था ह्यवह प्रादुर्भूत होने वाला परमात्म तुच्छ जल से आच्छादित हो गया था तत्पश्चात्तप की महत्ता से वह एक तत्त्व प्रकट हुआ। महत्ता से वह एक तत्त्व प्रकट हुआ। सृष्टि के पूर्व काल में मन रूपी पुरुष का जो सर्वप्रथम काम रूपी रेत (विकार) था, उत्पन्न हुआमनीषी कवियों ने अपनी प्रार्थना शक्ति से हृदय में ही हूँढकर, इस वर्तमान जगत के अव्याकृत परमात्मतत्त्व से स्थित निकट सम्बन्ध को जान लिया।

3. इस मन्त्र में काम को सृजन की इच्छा को मन का रेत अर्थात उत्पादक बीज कहा गया है क्योंकि इच्छा के अभाव में मन कुछ भी उत्पन्न नहीं कर सकता। सत् और असत् इन दोनों का बन्धु अर्थात सम्बन्धित स्थापित करने वाला सूत्र काम है। काम या अभिलाषा न हो तो उत्पत्ति सम्भव नहीं है। जयशंकर प्रसाद की कामायनी का मूल स्वर है मंगल काम, जिससे सृष्टि गतिमान होकर, एक सुन्दर रूप ग्रहण करती है।

4. काम नामक पुरुषार्थ का सृष्टि के अग्रसरित होने और मानव की मंगलकारी प्रगति में विशेष योगदान है।

मोक्ष

मोक्ष (मोक्षु+धप्) शब्द का अभिप्राय हैमुक्ति, छुटकारा बचाव तथा स्वतंत्रता आदि। इस शब्द का आध्यात्मिक अभिप्राय भी होता है तदनुसार इस शब्द का अर्थ हैउद्धार, परित्राण, परम मुक्ति, अवागमन अर्थात् पुनर्जन्म के चक्कर से आत्मा की मुक्ति। यह मानव जीवन चार उद्देश्यों में से अन्तिम उद्देश्य है।

1. मोक्ष क्या है? अनेक विद्वानों के अनेक मत हैं। एक नदी बहती हुईसमुद्र में समा गयी। नदी और समुद्र का जल एक हो गया, दोनों को अलग कर देखना सम्भव नहीं। जब आत्मा और परमात्मा में विलीन हो जाता है तब वह भी उसी का अंश बन जाता है। यही तो मोक्ष है। जब जीव कर्म बंधन से मुक्त होकर परमात्मा में लीन हो जाये तो उसे मुक्त मोक्ष प्राप्त कहते हैं। मोक्ष प्राप्ति के प्रमुख रूप से तीन मार्ग हैं- कर्म, ज्ञान और भक्ति। साधक अपनी योग्यता और इच्छानुसार इनमें से किसी का चयन करता है। भारतीय मान्यता में मोक्ष को अन्तिम पुरुषार्थ का स्थान दिया गया है अर्थात् धर्म, अर्थ, काम की प्राप्ति के पश्चात् ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास आश्रम के अनन्तर ही मोक्ष की प्राप्ति का प्रयत्न श्रेयस्कर है। हमारी संस्कृति एक ओर भोगमयी तो दूसरी ओर त्यागमयी है। मानव के लिए संसार का आकर्षण जितना महत्वपूर्ण है उतना ही संसार से वैराग्य भी। रघुवंशी राजा शैशव में विद्याओं का अभ्यास, यौवन में विषयों के प्रति अनुराग, वृद्ध हो जाने पर मुनियों सा आचरण करते थे। अन्ततः योग विद्या से शरीर त्याग कर मोक्ष प्राप्त करते थे।

2. गौतमबुद्ध के दर्शन में मोक्ष को निर्वाण कहा गया है। जैसे दीपक तेलहीन होकर बुझ जाता है निर्वाण को प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार मानव सांसारिक राग, मोह को छोड़कर निर्वाण को प्राप्त कर लेता है।

निर्वाण को प्राप्त कर लेता है। 3. सांसारिक भोग विलास की पूर्ति के अनन्तर, मोक्ष का प्राविधान है। मानव को अपने कर्तव्यों को जो परिवार, समाज तथा राष्ट्र के प्रति हैं पूरा कर, मोक्ष की कामना श्रेयस्कर है। भारतीय इतिहास के परिप्रेक्ष्य में पुरुषार्थ चतुष्टय की अवधारणा सनातन धर्म के दोनों अंगों को परिपुष्ट करती है जिसमें दर्शन और सदाचार, भोग तथा योग, अनुराग तथा विराग, लौकिकता तथा आध्यात्मिकता का सुसमावेश हैस्वस्थ तन तथा उन्नत मस्तिष्क की मान्यता पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति का सोपान है। भारतीय इतिहास के अनेक प्रकरण हमें उन स्थलों से प्रेरणा लेने को विवश करते हैं जिनमें अंकित था सदाचार, सदाशयता, सहयोगिता तथा विश्वबंधुता जो भारतीय सस्कृति के सनातन अंग हैं।