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भारतीय इतिहासलेखन में सूतों-मागधों का योगदान
December 1, 2017 • Dr. Shivshankar Thripadhi

भारतीय-इतिहास लेखन की विकास-यात्रा में सूत-परम्परा का विशेष महत्त्व है। इस परम्परा के अन्तर्गत राजकीय एवं राजकुलों से सम्बद्ध पुरोहितों अथवा गुरुओं (शिक्षकों) की वंश-तालिका- निर्मिति और उसका अभिरक्षण समायोजित रहा है। इस कारण इस परम्परा के वाहक सूत, वैदिक युग की राजनीतिक-संरचना में प्रतिष्ठा-स्थान के भी भागी थे। वेद में 'सूत' सादर ऋचाओं के विषय हैं- राजा काअभिषेक कार्य-सम्पादन करनेवाले मंत्री, अन्य देशों के नृपतिगण, सूत एवं ‘ग्रामणी, इन सबको हे मणे! तुम हमारी सेवा में नियोजित करो।' इस उद्धरण से स्पष्ट संकेत मिलता है, मंत्री आदि की ही कोटि में ‘सूत' भी वैदिक युग के राजन्यजन रहे। वह राजसम्मान के अधिकारी, राजवंशावलियों के निरूपक-रूप में परिगणित होते थे। इतिहास-सम्बद्ध लोकानुरजक जनों के प्रशंसात्मक गीतसंरचना अथवा ऐसे गीतों के संकलन का दायित्व भी सूत ही वहन करता था। गीतों का यह संकलन लिपिबद्ध न होकर स्मृतिसमाविष्ट रहता रहा। अतः हम कह सकते हैं कि भारतीय इतिहास की मौलिक परम्परा की आधारभूत श्रृंखला के संयोजक-रूप में सूतजनों का श्रेष्ठ योगदान है।

सूत मेधावी तथा स्मृति-विचक्षण होते थे, उन्हें राजकुलों का विश्वकोश कहा जाय तो अधिकाधिक अनुरूप होगा- ऋषिगण! आप लोग स्वयं पुराण जानते तथा सत्यव्रत का पालन करते हैं, तथापि यह जो पुराण सुनाने की मुझे प्रेरणा दी, उससे मैं पुनीत हो उठा। प्राचीन सत्पुरुषों ने सूत के लिए अपना निजधर्म बताया है कि वह इतिहास-पुराणों में ब्रह्मवादियों द्वारा कथित देवताओं, ऋषियों तथा अप्रतिम तेजस्वी नृपगणों की वंशावली एवं महात्माओं से श्रवण की गयी बातों को धारण करें

ये राजानो राजकृतः सूता ग्रामण्यश्च ये।

उपरत्तीन् पणे मह्यं त्वं सर्वान् कृष्णीमतो जनान्॥

- अथर्ववेद, 3.5.7

पूतोऽस्म्यनुगृहीतश्च भवदिभरभिनोदितः।

पुराणार्थं पुराणनैः सत्यव्रतपरायणैः॥

स्वधर्म एष सूतस्य सद्भिर्दष्टः पुरातनैः।

देवतानामृषीणां च राज्ञां चामिततैजसाम्॥

वंशानां धारणं कार्यं श्रुतानां च महात्मनाम्।

इतिहासपुराणेषु दिष्टा ये ब्रह्मवादिभिः॥

-वायुपुराण, 1.30-32

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