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बेहतर भविष्य के बाहर अपरिहार्य है ऊर्जा सुरक्षा
July 1, 2017 • Rajesh Aggarwal

किसी भी देश के विकास के लिए सस्ती व सतत ऊर्जा की आपूर्ति सर्वाधिक आवश्यक शर्त है। परम्परागत ऊर्जा के स्रोत सूखते जा रहे हैं। इसलिए आवश्यक है कि ऊर्जा के नये स्रोत विकसित किए जाएँ जो पर्यावरण हितैषी भी हों।

सस्ती और सतत ऊर्जा की उपलब्धता आधुनिक उद्योगों और सभ्यता की मूलभूत आवश्यकता है। ऊर्जा आधुनिक सभ्यता का इंजन है जिसे अधिकांशतः जीवाश्म इंधनों से प्राप्त किया जाता है। प्रतिदिन पूरे विश्व में भारी मात्रा में ऊर्जा की खपत होती है और मुख्य रूप से यह ऊर्जा हमें कोयला, गैस, पेट्रोलियम और नाभिकीय ईंधन से प्राप्त होती है।

पश्चिमी दुनिया में औद्योगिकीकरण की शुरूआत में केवल कोयले का ही प्रयोग किया जाता था। लेकिन 19वीं शताब्दी से मानव सभ्यता की आत्मनिर्भरता कोयले पर से घटी और पेट्रोलियम व गैस का प्रयोग होने लगा। तब से लगातार विकास के इंजन को जारी रखने के लिए मानव ने जीवाश्मीय ईंधनों का जमकर दोहन किया है। अब स्थिति ब्रेकिंग प्वाइंट पर पहुँच चुकी है और दुनिया पर ऊर्जा-संकट के बादल मंडरा रहे हैं। पेट्रोलियम और गैस का इतना अधिक दोहन हुआ है कि उनके भण्डार तेजी से कम हो रहे हैं। पेट्रोलियम व गैस के दोहन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है जिसकी वजह से हमारी धरती का अस्तित्व ही खतरे में दिखाई पड़ रहा है। एक अनुमान अनुसार, सन 2030 तक ऊर्जा की वैश्विक मांग वर्तमान की तुलना में 50 से 60 फीसदी तक बढ़ जाएगी। इस समस्या का हल खोजना बेहद जरूरी है। हमें आज ऊर्जा सतत अक्षय स्रोतों के विकास आवश्यकता है जिसमें हाइड्रोजन फ्यूल सेलों से लेकर विंड टार्बाइन तक शामिल जिससे आम जिंदगी का कामकाज सुचारू रूप से चल सके।

पेट्रोलियम की बढ़ती मांग

भाप-शक्ति पर आधारित औद्योगिक क्रांति से पूर्व लकड़ी जलाकर अधिकांश ऊर्जाआवश्यकताओं की पूर्ति कर ली जाती थी। इसके बाद कोयला एक आम ईंधन बन गया। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की उपलब्धता के बावजूद दुनिया की एक-चौथाई ऊर्जाआवश्यकताओं की पूर्ति आज भी कोयले से ही की जाती है। लेकिन जब से पेट्रोलियम का प्रयोग आरंभ हुआ है, तब से कोयले का प्रयोग कम होता जा रहा है। ऊर्जा-सामर्थ्य के दृष्टिकोण से कोयला कोई अच्छा विकल्प नहीं है। पर्यावरण व स्वास्थ्य की दृष्टि से यह सर्वाधिक खतरनाक जीवाश्मीय ईंधन है, लेकिन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने की वजह से आज भी इसकी मांग है।

आज पेट्रोलियम से दुनिया की 40 प्रतिशत ऊर्जा-आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, जिसमें से ऑटोमोबाइल प्रमुख है। इसमें से भी एक-चौथाई पेट्रोलियम का उपभोग अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा किया जाता है। एक मोटे अनुमान के अनुसार पेट्रोलियम के भण्डार अगले 50 वर्षों के भीतर ही समाप्त हो जाएँगे। इसलिए हम एक बड़े ऊर्जा-संकट के मुहाने पर खड़े हैं। पेट्रोलियम के पारम्परिक भंडार तेजी से चुक रहे हैं। जीवाश्मीय ईंधन ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के सबसे बड़े स्रोत हैं। ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से ही जलवायु परिवर्तन की समस्या पैदा हो रही है जिससे हमारी धरती का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है।

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